महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 640, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषण्णवतितमोऽध्यायः
राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा
भीष्म उवाच
नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपतिः ।
अधर्मविजयं लब्ध्वा को नु मन्येत भूमिपः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! किसी भी भूपालको अधर्मके द्वारा पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा कभी नहीं करनी चाहिये। अधर्मसे विजय पाकर कौन राजा सम्मानित हो सकता है? ॥ १ ॥
अधर्मयुक्तो विजयो ह्यध्रुवोऽस्वर्ग्य एव च ।
सादयत्येष राजानं महीं च भरतर्षभ ॥ २ ॥
अधर्मसे पायी हुई विजय स्वर्गसे गिरानेवाली और अस्थायी होती है। भरतश्रेष्ठ! ऐसी विजय राजा और राज्य दोनोंका पतन कर देती है ॥ २ ॥
विशीर्णकवचं चैव तवास्मीति च वादिनम् ।
कृताञ्जलिं न्यस्तशस्त्रं गृहीत्वा न हि हिंसयेत् ॥ ३ ॥
जिसका कवच छिन्न-भिन्न हो गया हो, जो 'मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहा हो और हाथ जोड़े खड़ा हो अथवा जिसने हथियार रख दिये हों, ऐसे विपक्षी योद्धाको कैद करके मारे नहीं ॥ ३ ॥
बलेन विजितो यश्च न तं युध्येत भूमिपः ।
संवत्सरं विप्रणयेत् तस्माज्जातः पुनर्भवेत् ॥ ४ ॥
जो बलके द्वारा पराजित कर दिया गया हो, उसके साथ राजा कदापि युद्ध न करे। उसे कैद करके एक सालतक अनुकूल रहनेकी शिक्षा दे; फिर उसका नया जन्म होता है। वह विजयी राजाके लिये पुत्रके समान हो जाता है (इसलिये एक साल बाद उसे छोड़ देना चाहिये) ॥
नार्वाक्संवत्सरात् कन्या प्रष्टव्या विक्रमाहृता ।
एवमेव धनं सर्वं यच्चान्यत्सहसाऽऽहृतम् ॥ ५ ॥
यदि राजा किसी कन्याको अपने पराक्रमसे हरकर ले आवे तो एक सालतक उससे कोई प्रश्न न करे (एक सालके बाद पूछनेपर यदि वह कन्या किसी दूसरेको वरण करना चाहे तो उसे लौटा देना चाहिये)। इसी प्रकार सहसा छलसे अपहरण करके लाये हुए सम्पूर्ण धनके विषयमें भी समझना चाहिये (उसे भी एक सालके बाद उसके स्वामीको लौटा देना चाहिये) ॥ ५ ॥
न तु वध्यधनं तिष्ठेत् पिबेयुर्ब्राह्मणाः पयः ।