महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 739, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिससे अपने वंशका यश बढ़े ॥ १२ ॥
श्मशाने यदि मे वासः समाधिर्मे निशम्यताम् ।
आत्मा फलति कर्माणि नाश्रमो धर्मकारणम् ॥ १३ ॥
'यदि मेरा निवास श्मशानभूमिमें है तो इसके लिये मैं जो समाधान देता हूँ, उसको सुनो। आत्मा ही शुभ कर्मोंके लिये प्रेरणा करता है। कोई आश्रम ही धर्मका कारण नहीं हुआ करता ॥ १३ ॥
आश्रमे यो द्विजं हन्याद् गां वा दद्यादनाश्रमे ।
किं तु तत्पातकं न स्यात् तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ॥ १४ ॥
'क्या यदि कोई आश्रममें रहकर ब्राह्मणकी हत्या करे तो उसे उसका पातक नहीं लगेगा और यदि कोई बिना आश्रमके स्थानमें गोदान करे तो क्या वह व्यर्थ हो जायेगा? ॥ १४ ॥
भवन्तः स्वार्थलोभेन केवलं भक्षणे रताः ।
अनुबन्धे त्रयो दोषास्तान् न पश्यन्ति मोहिताः ॥ १५ ॥
'तुमलोग केवल स्वार्थके लोभसे मांसभक्षणमें रचे-पचे रहते हो। उसके परिणामस्वरूप जो तीन दोष प्राप्त होते हैं, उनकी ओर मोहवश तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती ॥ १५ ॥
अप्रत्ययकृतां गर्ह्यामर्थापनयदूषिताम् ।
इह चामुत्र चानिष्टां तस्माद् वृत्तिं न रोचये ॥ १६ ॥
'तुमलोगोंकी जीविका असंतोषसे पूर्ण, निन्दनीय, धर्मकी हानिके कारण दूषित तथा इहलोक और परलोकमें भी अनिष्ट फल देनेवाली है; इसलिये मैं उसे पसंद नहीं करता हूँ ॥ १६ ॥
तं शुचिं पण्डितं मत्वा शार्दूलः ख्यातविक्रमः ।
कृत्वाऽऽत्मसदृशीं पूजां साचिव्येऽवरयत् स्वयम् ॥ १७ ॥
सियारके इस पवित्र आचार-विचारकी चर्चा चारों ओर फैल जानेके कारण एक प्रख्यातपराक्रमी व्याघ्रने उसे विद्वान् और विशुद्ध स्वभावका मानकर उसके निकट पदार्पण किया और उसकी अपने अनुरूप पूजा करके स्वयं ही मन्त्री बनानेके लिये उसका वरण किया ॥ १७ ॥
शार्दूल उवाच
सौम्य विज्ञातरूपस्त्वं गच्छ यात्रां मया सह ।
ध्रियन्तामीप्सिता भोगाः परिहार्याश्च पुष्कलाः ॥ १८ ॥
व्याघ्र बोला— सौम्य! मैं तुम्हारे स्वरूपसे परिचित हूँ। तुम मेरे साथ चलो और अपनी रुचिके अनुसार अधिक-से-अधिक भोगोंका उपभोग करो। जो वस्तुएँ प्रिय न हों, उन्हें त्याग देना ॥ १८ ॥