महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 740, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीक्ष्णा इति वयं ख्याता भवन्तं ज्ञापयामहे । मृदुपूर्वं हितं चैव श्रेयश्चाधिगमिष्यसि ॥ १९ ॥ परंतु एक बात मैं तुम्हें सूचित कर देता हूँ। सारे संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि हमारी जातिका स्वभाव कठोर होता है; अतः यदि तुम कोमलतापूर्वक व्यवहार करते हुए मेरे हित-साधनमें लगे रहोगे तो अवश्य ही कल्याणके भागी होओगे ॥ १९ ॥
अथ सम्पूज्य तद् वाक्यं मृगेन्द्रस्य महात्मनः । गोमायुः संश्रितं वाक्यं बभाषे किंचिदानतः ॥ २० ॥ महामनस्वी मृगराजके उस कथनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके सियारने कुछ नतमस्तक होकर विनययुक्त वाणीमें कहा ॥ २० ॥
गोमायुरुवाच
सदृशं मृगराजैतत् तव वाक्यं मदन्तरे । यत् सहायान् मृगयसे धर्मार्थकुशलान् शुचीन् ॥ २१ ॥ सियार बोला—मृगराज! आपने मेरे लिये जो बात कही है, वह सर्वथा आपके योग्य ही है तथा आप जो धर्म और अर्थसाधनमें कुशल एवं शुद्ध स्वभाववाले सहायकों (मन्त्रियों) की खोज कर रहे हैं, यह भी उचित ही है ॥ २१ ॥
न शक्यं ह्यनमात्येन महत्त्वमनुशासितुम् । दुष्टामात्येन वा वीर शरीरपरिपन्थिना ॥ २२ ॥ वीर! मन्त्रीके बिना एकाकी राजा विशाल राज्यका शासन नहीं कर सकता। यदि शरीरको सुखा देनेवाला कोई दुष्ट मन्त्री मिल गया तो उसके द्वारा भी शासन नहीं चलाया जा सकता ॥ २२ ॥
सहायाननुरक्तांश्च नयज्ञानुपसंहितान् । परस्परमसंसृष्टान् विजिगीषूनलोलुपान् ॥ २३ ॥ अनतीतोपधान् प्राज्ञान् हिते युक्तान् मनस्विनः । पूजयेथा महाभाग यथाऽऽचार्यान् यथा पितॄन् ॥ २४ ॥ महाभाग! इसके लिये आपको चाहिये कि जिनका आपके प्रति अनुराग हो, जो नीतिके जानकार, सद्भाव-सम्पन्न, परस्पर गुटबंदीसे रहित, विजयकी अभिलाषासे युक्त, लोभरहित, कपटनीतिमें कुशल, बुद्धिमान्, स्वामीके हितसाधनमें तत्पर और मनस्वी हों, ऐसे व्यक्तियोंको सहायक या सचिव बनाकर आप पिता और गुरुके समान उनका सम्मान करें ॥ २३-२४ ॥
न त्वेव मम संतोषाद् रोचतेऽन्यन्मृगाधिप । न कामये सुखान् भोगानैश्वर्यं च तदाश्रयम् ॥ २५ ॥