महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 571, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिसका संकल्प स्थिर नहीं है, वह बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ और उपायोंका जानकार होनेपर भी किसी कार्यको दीर्घकालमें भी पूरा नहीं कर सकता ॥ २८ ॥
केवलात् पुनरादानात् कर्मणो नोपपद्यते ।
परामर्शो विशेषाणामश्रुतस्येह दुर्मतेः ॥ २९ ॥
जिसकी बुद्धि खोटी है तथा जिसे शास्त्रोंका बिल्कुल ज्ञान नहीं है, वह केवल मन्त्रीका कार्य हाथमें ले लेने मात्रसे सफल नहीं हो सकता। विशेष कार्योंके विषयमें उसका दिया हुआ परामर्श युक्तिसंगत नहीं होता है ॥ २९ ॥
मन्त्रिण्यननुरक्ते तु विश्वासो नोपपद्यते ।
तस्मादननुरक्ताय नैव मन्त्रं प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥
जिस मन्त्रीका राजाके प्रति अनुराग न हो, उसका विश्वास करना ठीक नहीं है; अतः अनुरागरहित मन्त्रीके सामने अपने गुप्त विचारको प्रकट न करे ॥ ३० ॥
व्यथयेद्धि स राजानं मन्त्रिभिः सहितोऽनृजुः ।
मारुतोपहितच्छिद्रैः प्रविश्याग्निरिव द्रुमम् ॥ ३१ ॥
वह कपटी मन्त्री यदि गुप्त विचारोंको जान ले तो अन्य मन्त्रियोंके साथ मिलकर राजाको उसी प्रकार पीड़ा देता है, जैसे आग हवासे भरे हुए छेदोंमें घुसकर समूचे वृक्षको भस्म कर डालती है ॥ ३१ ॥
संक्रुद्धश्चैकदा स्वामी स्थानाच्चैवापकर्षति ।
वाचा क्षिपति संरब्धः पुनः पश्चात् प्रसीदति ॥ ३२ ॥
राजा एक बार कुपित होकर मन्त्रीको उसके स्थानसे हटा देता है और रोषमें भरकर वाणीद्वारा उसपर आक्षेप भी करता है; परंतु फिर अन्तमें प्रसन्न हो जाता है ॥ ३२ ॥
तानि तान्यनुरक्तेन शक्यानि हि तितिक्षितुम् ।
मन्त्रिणां च भवेत् क्रोधो विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ ३३ ॥
राजाके इन सब बर्तावोंको वही मन्त्री सह सकता है, जिसका उसके प्रति अनुराग हो। अनुरागशून्य मन्त्रियोंका क्रोध वज्रपातके समान भयंकर होता है ॥ ३३ ॥
यस्तु संसहते तानि भर्तुः प्रियचिकीर्षया ।
समानसुखदुःखं तं पृच्छेदर्थेषु मानवम् ॥ ३४ ॥
जो मन्त्री स्वामीका प्रिय करनेकी इच्छासे उसके उन सभी बर्तावोंको सह लेता है, वही अनुरक्त है। वह राजाके सुख-दुःखको अपना ही सुख-दुःख मानता है। ऐसे ही मनुष्यसे राजाको सभी कार्योंमें सलाह पूछनी चाहिये ॥ ३४ ॥
अनृजुस्त्वनुरक्तोऽपि सम्पन्नश्चेतरैर्गुणैः ।
राज्ञः प्रज्ञानयुक्तोऽपि न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ३५ ॥
जो अनुरक्त हो, अन्यान्य गुणोंसे सम्पन्न हो और बुद्धिमान् हो, वह भी यदि सरल स्वभावका न हो तो राजाकी गुप्त सलाहको सुननेका अधिकारी नहीं है ॥ ३५ ॥