भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 794

राजाके जो शास्त्रोक्त धर्म हैं, उन्हें संक्षेपसे मैंने यहाँ बताया है। तुम अपनी बुद्धिसे विचार करके उन्हें हृदयमें धारण करो। जो उन्हें गुरुसे सीखकर हृदयमें धारण करता और आचरणमें लाता है, वही राजा अपने राज्यकी रक्षा करनेमें समर्थ होता है॥ ५१॥ अनीतिजं यस्य विधानजं सुखं हठप्रणीतं विधिवत्प्रदृश्यते। न विद्यते तस्य गतिर्महीपते- र्न विद्यते राज्यसुखं ह्यनुत्तमम्॥ ५२॥ जिन्हें अन्यायसे उपार्जित, हठसे प्राप्त तथा दैवके विधानके अनुसार उपलब्ध हुआ सुख विधिके अनुरूप प्राप्त हुआ-सा दिखायी देता है, राजधर्मको न जाननेवाले उस राजाकी कहीं गति नहीं है तथा उसका परम उत्तम राज्यसुख चिरस्थायी नहीं होता॥ ५२॥ धनैर्विशिष्टान् मतिशीलपूजितान् गुणोपपन्नान् युधि दृष्टविक्रमान्। गुणेषु दृष्ट्वा न चिरादिवात्मवान् यतोऽभिसंधाय निहन्ति शात्रवान्॥ ५३॥ उक्त राजधर्मके अनुसार संधि-विग्रह आदि गुणोंके प्रयोगमें सतत सावधान रहनेवाला नरेश धनसम्पन्न, बुद्धि और शीलके द्वारा सम्मानित, गुणवान् तथा युद्धमें जिनका पराक्रम देखा गया है, उन वीर शत्रुओंको भी कूटकौशलपूर्वक नष्ट कर सकता है॥ ५३॥ पश्येदुपायन् विविधैः क्रियापथै- र्न चानुपायेन मतिं निवेशयेत्। श्रियं विशिष्टां विपुलं यशो धनं न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते॥ ५४॥ राजा नाना प्रकारकी कार्यपद्धतियोंद्वारा शत्रु-विजयके बहुत-से उपाय ढूँढ़ निकाले। अयोग्य उपायसे काम लेनेका विचार न करे, जो निर्दोष व्यक्तियोंके भी दोष देखता है, वह मनुष्य विशिष्ट सम्पत्ति, महान् यश और प्रचुर धन नहीं पा सकता॥ ५४॥ प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तितौ यथा सुहृत्सु विज्ञाय निवृत्य चोभयोः। यदेव मित्रं गुरुभारमावहेत् तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद् बुधः॥ ५५॥ सुहृदोंमेंसे जो दो मित्र प्रेमपूर्वक साथ-साथ एक कार्यमें प्रवृत्त होते हों और साथ-ही-साथ उससे निवृत्त होते हों, उन्हें अच्छी तरह जानकर उन दोनोंमेंसे जो मित्र लौटकर मित्रका गुरुतर भार वहन कर सके, उसीको विद्वान् पुरुष अत्यन्त स्नेही मित्र मानकर दूसरोंके सामने उसका उदाहरण दें॥ ५५॥