महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअब उसने जीवोंकी हिंसा करनी छोड़ दी, सत्य बोलनेका नियम ले लिया और दृढ़तापूर्वक अपने व्रतका पालन करने लगा। वह नियत समयपर वृक्षोंसे अपने आप गिरे हुए फलोंका आहार करता था ।। ६ ।।
(पर्णाहारः कदाचिच्च नियमव्रतवानपि । कदाचिदुदकेनापि वर्तयन्ननुयन्त्रितः ।।) व्रत और नियमोंके पालनमें तत्पर हो कभी पत्ता चबा लेता और कभी पानी पीकर ही रह जाता था। उसका जीवन संयममें बँध गया था ।।
श्मशाने तस्य चावासो गोमायोः सम्मतोऽभवत् । जन्मभूम्यनुरोधाच्च नान्यवासमरोचयत् ।। ७ ।। वह श्मशानभूमिमें ही रहता था। वहीं उसका जन्म हुआ था, इसलिये वही स्थान उसे पंसद था। उसे और कहीं जाकर रहनेकी रुचि नहीं होती थी ।। ७ ।।
तस्य शौचममृष्यन्तस्ते सर्वे सहजातयः । चालयन्ति स्म तां बुद्धिं वचनैः प्रश्रयोत्तरैः ।। ८ ।। सियारका इस तरह पवित्र आचार-विचारसे रहना उसके सभी जाति-भाइयोंको अच्छा न लगा। यह सब उनके लिये असह्य हो उठा; इसलिये वे प्रेम और विनयभरी बातें कहकर उसकी बुद्धिको विचलित करने लगे ।। ८ ।।
वसन् पितृवने रौद्रे शौचे वर्तितुमिच्छसि । इयं विप्रतिपत्तिस्ते यदा त्वं पिशिताशनः ।। ९ ।। उन्होंने कहा ‘भाई सियार! तू तो मांसाहारी जीव है और भयंकर श्मशानभूमिमें निवास करता है, फिर भी पवित्र आचार-विचारसे रहना चाहता है—यह विपरीत निश्चय है ।। ९ ।।
तत्समानो भवास्माभिर्भोज्यं दास्यामहे वयम् । भुङ्क्ष्व शौचं परित्यज्य यद्धि भुक्तं सदास्तु ते ।। १० ।। ‘भैया! अतः तू हमारे ही समान होकर रह। तेरे लिये भोजन तो हमलोग ला दिया करेंगे। तू इस शौचाचारका नियम छोड़कर चुपचाप खा लिया करना। तेरी जातिका जो सदासे भोजन रहा है, वही तेरा भी होना चाहिये’ ।। १० ।।
इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच समाहितः । मधुरैः प्रसृतैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिर्अनिष्ठुरैः ।। ११ ।। उनकी ऐसी बात सुनकर सियार एकाग्रचित्त हो मधुर, विस्तृत, युक्तियुक्त तथा कोमल वचनोंद्वारा इस प्रकार बोला— ।। ११ ।।
अप्रमाणा प्रसूतिर्मे शीलतः क्रियते कुलम् । प्रार्थयामि च तत्कर्म येन विस्तीर्यते यशः ।। १२ ।। ‘बन्धुओ! अपने बुरे आचरणोंसे ही हमारी जातिका कोई विश्वास नहीं करता। अच्छे स्वभाव और आचरणसे ही कुलकी प्रतिष्ठा होती है; अतः मैं भी वही कर्म करना चाहता हूँ,