महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 737, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशाधिकशततमोऽध्यायः
मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा
युधिष्ठिर उवाच
असौम्याः सौम्यरूपेण सौम्याश्चासौम्यदर्शनाः ।
ईदृशान् पुरुषांस्तात कथं विद्यामहे वयम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! बहुत-से कठोर स्वभाववाले मनुष्य ऊपरसे कोमल और शान्त बने रहते हैं तथा कोमल स्वभावके लोग कठोर दिखायी देते हैं, ऐसे मनुष्योंकी मुझे ठीक-ठीक पहचान कैसे हो? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
व्याघ्रगोमायुसंवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक बाघ और सियारके संवादरूप प्राचीन आख्यानका उदाहरण दिया करते हैं, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
पुरिकायां पुरि पुरा श्रीमत्यां पौरिको नृपः ।
परहिंसारतिः क्रूरो बभूव पुरुषाधमः ॥ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न पुरिका नामकी नगरीमें पौरिक नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा ही क्रूर और नराधम था, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें ही उसका मन लगता था ॥ ३ ॥
स त्वायुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम् ।
गोमायुत्वं च सम्प्राप्तो दूषितः पूर्वकर्मणा ॥ ४ ॥
धीरे-धीरे उसकी आयु समाप्त हो गयी और वह ऐसी गतिको प्राप्त हुआ, जो किसी भी प्राणीको अभीष्ट नहीं है। वह अपने पूर्वकर्मसे दूषित होकर दूसरे जन्ममें गीदड़ हो गया ॥ ४ ॥
संस्मृत्य पूर्वभूतिं च निर्वेदं परमं गतः ।
न भक्षयति मांसानि परैरुपहृतान्यपि ॥ ५ ॥
उस समय अपने पूर्व जन्मके वैभवका स्मरण करके उस सियारको बड़ा खेद और वैराग्य हुआ। अतः वह दूसरोंके द्वारा दिये हुए मांसको भी नहीं खाता था ॥ ५ ॥
अहिंस्रः सर्वभूतेषु सत्यवाक् सुदृढव्रतः ।
स चकार यथाकालमाहारं पतितैः फलैः ॥ ६ ॥