भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 570

सेवा करनेवाले तथा अहङ्कारशून्य हों, ऐसे ही लोगोंको अपनी उन्नति चाहनेवाला ऐश्वर्यकामी पुरुष मन्त्री बनावे ॥ येषां वैनयिकी बुद्धिः प्रकृतिश्चैव शोभना । तेजो धैर्यं क्षमा शौचमनुरागः स्थितिर्धृतिः ॥ २१ ॥ परीक्ष्य च गुणान् नित्यं प्रौढभावान् धुरंधरन् । पञ्चोपधाव्यतीतांश्च कुर्याद् राजार्थकारिणः ॥ २२ ॥ जिनमें विनययुक्त बुद्धि, सुन्दर स्वभाव, तेज, वीरता, क्षमा, पवित्रता, प्रेम, धृति और स्थिरता हो, उनके इन गुणोंकी परीक्षा करके यदि वे राजकीय कार्यभारको सँभालनेमें प्रौढ़ तथा निष्कपट सिद्ध हों तो राजा उनमेंसे पाँच व्यक्तियोंको चुनकर अर्थमन्त्री बनावे ॥ पर्याप्तवचनान् वीरान् प्रतिपत्तिविशारदान् । कुलीनात् सत्त्वसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ॥ २३ ॥ देशकालविधानज्ञान् भर्तृकार्यहितैषिणः । नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजन् कुर्वीत मन्त्रिणः ॥ २४ ॥ राजन्! जो बोलनेमें कुशल, शौर्यसम्पन्न, प्रत्येक बातको ठीक-ठीक समझनेमें निपुण, कुलीन, सत्त्वयुक्त, संकेत समझनेवाले, निष्ठुरतासे रहित (दयालु), देश और कालके विधानको जाननेवाले तथा स्वामीके कार्य एवं हितकी सिद्धि चाहनेवाले हों, ऐसे पुरुषोंको सदा सभी प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये मन्त्री बनाना चाहिये ॥ हीनतेजोऽभिसंसृष्टो नैव जातु व्यवस्यति । अवश्यं जनयत्येव सर्वकर्मसु संशयम् ॥ २५ ॥ तेजोहीन मन्त्रीके सम्पर्कमें रहनेवाला राजा कभी कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर सकता। वैसा मन्त्री सभी कार्योंमें अवश्य ही संशय उत्पन्न कर देता है ॥ २५ ॥ एवमल्पश्रुतो मन्त्री कल्याणाभिजनोऽप्युत । धर्मार्थकामसंयुक्तो नालं मन्त्रं परीक्षितुम् ॥ २६ ॥ इसी प्रकार जो मन्त्री उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी शास्त्रोंका बहुत कम ज्ञान रखता हो, वह धर्म, अर्थ और कामसे संयुक्त होकर भी गुप्त मन्त्रणाकी परीक्षा नहीं कर सकता ॥ २६ ॥ तथैवानभिजातोऽपि काममस्तु बहुश्रुतः । अनायक इवाचक्षुर्मुह्यत्यणुषु कर्मसु ॥ २७ ॥ वैसे ही जो अच्छे कुलमें उत्पन्न नहीं है, वह भले ही अनेक शास्त्रोंका विद्वान् हो, किंतु नायकरहित सैनिक तथा नेत्रहीन मनुष्यकी भाँति वह छोटे-छोटे कार्योंमें भी मोहित हो जाता है—कर्तव्याकर्तव्यका विवेक नहीं कर पाता ॥ २७ ॥ यो वाप्यस्थिरसंकल्पो बुद्धिमानागतागमः । उपायज्ञोऽपि नालं स कर्म प्रापयितुं चिरम् ॥ २८ ॥

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