महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 642, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभुज्यमाना ह्ययोगेन स्वराष्ट्रादभितापिताः । अमित्रास्तमुपासीरन् व्यसनौघप्रतीक्षिणः ॥ १३ ॥ यदि ऐसा न करके अनुचित कठोरताके द्वारा उनपर शासन किया जाता है तो वे दुखी होकर अपने देशसे चले जाते हैं और शत्रु बनकर विजयी राजाकी विपत्तिके समयकी बाट देखते हुए कहीं पड़े रहते हैं ॥ १३ ॥
अमित्रोपग्रहं चास्य ते कुर्युः क्षिप्रमापदि । संतुष्टाः सर्वतो राजन् राजव्यसनकाङ्क्षिणः ॥ १४ ॥ राजन्! जब विजयी राजापर कोई विपत्ति आ जाती है, तब वे राजापर संकट पड़नेकी इच्छा रखनेवाले लोग विपक्षियोंद्वारा सब प्रकारसे संतुष्ट हो राजाके शत्रुओंका पक्ष ग्रहण कर लेते हैं ॥ १४ ॥
नामित्रो विनिकर्तव्यो नातिच्छेद्यः कथञ्चन । जीवितं ह्यप्यतिच्छिन्नः संत्यजेच्च कदाचन ॥ १५ ॥ शत्रुके साथ छल नहीं करना चाहिये। उसे किसी प्रकार भी अत्यन्त उच्छिन्न करना उचित नहीं है। अत्यन्त क्षत-विक्षत कर देनेपर वह कभी अपने जीवनका त्याग भी कर सकता है ॥ १५ ॥
अल्पेनापि च संयुक्तस्तुष्यत्येव नराधिपः । शुद्धं जीवितमेवापि तादृशो बहु मन्यते ॥ १६ ॥ राजा थोड़े-से लाभसे भी संयुक्त होनेपर संतुष्ट हो जाता है। वैसा नरेश निर्दोष जीवनको ही बहुत अधिक महत्त्व देता है ॥ १६ ॥
यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रियराजकः । संतुष्टभृत्यसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥ १७ ॥ जिस राजाका देश समृद्धिशाली, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा राजभक्त होता है और जिसके सेवक एवं मन्त्री संतुष्ट रहते हैं, उसीकी जड़ मजबूत मानी जाती है ॥ १७ ॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्या ये चान्ये श्रुतसत्तमाः । पूजार्हाः पूजिता यस्य स वै लोकविदुच्यते ॥ १८ ॥ जो राजा ऋत्विज्, पुरोहित, आचार्य तथा अन्यान्य पूजाके पात्र शास्त्रज्ञोंका सत्कार करता है, वही लोक-गतिको जाननेवाला कहा जाता है ॥ १८ ॥
एतेनैव च वृत्तेन महीं प्राप सुरोत्तमः । अनेन चेन्द्रविषयं विजिगीषन्ति पार्थिवाः ॥ १९ ॥ इसी बर्तावसे देवराज इन्द्रने राज्य पाया था और इसी बर्तावके द्वारा भूपालगण स्वर्गलोकपर विजय पाना चाहते हैं ॥ १९ ॥
भूमिवर्जं धनं राजा जित्वा राजन् महाहवे । अपि चान्नौषधीः शश्वदाजहार प्रतर्दनः ॥ २० ॥