महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 569, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रेयसो लक्षणं चैतद् विक्रमो यस्य दृश्यते । कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात् समये यश्च तिष्ठति ॥ १३ ॥ समर्थान् पूजयेद् यश्च नास्पर्धैः स्पर्धते च यः । न च कामाद् भयात् क्रोधाल्लोभाद् वा धर्ममुत्सृजेत् ॥ १४ ॥ अमानी सत्यवान् क्षान्तो जितात्मा मानसंवृतः । स ते मन्त्रसहायः स्यात् सर्वावस्थापरीक्षितः ॥ १५ ॥ श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण इस प्रकार है—जिसका पराक्रम देखा जाता हो, जिसके जीवनमें कीर्तिकी प्रधानता हो, जो अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहता हो, सामर्थ्यशाली पुरुषोंका सम्मान करता हो, जो स्पर्धाके अयोग्य पुरुषोंसे ईर्ष्या न रखता हो, कामना, भय, क्रोध अथवा लोभसे भी धर्मका उल्लंघन न करता हो, जिसमें अभिमानका अभाव हो, जो सत्यवान्, क्षमाशील, जितात्मा तथा सम्मानित हो और जिसकी सभी अवस्थाओंमें परीक्षा कर ली गयी हो, ऐसा पुरुष ही तुम्हारी गुप्त मन्त्रणामें सहायक होना चाहिये ॥ १३—१५ ॥
कुलीनः कुलसम्पन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् । शूरः कृतज्ञः सत्यश्च श्रेयसः पार्थ लक्षणम् ॥ १६ ॥ कुन्तीनन्दन! उत्तम कुलमें जन्म होना, सदा श्रेष्ठ कुलके सम्पर्कमें रहना, सहनशीलता, कार्यदक्षता, मनस्विता, शूरता, कृतज्ञता और सत्यभाषण—ये ही श्रेष्ठ पुरुषके लक्षण हैं ॥ १६ ॥
तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानतः । अमित्राः सम्प्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ॥ १७ ॥ ऐसा बर्ताव करनेवाले विज्ञ पुरुषके शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और उसके साथ मैत्री स्थापित कर लेते हैं ॥ १७ ॥
अत ऊर्ध्वममात्यानां परीक्षेत गुणागुणम् । संयतात्मा कृतप्रज्ञो भूतिकामश्च भूमिपः ॥ १८ ॥ इसके बाद मनको वशमें रखनेवाला शुद्धबुद्धि और ऐश्वर्यकामी भूपाल अपने मन्त्रियोंके गुण और अवगुणकी परीक्षा करे ॥ १८ ॥
सम्बन्धिपुरुषैराप्तैरभिजातैः स्वदेशजैः । अहार्यैरव्यभीचारैः सर्वशः सुपरीक्षितैः ॥ १९ ॥ यौनाः श्रौतास्तथा मौलास्तथैवाप्यनहंकृताः । कर्तव्या भूतिकामेन पुरुषेण बुभूषता ॥ २० ॥ जिनके साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध हो, जो अच्छे कुलमें उत्पन्न, विश्वासपात्र, स्वदेशीय, घूस न खानेवाले तथा व्यभिचार-दोषसे रहित हों, जिनकी सब प्रकारसे भलीभाँति परीक्षा ले ली गयी हो, जो उत्तम जातिवाले, वेदके मार्गपर चलनेवाले, कई पीढ़ियोंसे राजकीय