महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 643, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! पूर्वकालमें राजा प्रतर्दन महासमरमें विजय प्राप्त करके पराजित राजाकी भूमिको छोड़कर शेष सारा धन, अन्न एवं औषध अपनी राजधानीमें ले आये ॥ २० ॥
अग्निहोत्राग्निशेषं च हविर्भोजनमेव च । आजहार दिवोदासस्ततो विप्रकृतोऽभवत् ॥ २१ ॥
राजा दिवोदास अग्निहोत्र, यज्ञका अंगभूत हविष्य तथा भोजन भी हर लाये थे। इसीसे वे तिरस्कृत हुए ॥
सराजकानि राष्ट्राणि नाभागो दक्षिणां ददौ । अन्यत्र श्रोत्रियस्वाच्च तापसार्थाच्च भारत ॥ २२ ॥
भरतनन्दन! राजा नाभागने श्रोत्रिय और तापसके धनको छोड़कर शेष सारा राष्ट्र दक्षिणारूपमें ब्राह्मणोंको दे दिया ।।
उच्चावचानि वित्तानि धर्मज्ञानां युधिष्ठिर । आसन् राज्ञां पुराणानां सर्वं तन्मम रोचते ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर! प्राचीन धर्मज्ञ राजाओंके पास जो नाना प्रकारके धन थे, वे सब मुझे भी अच्छे लगते हैं ।। २३ ।।
सर्वविद्यातिरेकेण जयमिच्छेन्महीपतिः । न मायया न दम्भेन य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ २४ ॥
जिस राजाको अपना वैभव बढ़ानेकी इच्छा हो, वह सम्पूर्ण विद्याओंके उत्कर्षद्वारा विजय पानेकी इच्छा करे; दम्भ या पाखण्डद्वारा नहीं ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९६ ।।