महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविपरीत हो जाते हैं और वे सबके सब भयके कारण शत्रुओंके अधीन हो जाते हैं ॥ १३ ॥ भेदे गणा विनश्युर्हि भिन्नास्तु सुजयाः परैः । तस्मात् संघातयोगेन प्रयतेरन् गणाः सदा ॥ १४ ॥ आपसमें फूट होनेसे ही संघ या गणराज्य नष्ट हुए हैं। फूट होनेपर शत्रु उन्हें अनायास ही जीत लेते हैं; अतः गणोंको चाहिये कि वे सदा संघबद्ध—एकमत होकर ही विजयके लिये प्रयत्न करें ॥ १४ ॥ अर्थाश्चैवाधिगम्यन्ते संघातबलपौरुषैः । बाह्याश्च मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु संघातवृत्तिषु ॥ १५ ॥ जो सामूहिक बल और पुरुषार्थसे सम्पन्न हैं, उन्हें अनायास ही सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थोंकी प्राप्ति हो जाती है। संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले लोगोंके साथ संघसे बाहरके लोग भी मैत्री स्थापित करते हैं ॥ ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम् । विनिवृत्ताभि संधानाः सुखमेधन्ति सर्वशः ॥ १६ ॥ ज्ञानवृद्ध पुरुष गणराज्यके नागरिकोंकी प्रशंसा करते हैं। संघबद्ध लोगोंके मनमें आपसमें एक-दूसरेको ठगनेकी दुर्भावना नहीं होती। वे सभी एक-दूसरेकी सेवा करते हुए सुखपूर्वक उन्नति करते हैं ॥ १६ ॥ धर्मिष्ठान् व्यवहारांश्च स्थापयन्तश्च शास्त्रतः । यथावत् प्रतिपश्यन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १७ ॥ गणराज्यके श्रेष्ठ नागरिक शास्त्रके अनुसार धर्मानुकूल व्यवहारोंकी स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टिसे सबको देखते हुए उन्नतिकी दिशामें आगे बढ़ते जाते हैं ॥ १७ ॥ पुत्रान् भ्रातॄन् निगृह्णन्तो विनयन्तश्च तान् सदा । विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १८ ॥ गणराज्यके श्रेष्ठ पुरुष पुत्रों और भाइयोंको भी यदि वे कुमार्गपर चलें तो दण्ड देते हैं। सदा उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं और शिक्षित हो जानेपर उन सबको बड़े आदरसे अपनाते हैं। इसलिये वे विशेष उन्नति करते हैं ॥ १८ ॥ चारमन्त्रविधानेषु कोशसंनिचयेषु च । नित्ययुक्ता महाबाहो वर्धन्ते सर्वतो गणाः ॥ १९ ॥ महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्यके नागरिक गुप्तचर या दूतका काम करने, राज्यके हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने, विधान बनाने तथा राज्यके लिये कोश-संग्रह करने आदिके लिये सदा उद्यत रहते हैं, इसीलिये सब ओरसे उनकी उन्नति होती है ॥ १९ ॥ प्राज्ञान् शूरान् महोत्साहान् कर्मसु स्थिरपौरुषान् । मानयन्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नृप ॥ २० ॥