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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा

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षण्णवतितमोऽध्यायः

राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा

भीष्म उवाच

नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपतिः ।
अधर्मविजयं लब्ध्वा को नु मन्येत भूमिपः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! किसी भी भूपालको अधर्मके द्वारा पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा कभी नहीं करनी चाहिये। अधर्मसे विजय पाकर कौन राजा सम्मानित हो सकता है? ॥ १ ॥

अधर्मयुक्तो विजयो ह्यध्रुवोऽस्वर्ग्य एव च ।
सादयत्येष राजानं महीं च भरतर्षभ ॥ २ ॥
अधर्मसे पायी हुई विजय स्वर्गसे गिरानेवाली और अस्थायी होती है। भरतश्रेष्ठ! ऐसी विजय राजा और राज्य दोनोंका पतन कर देती है ॥ २ ॥

विशीर्णकवचं चैव तवास्मीति च वादिनम् ।
कृताञ्जलिं न्यस्तशस्त्रं गृहीत्वा न हि हिंसयेत् ॥ ३ ॥
जिसका कवच छिन्न-भिन्न हो गया हो, जो 'मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहा हो और हाथ जोड़े खड़ा हो अथवा जिसने हथियार रख दिये हों, ऐसे विपक्षी योद्धाको कैद करके मारे नहीं ॥ ३ ॥

बलेन विजितो यश्च न तं युध्येत भूमिपः ।
संवत्सरं विप्रणयेत् तस्माज्जातः पुनर्भवेत् ॥ ४ ॥
जो बलके द्वारा पराजित कर दिया गया हो, उसके साथ राजा कदापि युद्ध न करे। उसे कैद करके एक सालतक अनुकूल रहनेकी शिक्षा दे; फिर उसका नया जन्म होता है। वह विजयी राजाके लिये पुत्रके समान हो जाता है (इसलिये एक साल बाद उसे छोड़ देना चाहिये) ॥

नार्वाक्संवत्सरात् कन्या प्रष्टव्या विक्रमाहृता ।
एवमेव धनं सर्वं यच्चान्यत्सहसाऽऽहृतम् ॥ ५ ॥
यदि राजा किसी कन्याको अपने पराक्रमसे हरकर ले आवे तो एक सालतक उससे कोई प्रश्न न करे (एक सालके बाद पूछनेपर यदि वह कन्या किसी दूसरेको वरण करना चाहे तो उसे लौटा देना चाहिये)। इसी प्रकार सहसा छलसे अपहरण करके लाये हुए सम्पूर्ण धनके विषयमें भी समझना चाहिये (उसे भी एक सालके बाद उसके स्वामीको लौटा देना चाहिये) ॥ ५ ॥

न तु वध्यधनं तिष्ठेत् पिबेयुर्ब्राह्मणाः पयः ।

युञ्जीरन्नप्यनडुहः क्षन्तव्यं वा तदा भवेत् ॥ ६ ॥
चोर आदि अपराधियोंका धन लाया गया हो तो उसे अपने पास न रखे (सार्वजनिक कार्योंमें लगा दे) और यदि गौ छीनकर लायी गयी हो तो उसका दूध स्वयं न पीकर ब्राह्मणोंको पिलावे। बैल हों तो उन्हें ब्राह्मणलोग ही गाड़ी आदिमें जोतें अथवा उन सब अपहृत वस्तुओं या धनका स्वामी आकर क्षमा-प्रार्थना करे तो उसे क्षमा करके उसका धन उसे लौटा देना चाहिये ॥ ६ ॥

राज्ञा राजैव योद्धव्यस्तथा धर्मो विधीयते ।
नान्यो राजानमभ्यस्येदराजन्यः कथञ्चन ॥ ७ ॥
राजाको राजाके साथ ही युद्ध करना चाहिये। उसके लिये यही धर्म विहित है। जो राजा या राजकुमार नहीं है, उसे किसी प्रकार भी राजापर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥

अनीकयोः संहतयोर्यदीयाद् ब्राह्मणोऽन्तरा ।
शान्तिमिच्छन्नुभयतो न योद्धव्यं तदा भवेत् ॥ ८ ॥
दोनों ओरकी सेनाओंके भिड़ जानेपर यदि उनके बीचमें संधि करानेकी इच्छासे ब्राह्मण आ जाय तो दोनों पक्षवालोंको तत्काल युद्ध बंद कर देना चाहिये ॥ ८ ॥

मर्यादां शाश्वतीं भिन्द्याद् ब्राह्मणं योऽभिलङ्घयेत् ।
अथ चेल्लङ्घयेदेव मर्यादां क्षत्रियब्रुवः ॥ ९ ॥
असंख्येयस्तदूर्ध्वं स्यादानादेयश्च संसदि ।
इन दोनोंमेंसे जो कोई भी पक्ष ब्राह्मणका तिरस्कार करता है, वह सनातनकालसे चली आयी हुई मर्यादाको तोड़ता है। यदि अपनेको क्षत्रिय कहनेवाला अधम योद्धा उस मर्यादाका उल्लंघन कर ही डाले तो उसके बादसे उसे क्षत्रियजातिके अंदर नहीं गिनना चाहिये और क्षत्रियोंकी सभामें उसे स्थान भी नहीं देना चाहिये ॥ ९ १/२ ॥

यस्तु धर्मविलोपेन मर्यादाभेदनेन च ॥ १० ॥
तां वृत्तिं नानुवर्तेत विजिगीषुर्महीपतिः ।
धर्मलब्धाद्धि विजयाल्लाभः कोऽभ्यधिको भवेत् ॥ ११ ॥
जो कोई धर्मका लोप और मर्यादाको भंग करके विजय पाता है, उसके इस बर्तावका विजयाभिलाषी नरेशको अनुसरण नहीं करना चाहिये। धर्मके द्वारा प्राप्त हुई विजयसे बढ़कर दूसरा कौन-सा लाभ हो सकता है? ॥

सहसानार्यभूतानि क्षिप्रमेव प्रसादयेत् ।
सान्त्वेन भोगदानेन स राज्ञां परमो नयः ॥ १२ ॥
विजयी राजाको चाहिये कि वह मधुर वचन बोलकर और उपभोगकी वस्तुएँ देकर अनार्य (म्लेच्छ आदि) प्रजाको शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न कर ले। यही राजाओंकी सर्वोत्तम नीति है ॥ १२ ॥

भुज्यमाना ह्ययोगेन स्वराष्ट्रादभितापिताः । अमित्रास्तमुपासीरन् व्यसनौघप्रतीक्षिणः ॥ १३ ॥ यदि ऐसा न करके अनुचित कठोरताके द्वारा उनपर शासन किया जाता है तो वे दुखी होकर अपने देशसे चले जाते हैं और शत्रु बनकर विजयी राजाकी विपत्तिके समयकी बाट देखते हुए कहीं पड़े रहते हैं ॥ १३ ॥

अमित्रोपग्रहं चास्य ते कुर्युः क्षिप्रमापदि । संतुष्टाः सर्वतो राजन् राजव्यसनकाङ्क्षिणः ॥ १४ ॥ राजन्! जब विजयी राजापर कोई विपत्ति आ जाती है, तब वे राजापर संकट पड़नेकी इच्छा रखनेवाले लोग विपक्षियोंद्वारा सब प्रकारसे संतुष्ट हो राजाके शत्रुओंका पक्ष ग्रहण कर लेते हैं ॥ १४ ॥

नामित्रो विनिकर्तव्यो नातिच्छेद्यः कथञ्चन । जीवितं ह्यप्यतिच्छिन्नः संत्यजेच्च कदाचन ॥ १५ ॥ शत्रुके साथ छल नहीं करना चाहिये। उसे किसी प्रकार भी अत्यन्त उच्छिन्न करना उचित नहीं है। अत्यन्त क्षत-विक्षत कर देनेपर वह कभी अपने जीवनका त्याग भी कर सकता है ॥ १५ ॥

अल्पेनापि च संयुक्तस्तुष्यत्येव नराधिपः । शुद्धं जीवितमेवापि तादृशो बहु मन्यते ॥ १६ ॥ राजा थोड़े-से लाभसे भी संयुक्त होनेपर संतुष्ट हो जाता है। वैसा नरेश निर्दोष जीवनको ही बहुत अधिक महत्त्व देता है ॥ १६ ॥

यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रियराजकः । संतुष्टभृत्यसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥ १७ ॥ जिस राजाका देश समृद्धिशाली, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा राजभक्त होता है और जिसके सेवक एवं मन्त्री संतुष्ट रहते हैं, उसीकी जड़ मजबूत मानी जाती है ॥ १७ ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्या ये चान्ये श्रुतसत्तमाः । पूजार्हाः पूजिता यस्य स वै लोकविदुच्यते ॥ १८ ॥ जो राजा ऋत्विज्, पुरोहित, आचार्य तथा अन्यान्य पूजाके पात्र शास्त्रज्ञोंका सत्कार करता है, वही लोक-गतिको जाननेवाला कहा जाता है ॥ १८ ॥

एतेनैव च वृत्तेन महीं प्राप सुरोत्तमः । अनेन चेन्द्रविषयं विजिगीषन्ति पार्थिवाः ॥ १९ ॥ इसी बर्तावसे देवराज इन्द्रने राज्य पाया था और इसी बर्तावके द्वारा भूपालगण स्वर्गलोकपर विजय पाना चाहते हैं ॥ १९ ॥

भूमिवर्जं धनं राजा जित्वा राजन् महाहवे । अपि चान्नौषधीः शश्वदाजहार प्रतर्दनः ॥ २० ॥

राजन्! पूर्वकालमें राजा प्रतर्दन महासमरमें विजय प्राप्त करके पराजित राजाकी भूमिको छोड़कर शेष सारा धन, अन्न एवं औषध अपनी राजधानीमें ले आये ॥ २० ॥

अग्निहोत्राग्निशेषं च हविर्भोजनमेव च । आजहार दिवोदासस्ततो विप्रकृतोऽभवत् ॥ २१ ॥

राजा दिवोदास अग्निहोत्र, यज्ञका अंगभूत हविष्य तथा भोजन भी हर लाये थे। इसीसे वे तिरस्कृत हुए ॥

सराजकानि राष्ट्राणि नाभागो दक्षिणां ददौ । अन्यत्र श्रोत्रियस्वाच्च तापसार्थाच्च भारत ॥ २२ ॥

भरतनन्दन! राजा नाभागने श्रोत्रिय और तापसके धनको छोड़कर शेष सारा राष्ट्र दक्षिणारूपमें ब्राह्मणोंको दे दिया ।।

उच्चावचानि वित्तानि धर्मज्ञानां युधिष्ठिर । आसन् राज्ञां पुराणानां सर्वं तन्मम रोचते ॥ २३ ॥

युधिष्ठिर! प्राचीन धर्मज्ञ राजाओंके पास जो नाना प्रकारके धन थे, वे सब मुझे भी अच्छे लगते हैं ।। २३ ।।

सर्वविद्यातिरेकेण जयमिच्छेन्महीपतिः । न मायया न दम्भेन य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ २४ ॥

जिस राजाको अपना वैभव बढ़ानेकी इच्छा हो, वह सम्पूर्ण विद्याओंके उत्कर्षद्वारा विजय पानेकी इच्छा करे; दम्भ या पाखण्डद्वारा नहीं ।। २४ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९६ ।।

शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्गतिका वर्णन

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सप्तनवतितमोऽध्यायः

शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्गतिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

क्षत्रधर्माद्धि पापीयान्न धर्मोऽस्ति नराधिप ।
अपयानेन युद्धेन राजा हन्ति महाजनम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नरेश्वर! क्षत्रियधर्मसे बढ़कर पापपूर्ण दूसरा कोई धर्म नहीं है; क्योंकि राजा किसी देशपर चढ़ाई करने और युद्ध छेड़नेके द्वारा महान् जन-संहार कर डालता है ॥ १ ॥

अथ स्म कर्मणा केन लोकान् जयति पार्थिवः ।
विद्वन् जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ २ ॥
विद्वन्! भरतश्रेष्ठ! अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि राजाको किस कर्मसे पुण्यलोकोंकी प्राप्ति होती है; अतः यही मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

निग्रहेण च पापानां साधूनां संग्रहेण च ।
यज्ञैर्दानैश्च राजानो भवन्ति शुचयोऽमलाः ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! पापियोंको दण्ड देने और सत्पुरुषोंको आदरपूर्वक अपनानेसे तथा यज्ञोंका अनुष्ठान और दान करनेसे राजा लोग सब प्रकारके दोषोंसे छूटकर निर्मल एवं शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३ ॥

उपरुन्धन्ति राजानो भूतानि विजयार्थिनः ।
त एव विजयं प्राप्य वर्धयन्ति पुनः प्रजाः ॥ ४ ॥
जो राजा विजयकी कामना रखकर युद्धके समय प्राणियोंको कष्ट पहुँचाते हैं, वे ही विजय प्राप्त कर लेनेके बाद पुनः सारी प्रजाकी उन्नति करते हैं ॥ ४ ॥

अपविध्यन्ति पापानि दानयज्ञतपोबलैः ।
अनुग्रहाय भूतानां पुण्यमेषां विवर्धते ॥ ५ ॥
वे दान, यज्ञ और तपके प्रभावसे अपने सारे पाप नष्ट कर डालते हैं; फिर तो प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये उनके पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ ५ ॥

यथैव क्षेत्रनिर्याता निर्यातं क्षेत्रमेव च ।
हिनस्ति धान्यं कक्षं च न च धान्यं विनश्यति ॥ ६ ॥
एवं शस्त्राणि मुञ्चन्तो घ्नन्ति वध्याननेकधा ।

तस्यैषां निष्कृतिः कृत्स्ना भूतानां भावनं पुनः ॥ ७ ॥ जैसे खेतको निरानेवाला किसान जिस खेतकी निराई करता है, उसकी घास आदिके साथ-साथ कितने ही धानके पौधोंको भी काट डालता है तो भी धान नष्ट नहीं होता है (बल्कि निराई करनेके पश्चात् उसकी उपज और बढ़ती है)। इसी प्रकार जो युद्धमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करके राजसैनिक वध करने योग्य शत्रुओंका अनेक प्रकारसे वध करते हैं, राजाके उस कर्मका यही पूरा-पूरा प्रायश्चित्त है कि उस युद्धके पश्चात् उस राज्यके प्राणियोंकी पुनः सब प्रकारसे उन्नति करे ॥ ६-७ ॥

यो भूतानि धनाक्रान्त्या वधात् क्लेशाच्च रक्षति । दस्युभ्यः प्राणदानात् स धनदः सुखदो विराट् ॥ ८ ॥ जो राजा समस्त प्रजाको धनक्षय, प्राणनाश और दुःखोंसे बचाता है, लुटेरोंसे रक्षा करके जीवन-दान देता है, वह प्रजाके लिये धन और सुख देनेवाला परमेश्वर माना गया है ॥ ८ ॥

स सर्वयज्ञैरीजानो राजाथाभयदक्षिणैः । अनुभूयेह भद्राणि प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम् ॥ ९ ॥ वह राजा सम्पूर्ण यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करके प्राणियोंको अभय-दान देकर इहलोकमें सुख भोगता है और परलोकमें भी इन्द्रके समान स्वर्गलोकका अधिकारी होता है ॥ ९ ॥

ब्राह्मणार्थे समुत्पन्ने योऽरिभिः सृत्य युध्यति । आत्मानं यूपमुत्सृज्य स यज्ञोऽनन्तदक्षिणः ॥ १० ॥ ब्राह्मणकी रक्षाका अवसर आनेपर जो आगे बढ़कर शत्रुओंके साथ युद्ध छेड़ देता है और अपने शरीरको यूपकी भाँति निछावर कर देता है, उसका वह त्याग अनन्त दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञके ही तुल्य है ॥ १० ॥

अभीतो विकिरन् शत्रून् प्रतिगृह्य शरांस्तथा । न तस्मात्त्रिदशाःश्रेयो भुवि पश्यन्ति किञ्चन ॥ ११ ॥ जो निर्भय हो शत्रुओंपर बाणोंकी वर्षा करता और स्वयं भी बाणोंका आघात सहता है, उस क्षत्रियके लिये उस कर्मसे बढ़कर देवतालोग इस भूतलपर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य नहीं देखते हैं ॥ ११ ॥

तस्य शस्त्राणि यावन्ति त्वचं भिन्दन्ति संयुगे । तावतः सोऽश्नुते लोकान् सर्वकामदुहोऽक्षयान् ॥ १२ ॥ युद्धस्थलमें उस वीर योद्धाकी त्वचाको जितने शस्त्र विदीर्ण करते हैं, उतने ही सर्वकामनापूरक अक्षय लोक उसे प्राप्त होते हैं ॥ १२ ॥

यदस्य रुधिरं गात्रादाहवे सम्प्रवर्तते । सह तेनैव रक्तेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३ ॥

समरभूमिमें उसके शरीरसे जो रक्त बहता है, उस रक्तके साथ ही वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।

यानि दुःखानि सहते क्षत्रियो युधि तापितः ।
तेन तेन तपो भूय इति धर्मविदो विदुः ॥ १४ ॥
युद्धमें बाणोंसे पीड़ित हुआ क्षत्रिय जो-जो दुःख सहता है, उस-उस कष्टके द्वारा उसके तपकी ही उत्तरोत्तर वृद्धि होती है; ऐसी धर्मज्ञ पुरुषोंकी मान्यता है ।।

पृष्ठतो भीरवः संख्ये वर्तन्तेऽधर्मपूरुषाः ।
शूराच्छरणमिच्छन्तः पर्जन्यादिव जीवनम् ॥ १५ ॥
जैसे समस्त प्राणी बादलसे जीवनदायक जलकी इच्छा रखते हैं, उसी प्रकार शूरवीरसे अपनी रक्षा चाहते हुए डरपोक एवं नीच श्रेणीके मनुष्य युद्धमें वीर योद्धाओंके पीछे खड़े रहते हैं ।। १५ ।।

यदि शूरस्तथा क्षेमं प्रतिरक्षेद् यथाभये ।
प्रतिरूपं जनं कुर्यान्न चेत् तद्धर्तते तथा ॥ १६ ॥
अभयकालके समान ही उस भयके समय भी यदि कोई शूरवीर उस भीरु पुरुषकी सकुशल रक्षा कर लेता है तो उसके प्रति वह अपने अनुरूप उपकार एवं पुण्य करता है। यदि पृष्ठवर्ती पुरुषको वह अपने-जैसा न बना सके तो भी पूर्व कथित पुण्यका भागी तो होता ही है ।।

यदि ते कृतमाज्ञाय नमस्कुर्युः सदैव तम् ।
युक्तं न्याय्यं च कुर्युस्ते न च तद् वर्तते तथा ॥ १७ ॥
यदि वे रक्षा पाये हुए मनुष्य कृतज्ञ होकर सदैव उस शूरवीरके सामने नतमस्तक होते रहें, तभी उसके प्रति उचित एवं न्यायसंगत कर्तव्यका पालन कर पाते हैं; अन्यथा उनकी स्थिति इसके विपरीत होती है ।। १७ ।।

पुरुषाणां समानानां दृश्यते महदन्तरम् ।
संग्रामेऽनीकवेलायामुत्कृष्टेऽभिपतन्त्युत ॥ १८ ॥
सभी पुरुष देखनेमें समान होते हैं; परंतु युद्धस्थलमें जब सैनिकोंके परस्पर भिड़नेका समय आता है और चारों ओरसे वीरोंकी पुकार होने लगती है, उस समय उनमें महान् अन्तर दृष्टिगोचर होता है। एक श्रेणीके वीर तो निर्भय होकर शत्रुओंपर टूट पड़ते हैं और दूसरी श्रेणीके लोग प्राण बचानेकी चिन्तामें पड़ जाते हैं ।। १८ ।।

पतत्यभिमुखः शूरः पराङ् भीरुः पलायते ।
आस्थाय स्वर्ग्यमध्वानं सहायान् विषमे त्यजेत् ॥ १९ ॥
शूरवीर शत्रुके सम्मुख वेगसे आगे बढ़ता है और भीरु पुरुष पीठ दिखाकर भागने लगता है। वह स्वर्गलोकके मार्गपर पहुँचकर भी अपने सहायकोंको उस संकटके समय अकेला छोड़ देता है ।। १९ ।।

मा स्म तांस्तादृशांस्तात जनिष्ठाः पुरुषाधमान् । ये सहायान् रणे हित्वा स्वस्तिमन्तो गृहान् ययुः ॥ २० ॥ तात! जो लोग रणभूमिमें अपने सहायकोंको छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर लौट जाते हैं, वैसे नराधमोंको तुम कभी पैदा मत करना ॥ २० ॥ अस्वस्ति तेभ्यः कुर्वन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः । त्यागेन यः सहायानां स्वान् प्राणांस्त्रातुमिच्छति ॥ २१ ॥ तं हन्युः काष्ठलोष्ठैर्वा दहेयुर्वा कटाग्निना । पशुवन्मारयेयुर्वा क्षत्रिया ये स्युरीदृशाः ॥ २२ ॥ उनके लिये इन्द्र आदि देवता अमंगल मनाते हैं। जो सहायकोंको छोड़कर अपने प्राण बचानेकी इच्छा रखता है, ऐसे कायरको उसके साथी क्षत्रिय लाठी या ढेलोंसे पीटें अथवा घासके ढेरकी आगमें जला दें या उसे पशुकी भाँति गला घोटकर मार डालें ॥ २१-२२ ॥ अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् । विसृजन् श्लेष्ममूत्राणि कृपणं परिदेवयन् ॥ २३ ॥ अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति । क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥ २४ ॥ खाटपर सोकर मरना क्षत्रियके लिये अधर्म है। जो क्षत्रिय कफ और मल-मूत्र छोड़ता तथा दुखी होकर विलाप करता हुआ बिना घायल हुए शरीरसे मृत्युको प्राप्त हो जाता है, उसके इस कर्मकी प्राचीन धर्मको जानने-वाले विद्वान् पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ २३-२४ ॥ न गृहे मरणं तात क्षत्रियाणां प्रशस्यते । शौटीराणामशौटीर्यमधर्मं कृपणं च तत् ॥ २५ ॥ क्योंकि तात! वीर क्षत्रियोंका घरमें मरण हो, यह उनके लिये प्रशंसाकी बात नहीं है। वीरोंके लिये यह कायरता और दीनता अधर्मकी बात है ॥ २५ ॥ इदं दुःखं महत् कष्टं पापीय इति निष्टनन् । प्रतिध्वस्तमुखः पूतिरमात्याननुशोचयन् ॥ २६ ॥ अरोगाणां स्पृहयते मुहुर्मृत्युमपीच्छति । वीरो दृप्तोऽभिमानी च नेदृशं मृत्युमर्हति ॥ २७ ॥ ‘यह बड़ा दुःख है। बड़ी पीड़ा हो रही है! यह मेरे किसी महान् पापका सूचक है।’ इस प्रकार आर्तनाद करना, विकृत-मुख हो जाना, दुर्गन्धित शरीरसे मन्त्रियोंके लिये निरन्तर शोक करना, नीरोग मनुष्योंकी-सी स्थिति प्राप्त करनेकी कामना करना और वर्तमान रुग्णावस्थामें बारंबार मृत्युकी इच्छा रखना—ऐसी मौत किसी स्वाभिमानी वीरके योग्य नहीं है ॥ २६-२७ ॥ रणेषु कदनं कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः ।

तीक्ष्णैः शस्त्रैरभिक्लिष्टः क्षत्रियो मृत्युमर्हति ॥ २८ ॥ क्षत्रियको तो चाहिये कि अपने सजातीय बन्धुओंसे घिरकर समरांगणमें महान् संहार मचाता हुआ तीखे शस्त्रोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर प्राणोंका परित्याग करे—वह ऐसी ही मृत्युके योग्य है ॥ २८ ॥

शूरो हि काममन्युभ्यामाविष्टो युध्यते भृशम् ।
हन्यमानानि गात्राणि परैर्नैवावबुध्यते ॥ २९ ॥
शूरवीर क्षत्रिय विजयकी कामना और शत्रुके प्रति रोषसे युक्त हो बड़े वेगसे युद्ध करता है। शत्रुओंद्वारा क्षत-विक्षत किये जानेवाले अपने अंगोंकी उसे सुध-बुध नहीं रहती है ॥ २९ ॥

स संख्ये निधनं प्राप्य प्रशस्तं लोकपूजितम् ।
स्वधर्मं विपुलं प्राप्य शक्रस्येति सलोकताम् ॥ ३० ॥
वह युद्धमें लोकपूजित सर्वश्रेष्ठ मृत्यु एवं महान् धर्मको पाकर इन्द्रलोकमें चला जाता है ॥ ३० ॥

सर्वोपायै रणमुखमातिष्ठंस्त्यक्तजीवितः ।
प्राप्नोतीन्द्रस्य सालोक्यं शूरः पृष्ठमदर्शयन् ॥ ३१ ॥
शूरवीर प्राणोंका मोह छोड़कर युद्धके मुहानेपर खड़ा होकर सभी उपायोंसे जूझता है और शत्रुको कभी पीठ नहीं दिखाता है; ऐसा शूरवीर इन्द्रके समान लोकका अधिकारी होता है ॥ ३१ ॥

यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवारितः ।
अक्षयाल्लंभते लोकान् यदि दैन्यं न सेवते ॥ ३२ ॥
शत्रुओंसे घिरा हुआ शूरवीर यदि मनमें दीनता न लावे तो वह जहाँ कहीं भी मारा जाय, अक्षय लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥

इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन

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अष्टनवतितमोऽध्यायः

इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन

युधिष्ठिर उवाच

ये लोका युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् ।
भवन्ति निधनं प्राप्य तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो शूरवीर शत्रुके साथ डटकर युद्ध करते हैं और कभी पीठ नहीं दिखाते, वे समरांगणमें मृत्युको प्राप्त होकर किन लोकोंमें जाते हैं, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अम्बरीषस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें अम्बरीष और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
अम्बरीषो हि नाभागिः स्वर्गं गत्वा सुदुर्लभम् ।
ददर्श सुरलोकस्थं शक्रेण सचिवं सह ॥ ३ ॥
नाभागपुत्र अम्बरीषने अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गलोकमें जाकर देखा कि उनका सेनापति देवलोकमें इन्द्रके साथ विराजमान है ॥ ३ ॥
सर्वतेजोमयं दिव्यं विमानवरमास्थितम् ।
उपर्युपरि गच्छन्तं स्वं वै सेनापतिं प्रभुम् ॥ ४ ॥
स दृष्ट्वोपरि गच्छन्तं सेनापतिमुदारधीः ।
ऋद्धिं दृष्ट्वा सुदेवस्य विस्मितः प्राह वासवम् ॥ ५ ॥
वह सम्पूर्णतः तेजस्वी, दिव्य एवं श्रेष्ठ विमानपर बैठकर ऊपर-ऊपर चला जा रहा था। अपने शक्तिशाली सेनापतिको अपनेसे भी ऊपर होकर जाते देख सुदेवकी उस समृद्धिका प्रत्यक्ष दर्शन करके उदारबुद्धि राजा अम्बरीष आश्चर्यसे चकित हो उठे और इन्द्रदेवसे बोले ॥ ४-५ ॥

अम्बरीष उवाच

सागरान्तां महीं कृत्स्नामनुशास्य यथाविधि ।

चातुर्वर्ण्ये यथाशास्त्रं प्रवृत्तौ धर्मकाम्यया ॥ ६ ॥ **अम्बरीषने पूछा—**देवराज! मैं समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका विधिपूर्वक शासन और संरक्षण करता था। शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार धर्मकी कामनासे चारों वर्णोंके पालनमें तत्पर रहता था ॥ ६ ॥
ब्रह्मचर्येण घोरेण गुर्वाचारेण सेवया ।
वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्रं च केवलम् ॥ ७ ॥
मैंने घोर ब्रह्मचर्यका पालन करके गुरुके बताये हुए आचार और गुरुकी सेवाके द्वारा धर्मपूर्वक वेदोंका अध्ययन किया तथा राजशास्त्रकी विशेष शिक्षा प्राप्त की ॥
अतिथीन्नन्नपानेन पितृंश्च स्वधया तथा ।
ऋषीन् स्वाध्यायदीक्षाभिर्देवान् यज्ञैरनुत्तमैः ॥ ८ ॥
सदा ही अन्न-पान देकर अतिथियोंका, श्राद्धकर्म करके पितरोंका, स्वाध्यायकी दीक्षा लेकर ऋषियोंका तथा उत्तमोत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका पूजन किया ॥ ८ ॥
क्षत्रधर्मे स्थितो भूत्वा यथाशास्त्रं यथाविधि ।
उदीक्षमाणः पृतनां जयामि युधि वासव ॥ ९ ॥
देवेन्द्र! मैं शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्षत्रिय-धर्ममें स्थित होकर सेनाकी देख-भाल करता और युद्धमें शत्रुओंपर विजय पाता था ॥ ९ ॥
देवराज सुदेवोऽयं मम सेनापतिः पुरा ।
आसीद् योधः प्रशान्तात्मा सोऽयं कस्मादतीव माम् ॥ १० ॥
देवराज! यह सुदेव पहले मेरा सेनापति था। शान्त स्वभावका एक सैनिक था; फिर यह मुझे लाँघकर कैसे जा रहा है? ॥ १० ॥
अनेन क्रतुभिर्मुख्यैर्नेष्टं नापि द्विजातयः ।
तर्पिता विधिवच्छक्र सोऽयं कस्मादतीव माम् ॥ ११ ॥
(ऐश्वर्यमीदृशं प्राप्तः सर्वदेवैः सुदुर्लभम् ।
इन्द्रदेव! इसने न तो बड़े-बड़े यज्ञ किये और न विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको ही तृप्त किया। वही यह सुदेव आज मुझको लाँघकर ऊपर-ऊपरसे कैसे जा रहा है? इसे ऐसा ऐश्वर्य कहाँसे प्राप्त हो गया, जो सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है? ॥ ११ ॥

शक्र उवाच

यदनेन कृतं कर्म प्रत्यक्षं ते महीपते ॥
पुरा पालयतः सम्यक् पृथिवीं धर्मतो नृप ।
**इन्द्रने कहा—**पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! पूर्वकालमें जब आप धर्मके अनुसार भलीभाँति इस पृथ्वीका पालन कर रहे थे, उस समय सुदेवने जो पराक्रम किया था, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥

शत्रवो निर्जिताः सर्वे ये तवाहितकारिणः ॥
संयमो वियमश्चैव सुयमश्च महाबलः ।
राक्षसा दुर्जया लोके त्रयस्ते युद्धदुर्मदाः ।
पुत्रास्ते शतशृङ्गस्य राक्षसस्य महीपते ॥
महीपाल! उन दिनों आपके तीन शत्रु थे—संयम, वियम और महाबली सुयम। वे सब-के-सब आपका अहित करनेवाले थे। वे शतशृंग नामक राक्षसके पुत्र थे। लोकोंमें किसीके लिये भी उन तीनों रणदुर्मद राक्षसोंपर विजय पाना कठिन था। सुदेवने उन सबको परास्त कर दिया था ॥

अथ तस्मिन् शुभे काले तव यज्ञं वितन्वतः ।
अश्वमेधं महायागं देवानां हितकाम्यया ।
तस्य ते खलु विघ्नार्थं आगता राक्षसास्त्रयः ॥
एक समय जब आप देवताओंके हितकी इच्छासे शुभ मुहूर्तमें अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे, उन्हीं दिनों आपके उस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये वे तीनों राक्षस वहाँ आ पहुँचे ॥

कोटीशतपरीवारां राक्षसानां महाचमूम् ।
परिगृह्य ततः सर्वाः प्रजा बन्दीकृतास्तव ॥
विह्वलाश्च प्रजाः सर्वाः सर्वे च तव सैनिकाः ।
उन्होंने सौ करोड़ राक्षसोंकी विशाल सेना साथ लेकर आक्रमण किया और आपकी समस्त प्रजाओंको पकड़कर बंदी बना लिया। उस समय आपकी समस्त प्रजा और सारे सैनिक व्याकुल हो उठे थे ॥

निराकृतस्त्वया चासीत् सुदेवः सैन्यनायकः ।
तत्रामात्यवचः श्रुत्वा निरस्तः सर्वकर्मसु ॥
उन दिनों सेनापतिके विरुद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर आपने सेनापति सुदेवको अधिकारसे वंचित करके सब कार्योंसे अलग कर दिया था ॥

श्रुत्वा तेषां वचो भूयः सोपधं वसुधाधिप ।
सर्वसैन्यसमायुक्तः सुदेवः प्रेरितस्त्वया ॥
राक्षसानां वधार्थाय दुर्जयानां नराधिप ।
पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! फिर उन्हीं मन्त्रियोंकी कपटपूर्ण बात सुनकर आपने उन दुर्जय राक्षसोंके वधके लिये सेनासहित सुदेवको युद्धमें जानेकी आज्ञा दे दी ॥

नाजित्वा राक्षसीं सेनां पुनरागमनं तव ॥
बन्दीमोक्षमकृत्वा च न चागमनमिष्यते ।
और जाते समय यह कहा—'राक्षसोंकी सेनाको पराजित करके उनके कैदमें पड़ी हुई प्रजा और सैनिकोंका उद्धार किये बिना तुम यहाँ लौटकर मत आना' ॥

सुदेवस्तद्वचः श्रुत्वा प्रस्थानमकरोन्नृप ।। सम्प्राप्तश्च स तं देशं यत्र बन्दीकृताः प्रजाः । पश्यति स्म महाघोरां राक्षसानां महाचमूम् ।। नरेश्वर! आपकी वह बात सुनकर सुदेवने तुरंत ही प्रस्थान किया और वह उस स्थानपर गया, जहाँ आपकी प्रजा बंदी बना ली गयी थी। उसने वहाँ राक्षसोंकी महाभयंकर विशाल सेना देखी ।। दृष्ट्वा संचिन्तयामास सुदेवो वाहिनीपतिः । नेयं शक्या चमूर्जेतुमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः ।। नाम्बरीषः कलामेकामेषां क्षपयितुं क्षमः । दिव्यास्त्रबलभूयिष्ठः किमहं पुनरीदृशः ।। उसे देखकर सेनापति सुदेवने सोचा कि यह विशाल वाहिनी तो इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंसे भी नहीं जीती जा सकती। महाराज अम्बरीष दिव्य अस्त्र एवं दिव्य बलसे सम्पन्न हैं, परंतु वे इस सेनाके सोलहवें भागका भी संहार करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब उनकी यह दशा है, तब मेरे-जैसा साधारण सैनिक इस सेनापर कैसे विजय पा सकता है? ।। ततः सेनां पुनः सर्वां प्रेषयामास पार्थिव । यत्र त्वं सहितः सर्वैर्मन्त्रिभिः सोपधैर्नृप ।। राजन्! यह सोचकर सुदेवने फिर सारी सेनाको वहीं वापस भेज दिया, जहाँ आप उन समस्त कपटी मन्त्रियोंके साथ विराजमान थे ।। ततो रुद्रं महादेवं प्रपन्नो जगतः पतिम् । श्मशाननिलयं देवं तुष्टाव वृषभध्वजम् ।। तदनन्तर सुदेवने श्मशानवासी महादेव जगदीश्वर रुद्रदेवकी शरण ली और उन भगवान् वृषभध्वजका स्तवन किया ।। स्तुत्वा शस्त्रं समादाय स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतः । कारुण्याद् देवदेवेन गृहीतस्तस्य दक्षिणः ।। सपाणिः सह शस्त्रेण दृष्ट्वा चेदमुवाच ह । स्तुति करके वह खड्ग हाथमें लेकर अपना सिर काटनेको उद्यत हो गया। तब देवाधिदेव महादेवने करुणावश सुदेवका वह खड्गसहित दाहिना हाथ पकड़ लिया और उसकी ओर स्नेहपूर्वक देखकर इस प्रकार कहा ।।

रुद्र उवाच

किमिदं साहसं पुत्र कर्तुकामो वदस्व मे । रुद्र बोले—पुत्र! तुम ऐसा साहस क्यों करना चाहते हो? मुझसे कहो ।।

इन्द्र उवाच

स उवाच महादेवं शिरसा त्ववनीं गतः ॥
भगवन् वाहिनीमेनां राक्षसानां सुरेश्वर ।
अशक्तोऽहं रणे जेतुं तस्मात् त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥
गतिर्भव महादेव ममार्तस्य जगत्पते ।
नागन्तव्यमजित्वा च मामाह जगतीपतिः ॥
अम्बरीषो महादेव क्षारितः सचिवैः सह ।
तमुवाच महादेवः सुदेवं पतितं क्षितौ ।
अधोमुखं महात्मानं सत्त्वानां हितकाम्यया ॥
धनुर्वेदं समाहूय सगुणं सहविग्रहम् ।
रथनागाश्वकलिलं दिव्यास्त्रसमलंकृतम् ॥
रथं च सुमहाभागं येन तत् त्रिपुरं हतम् ।
धनुः पिनाकं खड्गं च रौद्रमस्त्रं च शङ्करः ॥
निजघानासुरान् सर्वान् येन देवस्त्र्यम्बकः ।
उवाच च महादेवः सुदेवं वाहिनीपतिम् ॥

इन्द्र कहते हैं—राजन्! तब सुदेवने महादेवजीको पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'भगवन्! सुरेश्वर! मैं इस राक्षस सेनाको युद्धमें नहीं जीत सकता; इसलिये इस जीवनको त्याग देना चाहता हूँ। महादेव! जगत्पते! आप मुझ आर्तको शरण दें। मन्त्रियोंसहित महाराज अम्बरीष मुझपर कुपित हुए बैठे हैं। उन्होंने स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है कि इस सेनाको पराजित किये बिना तुम लौटकर न आना।' तब महादेवजीने पृथ्वीपर नीचे मुख किये पड़े हुए महामना सुदेवसे समस्त प्राणियोंके हितकी कामनासे कुछ कहनेकी इच्छा की। पहले उन्होंने गुण और शरीरसहित धनुर्वेदको बुलाकर रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई सेनाका आवाहन किया, जो दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंसे विभूषित थी। इसके बाद उन्होंने उस महान् भाग्यशाली रथको भी वहाँ उपस्थित कर दिया, जिससे उन्होंने त्रिपुरका नाश किया था। फिर पिनाक नामक धनुष, अपना खड्ग तथा अस्त्र भी भगवान् शंकरने दे दिया, जिसके द्वारा उन भगवान् त्रिलोचनने समस्त असुरोंका संहार किया था। तदनन्तर महादेवजीने सेनापति सुदेवसे इस प्रकार कहा ।।

रुद्र उवाच

रथादस्मात् सुदेव त्वं दुर्जयस्तु सुरासुरैः ।
मायया मोहितो भूमौ न पदं कर्तुमर्हसि ॥
अत्रस्थस्त्रिदशान् सर्वान् जेष्यसे सर्वदानवान् ।
राक्षसांश्च पिशाचांश्च न शक्ता द्रष्टुमीदृशम् ॥
रथं सूर्यसहस्राभं किमु योद्धुं त्वया सह ।

रुद्र बोले—सुदेव! तुम इस रथके कारण देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हो गये हो, परंतु किसी मायासे मोहित होकर अपना पैर पृथ्वीपर न रख देना। इसपर बैठे रहोगे तो समस्त देवताओं और दानवोंको जीत लोगे। यह रथ सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी है। राक्षस और पिशाच ऐसे तेजस्वी रथकी ओर देख भी नहीं सकते; फिर तुम्हारे साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? ॥

इन्द्र उवाच स जित्वा राक्षसान् सर्वान् कृत्वा बन्दीविमोक्षणम् । घातयित्वा च तान् सर्वान् बाहुयुद्धेत्वयं हतः । वियमं प्राप्य भूपाल वियमश्च निपातितः ॥) इन्द्र कहते हैं—राजन्! तत्पश्चात् सुदेवने उस रथके द्वारा समस्त राक्षसोंको जीतकर बंदी प्रजाओंको बन्धनसे छुड़ा दिया और समस्त शत्रुओंका संहार करके वियमके साथ बाहुयुद्ध करते समय स्वयं भी मारा गया, साथ ही इसने उस युद्धमें वियमको भी मार डाला ॥

इन्द्र उवाच एतस्य विततस्तात सुदेवस्य बभूव ह । संग्रामयज्ञः सुमहान् यश्चान्यो युद्ध्यते नरः ॥ १२ ॥ इन्द्र बोले—तात! इस सुदेवने बड़े विस्तारके साथ महान् रणयज्ञ सम्पन्न किया था। दूसरा भी जो मनुष्य युद्ध करता है, उसके द्वारा इसी तरह संग्राम-यज्ञ सम्पादित होता है ॥ १२ ॥ संनद्धो दीक्षितः सर्वो योधः प्राप्य चमूमुखम् । युद्धयज्ञाधिकारस्थो भवतीति विनिश्चयः ॥ १३ ॥ कवच धारण करके युद्धकी दीक्षा लेनेवाला प्रत्येक योद्धा सेनाके मुहानेपर जाकर इसी प्रकार संग्रामयज्ञका अधिकारी होता है। यह मेरा निश्चित मत है ॥ १३ ॥

अम्बरीष उवाच कानि यज्ञे हवींष्यस्मिन् किमाज्यं का च दक्षिणा । ऋत्विजश्चात्र के प्रोक्तास्तन्मे ब्रूहि शतक्रतो ॥ १४ ॥ अम्बरीषने पूछा—शतक्रतो! इस रणयज्ञमें कौन-सा हविष्य है? क्या घृत है? कौन-सी दक्षिणा है और इसमें कौन-कौन-से ऋत्विज् बताये गये हैं? यह मुझसे कहिये ॥ १४ ॥

इन्द्र उवाच ऋत्विजः कुञ्जरास्तत्र वाजिनोऽध्वर्यवस्तथा । हवींषि परमांसानि रुधिरं त्वाज्यमुच्यते ॥ १५ ॥

इन्द्रने कहा—राजन्! इस युद्धयज्ञमें हाथी ही ऋत्विज् हैं, घोड़े अध्वर्यु हैं, शत्रुओंका मांस ही हविष्य है और उनके रक्तको ही घृत कहा जाता है॥ १५॥
शृगालगृध्रकाकोलाः सदस्यास्तत्र पत्रिणः ।
आज्यशेषं पिबन्त्येते हविः प्राश्नन्ति चाध्वरे ॥ १६ ॥
सियार, गीध, कौए तथा अन्य मांसभक्षी पक्षी उस यज्ञशालाके सदस्य हैं, जो यज्ञावशिष्ट घृत (रक्त) को पीते और उस यज्ञमें अर्पित हविष्य (मांस) को खाते हैं॥ १६॥
प्रासतोमरसंघाताः खड्गशक्तिपरश्वधाः ।
ज्वलन्तो निशिताः पीताः स्रुचस्तस्याथ सत्रिणः ॥ १७ ॥
प्रास, तोमरसमूह, खड्ग, शक्ति, फरसे आदि चमचमाते हुए तीखे और पानीदार शस्त्र यज्ञकर्ताके लिये स्रुक्का काम देते हैं॥ १७॥
चापवेगायतस्तीक्ष्णः परकायावभेदनः ।
ऋजुः सुनिशितः पीतः सायकश्च स्रुवो महान् ॥ १८ ॥
धनुषके वेगसे दूरतक जानेके कारण जो विशाल आकार धारण करता है, वह शत्रुके शरीरको विदीर्ण करनेवाला तीखा, सीधा, पैना और पानीदार बाण ही यजमानके हाथमें स्थित महान् स्रुव है॥ १८॥
द्वीपिचर्मावनद्धश्च नागदन्तकृतत्सरुः ।
हस्तिहस्तहरः खड्गः स्फ्यो भवेत् तस्य संयुगे ॥ १९ ॥
जो व्याघ्रचर्मकी म्यानमें बँधा रहता है, जिसकी मूँठ हाथीके दाँतकी बनी होती है तथा जो गजराजोंके शुण्डदण्डको काट लेता है, वह खड्ग उस युद्धमें स्फ्यका काम देता है॥ १९॥
ज्वलितैर्निशितैः प्रासशक्त्यृष्टिसपरश्वधैः ।
शैक्वायसमयैस्तीक्ष्णैरभिघातो भवेद् वसु ॥ २० ॥
संख्यासमयविस्तीर्णमभिजातोद्भवं बहु ।
उज्ज्वल और तेज धारवाले, सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए तथा तीखे प्रास, शक्ति, ऋष्टि और परशु आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा जो आघात किया जाता है, वही उस युद्धयज्ञका बहुसंख्यक, अधिक समयसाध्य और कुलीन पुरुषद्वारा संगृहीत नाना प्रकारका द्रव्य है॥ २० १/२॥
आवेगाद् यच्च रुधिरं संग्रामे स्रवते भुवि ॥ २१ ॥
सास्य पूर्णाहुतिर्होमे समृद्धा सर्वकामधुक् ।
वीरोंके शरीरसे संग्रामभूमिमें बड़े वेगसे जो रक्तकी धारा बहती है, वही उस युद्धयज्ञके होममें समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली समृद्धिशालिनी पूर्णाहुति है॥ २१ १/२॥
छिन्धि भिन्धीति यः शब्दः श्रूयते वाहिनीमुखे ॥ २२ ॥
सामानि सामगास्तस्य गायन्ति यमसादने ।

हविर्धानं तु तस्याहुः परेषां वाहिनीमुखम् ॥ २३ ॥ सेनाके मुहानेपर जो 'काट डालो', फाड़ डालो' आदिका भयंकर शब्द सुना जाता है, वही सामगान है। सैनिकरूपी सामगायक शत्रुओंको यमलोकमें भेजनेके लिये मानो सामगान करते हैं। शत्रुओंकी सेनाका प्रमुख भाग उस वीर यजमानके लिये हविर्धान (हविष्य रखनेका पात्र) बताया गया है ॥ २२-२३ ॥

कुञ्जराणां हयानां च वर्मिणां च समुच्चयः । अग्निः श्येनचितो नाम स च यज्ञे विधीयते ॥ २४ ॥ हाथी, घोड़े और कवचधारी वीर पुरुषोंके समूह ही उस युद्धयज्ञके श्येनचित नामक अग्नि हैं ॥ २४ ॥

उत्तिष्ठते कबन्धोऽत्र सहस्रे निहते तु यः । स यूपस्तस्य शूरस्य खादिरोऽष्टास्रिरुच्यते ॥ २५ ॥ सहस्रों वीरोंके मारे जानेपर जो कबन्ध खड़े दिखायी देते हैं, वे ही मानो उस शूरवीरके यज्ञमें खदिरकाष्ठके बने हुए आठ कोणवाले यूप कहे गये हैं ॥ २५ ॥

इडोपहूताः क्रोशन्ति कुञ्जरास्त्वंकुशेरिताः । व्याघुष्टतलनादेन वषट्कारेण पार्थिव ॥ २६ ॥ उद्गाता तत्र संग्रामे त्रिसामा दुन्दुभिर्नृप । राजन्! वाणीद्वारा ललकारने और महावतोंके अंकुशोंकी मार खानेपर हाथी जो चिग्घाड़ते हैं, कोलाहल और करतलध्वनिके साथ होनेवाली वह चिग्घाड़नेकी आवाज उस यज्ञमें वषट्कार है। नरेश्वर! संग्राममें जिस दुन्दुभिकी गम्भीर ध्वनि होती है, वही सामवेदके तीन मन्त्रोंका पाठ करनेवाला उद्गाता है ॥ २६ १/२ ॥

ब्रह्मस्वे ह्रियमाणे तु त्यक्त्वा युद्धे प्रियां तनुम् ॥ २७ ॥ आत्मानं यूपमुत्सृज्य स यज्ञोऽनन्तदक्षिणः । जब लुटेरे ब्राह्मणके धनका अपहरण करते हों, उस समय वीर पुरुष उनके साथ किये जानेवाले युद्धमें अपने प्रिय शरीरके त्यागके लिये जो उद्यम करता है अथवा जो देहरूपी यूपका उत्सर्ग करके प्रहार ही कर बैठता है, उसका वह युद्ध ही अनन्त दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ कहलाता है ॥ २७ १/२ ॥

भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद् वाहिनीमुखे ॥ २८ ॥ न भयाद् विनिवर्तेत तस्य लोका यथा मम । जो शूरवीर अपने स्वामीके लिये सेनाके मुहानेपर खड़ा होकर पराक्रम प्रकट करता है और भयसे कभी पीठ नहीं दिखाता, उसको मेरे समान लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ २८ १/२ ॥

नीलचर्मावृतैः खड्गैर्बाहुभिः परिघोपमैः ॥ २९ ॥ यस्य वेदिरुपस्तीर्णा तस्य लोका यथा मम ।

जिसके युद्ध-यज्ञकी वेदी नीले चमड़ेकी बनी हुई म्यानके भीतर रखी जानेवाली तलवारों तथा परिघके समान मोटी-मोटी भुजाओंसे बिछ जाती है, उसे वैसे ही लोक प्राप्त होते हैं, जैसे मुझे मिले हैं ॥ २९ १/२ ॥

यस्तु नापेक्षते कंचित् सहायं विजये स्थितः ॥ ३० ॥
विगाह्य वाहिनीमध्यं तस्य लोका यथा मम ।
जो विजयके लिये युद्धमें डटा रहकर शत्रु की सेनामें घुस जाता है और दूसरे किसी भी सहायककी अपेक्षा नहीं रखता, उसे मेरे समान ही लोक प्राप्त होते हैं ॥

यस्य शोणितसंघाता भेरीमण्डूककच्छपा ॥ ३१ ॥
वीरास्थिशर्करा दुर्गा मांसशोणितकर्दमा ।
असिचर्मप्लवा घोरा केशशैवलशाद्वला ॥ ३२ ॥
अश्वनागरथैश्चैव संच्छिन्नैः कृतसंक्रमा ।
पताकाध्वजवानीरा हतवारणवाहिनी ॥ ३३ ॥
शोणितोदा सुसम्पूर्णा दुस्तरा पारगैर्नरैः ।
हतनागमहानक्रा परलोकवहाशिवा ॥ ३४ ॥
ऋष्टिखड्गमहानौका गृध्रकङ्कबलप्लवा ।
पुरुषादानुचरिता भीरूणां कश्मलावहा ॥ ३५ ॥
नदी योधस्य संग्रामे तदस्यावभृथं स्मृतम् ।
जिस योद्धाके युद्धरूपी यज्ञमें रक्तकी नदी प्रवाहित होती है, उसके लिये वह अवभृथस्नानके समान पुण्यजनक है। रक्त ही उस नदीकी जलराशि है, नगाड़े ही मेढक और कछुओंके समान हैं, वीरोंकी हड्डियाँ ही छोटे-छोटे कंकड़ और बालूके समान हैं, उसमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन है, मांस और रक्त ही उस नदीकी कीच हैं, ढाल और तलवार ही उसमें नौकाके समान हैं, वह भयानक नदी केशरूपी सेवार और घाससे ढकी हुई है। कटे हुए घोड़े, हाथी और रथ ही उसमें उतरनेके लिये सीढ़ी हैं, ध्वजा-पताका तटवर्ती बेंतकी लताके समान हैं, मारे गये हाथियोंको भी वह बहा ले जानेवाली है, रक्तरूपी जलसे वह लबालब भरी है, पार जानेकी इच्छावाले मनुष्योंके लिये वह अत्यन्त दुस्तर है, मरे हुए हाथी बड़े-बड़े मगरमच्छके समान हैं, वह परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली नदी अमंगलमयी प्रतीत होती है, ऋष्टि और खड्ग—ये उससे पार होनेके लिये विशाल नौकाके समान हैं। गीध-कंक और काक छोटी-छोटी नौकाओंके समान हैं, उसके आस-पास राक्षस विचरते हैं तथा वह भीरु पुरुषोंको मोहमें डालनेवाली है ॥ ३१—३५ १/२ ॥

वेदिर्यस्य त्वमित्राणां शिरोभ्यश्च प्रकीर्यते ॥ ३६ ॥
अश्वस्कन्धैर्गजस्कन्धैस्तस्य लोका यथा मम ।
जिसके युद्ध-यज्ञकी वेदी शत्रुओंके मस्तकों, घोड़ोंकी गर्दनों और हाथियोंके कंधोंसे बिछ जाती है, उस वीरको मेरे-जैसे ही लोक प्राप्त होते हैं ॥ ३६ १/२ ॥

पत्नीशाला कृता यस्य परेषां वाहिनीमुखम् ॥ ३७ ॥
हविर्धानं स्ववाहिन्यास्तदस्याहुर्मनीषिणः ।
जो वीर शत्रुसेना के मुहानेको पत्नीशाला बना लेता है, मनीषी पुरुष उसके लिये अपनी सेनाके प्रमुख भागको युद्ध-यज्ञके हवनीय पदार्थोंके रखनेका पात्र बताते हैं ॥
सदस्या दक्षिणा योधा आग्नीध्रश्चोत्तरां दिशम् ॥ ३८ ॥
शत्रुसेनाकलत्रस्य सर्वलोका न दूरतः ।
जिस वीरके लिये दक्षिणदिशामें स्थित योद्धा सदस्य हैं, उत्तरदिशावर्ती योद्धा आग्नीध्र (ऋत्विक्) हैं एवं शत्रुसेना पत्नीस्वरूप है, उसके लिये समस्त पुण्यलोक दूर नहीं हैं ॥ ३८ १/३ ॥

यदा तूभयतो व्यूहे भवत्याकाशमग्रतः ॥ ३९ ॥
सास्य वेदिस्तदा यज्ञैर्नित्यं वेदास्त्रयोऽग्नयः ।
जब अपनी सेना तथा शत्रुसेना एक-दूसरेके सामने व्यूह बनाकर उपस्थित होती है, उस समय दोनोंमेंसे जिसके सम्मुख केवल जनशून्य आकाश रह जाता है, वह निर्जन आकाश ही उस वीरके लिये युद्ध-यज्ञकी वेदी है। उस स्थानपर मानो सदा यज्ञ होता है तथा तीनों वेद और त्रिविध अग्नि सदा ही प्रतिष्ठित रहते हैं ॥

यस्तु योधः परावृत्तः संत्रस्तो हन्यते परैः ॥ ४० ॥
अप्रतिष्ठः स नरकं याति नास्त्यत्र संशयः ।
जो योद्धा भयभीत हो पीठ दिखाकर भागता है और उसी अवस्थामें शत्रुओंद्वारा मारा जाता है, वह कहीं भी न ठहरकर सीधा नरकमें गिरता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४० १/३ ॥

यस्य शोणितवेगेन वेदिः स्यात् सम्परिप्लुता ॥ ४१ ॥
केशमांसास्थिसम्पूर्णा स गच्छेत् परमां गतिम् ।
जिसके रक्तके वेगसे केश, मांस और हड्डियोंसे भरी हुई रणयज्ञकी वेदी आप्लावित हो उठती है, वह वीर योद्धा परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ४१ १/३ ॥

यस्तु सेनापतिं हत्वा तद्यानमधिरोहति ॥ ४२ ॥
स विष्णुविक्रमक्रामी बृहस्पतिसमः प्रभुः ।
जो योद्धा शत्रुके सेनापतिका वध करके उसके रथपर आरूढ़ हो जाता है, वह भगवान् विष्णुके समान पराक्रमशाली, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् तथा शक्तिशाली वीर समझा जाता है ॥ ४२ १/३ ॥

नायकं तत्कुमारं वा यो वा स्याद् यत्र पूजितः ॥ ४३ ॥
जीवग्राहं प्रगृह्णाति तस्य लोका यथा मम ।
जो शत्रुपक्षके सेनापति, उसके पुत्र अथवा उस पक्षके किसी भी सम्मानित वीरको जीते-जी पकड़ लेता है, उसको मेरे-जैसे लोक प्राप्त होते हैं ॥ ४३ १/३ ॥

आहवे तु हतं शूरं न शोचेत कथंचन ॥ ४४ ॥
अशोच्यो हि हतः शूरः स्वर्गलोके महीयते ।
युद्धस्थलमें मारे गये शूरवीरके लिये किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये। वह मारा गया शूरवीर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है, अतः कदापि शोचनीय नहीं है ॥ ४४ ½ ॥
न ह्यन्नं नोदकं तस्य न स्नानं नाप्यशौचकम् ॥ ४५ ॥
हतस्य कर्तुमिच्छन्ति तस्य लोकान् शृणुष्व मे ।
युद्धमें मारे गये वीरके लिये उसके आत्मीयजन न तो स्नान करना चाहते हैं, न अशौचसम्बन्धी कृत्यका पालन, न अन्नदान (श्राद्ध) करनेकी इच्छा करते हैं, और न जलदान (तर्पण) करनेकी। उसे जो लोक प्राप्त होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो ॥ ४५ ½ ॥
वराप्सरःसहस्राणि शूरमायोधने हतम् ॥ ४६ ॥
त्वरमाणाभिधावन्ति मम भर्ता भवेदिति ।
युद्धस्थलमें मारे गये शूरवीरकी ओर सहस्रों सुन्दरी अप्सराएँ यह आशा लेकर बड़ी उतावलीके साथ दौड़ी जाती हैं कि यह मेरा पति हो जाय ॥ ४६ ½ ॥
एतत् तपश्च पुण्यं च धर्मश्चैव सनातनः ॥ ४७ ॥
चत्वारश्चाश्रमास्तस्य यो युद्धमनुपालयेत् ।
जो युद्धधर्मका निरन्तर पालन करता है, उसके लिये यही तपस्या, पुण्य, सनातनधर्म तथा चारों आश्रमोंके नियमोंका पालन है ॥ ४७ ½ ॥
वृद्धबालौ न हन्तव्यौ न च स्त्री नैव पृष्ठतः ॥ ४८ ॥
तृणपूर्णमुखश्चैव तवास्मीति च यो वदेत् ।
युद्धमें वृद्ध, बालक और स्त्रियोंका वध नहीं करना चाहिये, किसी भागते हुएकी पीठमें आघात नहीं करना चाहिये, जो मुँहमें तिनका लिये शरण में आ जाय और कहने लगे कि मैं आपका ही हूँ, उसका भी वध नहीं करना चाहिये ॥ ४८ ½ ॥
जम्भं वृत्रं बलं पाकं शतमायं विरोचनम् ॥ ४९ ॥
दुर्वार्यं चैव नमुचिं नैकमायं च शम्बरम् ।
विप्रचित्तिं च दैतेयं दनोः पुत्रांश्च सर्वशः ।
प्रह्लादं च निहत्याजौ ततो देवाधिपोऽभवम् ॥ ५० ॥
जम्भ, वृत्रासुर, बलासुर, पाकासुर, सैकड़ों माया जाननेवाले विरोचन, दुर्जय वीर नमुचि, विविधमायाविशारद शम्बरासुर, दैत्यवंशी विप्रचित्ति, सम्पूर्ण दानवदल तथा प्रह्लादको भी युद्धमें मारकर मैं देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ ॥ ४९-५० ॥

भीष्म उवाच

इत्येतच्छक्रवचनं निशम्य प्रतिगृह्य च ।
योधानामात्मनः सिद्धिमम्बरीषोऽभिपन्नवान् ॥ ५१ ॥