भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

राजाके जो शास्त्रोक्त धर्म हैं, उन्हें संक्षेपसे मैंने यहाँ बताया है। तुम अपनी बुद्धिसे विचार करके उन्हें हृदयमें धारण करो। जो उन्हें गुरुसे सीखकर हृदयमें धारण करता और आचरणमें लाता है, वही राजा अपने राज्यकी रक्षा करनेमें समर्थ होता है॥ ५१॥ अनीतिजं यस्य विधानजं सुखं हठप्रणीतं विधिवत्प्रदृश्यते। न विद्यते तस्य गतिर्महीपते- र्न विद्यते राज्यसुखं ह्यनुत्तमम्॥ ५२॥ जिन्हें अन्यायसे उपार्जित, हठसे प्राप्त तथा दैवके विधानके अनुसार उपलब्ध हुआ सुख विधिके अनुरूप प्राप्त हुआ-सा दिखायी देता है, राजधर्मको न जाननेवाले उस राजाकी कहीं गति नहीं है तथा उसका परम उत्तम राज्यसुख चिरस्थायी नहीं होता॥ ५२॥ धनैर्विशिष्टान् मतिशीलपूजितान् गुणोपपन्नान् युधि दृष्टविक्रमान्। गुणेषु दृष्ट्वा न चिरादिवात्मवान् यतोऽभिसंधाय निहन्ति शात्रवान्॥ ५३॥ उक्त राजधर्मके अनुसार संधि-विग्रह आदि गुणोंके प्रयोगमें सतत सावधान रहनेवाला नरेश धनसम्पन्न, बुद्धि और शीलके द्वारा सम्मानित, गुणवान् तथा युद्धमें जिनका पराक्रम देखा गया है, उन वीर शत्रुओंको भी कूटकौशलपूर्वक नष्ट कर सकता है॥ ५३॥ पश्येदुपायन् विविधैः क्रियापथै- र्न चानुपायेन मतिं निवेशयेत्। श्रियं विशिष्टां विपुलं यशो धनं न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते॥ ५४॥ राजा नाना प्रकारकी कार्यपद्धतियोंद्वारा शत्रु-विजयके बहुत-से उपाय ढूँढ़ निकाले। अयोग्य उपायसे काम लेनेका विचार न करे, जो निर्दोष व्यक्तियोंके भी दोष देखता है, वह मनुष्य विशिष्ट सम्पत्ति, महान् यश और प्रचुर धन नहीं पा सकता॥ ५४॥ प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तितौ यथा सुहृत्सु विज्ञाय निवृत्य चोभयोः। यदेव मित्रं गुरुभारमावहेत् तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद् बुधः॥ ५५॥ सुहृदोंमेंसे जो दो मित्र प्रेमपूर्वक साथ-साथ एक कार्यमें प्रवृत्त होते हों और साथ-ही-साथ उससे निवृत्त होते हों, उन्हें अच्छी तरह जानकर उन दोनोंमेंसे जो मित्र लौटकर मित्रका गुरुतर भार वहन कर सके, उसीको विद्वान् पुरुष अत्यन्त स्नेही मित्र मानकर दूसरोंके सामने उसका उदाहरण दें॥ ५५॥

एतान् मयोक्तांश्च राजधर्मान् नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व । अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन सर्वो हि लोको नृप धर्ममूलः ॥ ५६ ॥

नरेश्वर! मेरे बताये हुए इन राजधर्मोंका आचरण करो और प्रजाके पालनमें मन लगाओ। इससे तुम सुखपूर्वक पुण्यफल प्राप्त करोगे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का मूल धर्म ही है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राजधर्मकथने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राजधर्मका वर्णनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥


* 'इमावेव गौतमभरद्वाजौ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंका गौतम, भरद्वाज, वसिष्ठ और विश्वामित्र आदि महर्षियोंसे सम्बन्ध सूचित होता है।

दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अयं पितामहेनोक्तो राजधर्मः सनातनः ।
ईश्वरश्च महादण्डो दण्डे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आपने यह सनातन राजधर्मका वर्णन किया है। इसके अनुसार महान् दण्ड ही सबका ईश्वर है, दण्डके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ॥ १ ॥
देवतानामृषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
यक्षरक्षःपिशाचानां साध्यानां च विशेषतः ॥ २ ॥
सर्वेषां प्राणिनां लोके तिर्यग्योनिनिवासिनाम् ।
सर्वव्यापी महातेजा दण्डः श्रेयानिति प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! देवता, ऋषि, पितर, महात्मा, यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा साध्यगण एवं पशु-पक्षियोंकी योनिमें निवास करनेवाले जगत्के समस्त प्राणियोंके लिये भी सर्वव्यापी महातेजस्वी दण्ड ही कल्याणका साधन है ।।
इत्येवमुक्तं भवता दण्डे वै सचराचरम् ।
पश्यता लोकमासक्तं ससुरासुरमानुषम् ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ४ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंसहित इस सम्पूर्ण विश्वको अपने समीप देखते हुए आपने कहा है कि दण्डपर ही चराचर जगत् प्रतिष्ठित है। भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थ रूपसे यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
को दण्डः कीदृशो दण्डः किंरूपः किंपरायणः ।
किमात्मकः कथंभूतः कथमूर्तिः कथं प्रभो ॥ ५ ॥
दण्ड क्या है? कैसा है? उसका स्वरूप किस तरहका है? और किसके आधारपर उसकी स्थिति है? प्रभो! उसका उपादान क्या है? उसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? उसका आकार कैसा है? ॥ ५ ॥
जागर्ति च कथं दण्डः प्रजास्ववहितात्मकः ।
कश्च पूर्वापरमिदं जागर्ति प्रतिपालयन् ॥ ६ ॥
वह किस प्रकार सावधान रहकर सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करनेके लिये जागता रहता है? कौन इस पूर्वापर जगत्का प्रतिपालन करता हुआ जागता है? ॥ ६ ॥
कश्च विज्ञायते पूर्वं को वरो दण्डसंज्ञितः ।

किंसंस्थश्च भवेद् दण्डः का वास्य गतिरुच्यते ॥ ७ ॥
पहले इसे किस नामसे जाना जाता था? कौन दण्ड प्रसिद्ध है? दण्डका आधार क्या है? तथा उसकी गति क्या बतायी गयी है? ॥ ७ ॥

भीष्म उवाच

शृणु कौरव्य यो दण्डो व्यवहारो यथा च सः ।
यस्मिन् हि सर्वमायत्तं स दण्ड इह केवलः ॥ ८ ॥
**भीष्मजीने कहा—**कुरुनन्दन! दण्डका जो स्वरूप है तथा जिस प्रकार उसको 'व्यवहार' कहा जाता है, वह सब तुम्हें बताता हूँ; सुनो। इस संसारमें सब कुछ जिसके अधीन है, वही अद्वितीय पदार्थ यहाँ 'दण्ड' कहलाता है ॥ ८ ॥
धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते ।
तस्य लोपः कथं न स्याल्लोकेष्ववहितात्मनः ॥ ९ ॥
इत्येवं व्यवहारस्य व्यवहारत्वमिष्यते ।
महाराज! धर्मका ही दूसरा नाम व्यवहार है। लोकमें सतत सावधान रहनेवाले पुरुषके धर्मका किसी तरह लोप न हो, इसीलिये दण्डकी आवश्यकता है और यही उस व्यवहारका व्यवहारत्व³ है ॥ ९ १/२ ॥
अपि चैतत् पुरा राजन् मनुना प्रोक्तमादितः ॥ १० ॥
सुप्रणीतेन दण्डेन प्रियाप्रियसमात्मना ।
प्रजा रक्षति यः सम्यग्धर्म एव स केवलः ॥ ११ ॥
राजन्! पूर्वकालमें मनुने यह उपदेश दिया है कि जो राजा प्रिय और अप्रियके प्रति समान भाव रखकर—किसीके प्रति पक्षपात न करके दण्डका ठीक-ठीक उपयोग करते हुए प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, उसका वह कार्य केवल धर्म है ॥ १०-११ ॥
यथोक्तमेतद् वचनं प्रागेव मनुना पुरा ।
यन्मयोक्तं मनुष्येन्द्र ब्रह्मणो वचनं महत् ॥ १२ ॥
प्रागिदं वचनं प्रोक्तमतः प्राग्वचनं विदुः ।
व्यवहारस्य चाख्यानाद् व्यवहार इहोच्यते ॥ १३ ॥
नरेन्द्र! उपर्युक्त सारी बातें मनुजीने पहले ही कह दी हैं और मैंने जो बात कही है, वह ब्रह्माजीका महान् वचन है। यही वचन मनुजीके द्वारा पहले कहा गया है; इसलिये इसको 'प्राग्वचन' के नामसे भी जानते हैं। इसमें व्यवहारका प्रतिपादन होनेसे यहाँ व्यवहार नाम दिया गया है ॥ १२-१३ ॥
दण्डे त्रिवर्गः सततं सुप्रणीते प्रवर्तते ।
दैवं हि परमो दण्डो रूपतोऽग्निरिवोत्थितः ॥ १४ ॥

दण्डका ठीक-ठीक उपयोग होनेपर राजाके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि सदा होती रहती है। इसलिये दण्ड महान् देवता है, यह अग्निके समान तेजस्वी रूपसे प्रकट हुआ है॥ १४॥

नीलोत्पलदलश्यामश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।
अष्टपान्नैंकनयनः शंकुकर्णोर्ध्वरोमवान् ॥ १५ ॥
इसके शरीरकी कान्ति नील कमलदलके समान श्याम है, इसके चार दाढ़ें और चार भुजाएँ हैं। आठ पैर और अनेक नेत्र हैं। इसके कान खूँटेके समान हैं और रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए हैं॥ १५॥

जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः ।
एतद् रूपं बिभर्त्युग्रं दण्डो नित्यं दुराधरः ॥ १६ ॥
इसके सिरपर जटा है, मुखमें दो जिह्वाएँ हैं, मुखका रंग ताँबेके समान है, शरीरको ढकनेके लिये उसने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है, इस प्रकार दुर्धर्ष दण्ड सदा यह भयंकर रूप धारण किये रहता है³॥

असिर्धनुर्गदा शक्तिस्त्रिशूलं मुद्गरः शरः ।
मुसलं परशुश्चक्रं पाशो दण्डर्ष्टितोमराः ॥ १७ ॥
सर्वप्रहरणीयानि सन्ति यानीह कानिचित् ।
दण्ड एव स सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ॥ १८ ॥
खड्ग, धनुष, गदा, शक्ति, त्रिशूल, मुद्गर, बाण, मुसल, परसा, चक्र, पाश, दण्ड, ऋष्टि, तोमर तथा दूसरे-दूसरे जो कोई प्रहार करनेयोग्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उन सबके रूपमें सर्वात्मा दण्ड ही मूर्तिमान् होकर जगत्में विचरता है॥ १७-१८॥

भिन्दंश्छिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पाटयंस्तथा ।
घातयन्नभिधावंश्च दण्ड एव चरत्युत ॥ १९ ॥
वही अपराधियोंको भेदता, छेदता, पीड़ा देता, काटता, चीरता, फाड़ता तथा मरवाता है। इस प्रकार दण्ड ही सब ओर दौड़ता-फिरता है॥ १९॥

असिर्विशसनो धर्मस्तीक्ष्णवर्मा दुराधरः ।
श्रीगर्भो विजयः शास्ता व्यवहारः सनातनः ॥ २० ॥
शास्त्रं ब्राह्मणमन्त्राश्च शास्ता प्राग्वदतां वरः ।
धर्मपालोऽक्षरो देवः सत्यगो नित्यगोऽग्रजः ॥ २१ ॥
असङ्गो रुद्रतनयो मनुज्येष्ठः शिवंकरः ।
नामान्येतानि दण्डस्य कीर्तितानि युधिष्ठिर ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! असि, विशसन, धर्म, तीक्ष्णवर्मा, दुराधर, श्रीगर्भ, विजय, शास्ता, व्यवहार, सनातन, शास्त्र, ब्राह्मण, मन्त्र, शास्ता, प्राग्वदतांवर, धर्मपाल, अक्षर, देव, सत्यग, नित्यग,

अग्रज, असंग, रुद्रतनय, मनु, ज्येष्ठ और शिवंकर—ये दण्डके नाम कहे गये हैं ॥ २०—२२ ॥

दण्डो हि भगवान् विष्णुर्दण्डो नारायणः प्रभुः ।
शश्वद् रूपं महद् बिभ्रन्महान् पुरुष उच्यते ॥ २३ ॥
दण्ड सर्वत्र व्यापक होनेके कारण भगवान् विष्णु है और नरों (मनुष्यों) का अयन (आश्रय) होनेसे नारायण कहलाता है। वह प्रभावशाली होनेसे प्रभु और सदा महत् रूप धारण करता है, इसलिये महान् पुरुष कहलाता है ॥

तथोक्ता ब्रह्मकन्येति लक्ष्मीर्वृत्तिः सरस्वती ।
दण्डनीतिर्जगद्धात्री दण्डो हि बहुविग्रहः ॥ २४ ॥
इसी प्रकार दण्डनीति भी ब्रह्माजीकी कन्या कही गयी है। लक्ष्मी, वृत्ति, सरस्वती तथा जगद्धात्री भी उसीके नाम हैं। इस प्रकार दण्डके बहुत-से रूप हैं ॥

अर्थानर्थौ सुखं दुःखं धर्माधर्मौ बलाबले ।
दौर्भाग्यं भागधेयं च पुण्यापुण्ये गुणागुणौ ॥ २५ ॥
कामाकामावृतुर्मासः शर्वरी दिवसः क्षणः ।
अप्रमादः प्रमादश्च हर्षक्रोधौ शमो दमः ॥ २६ ॥
दैवं पुरुषकारश्च मोक्षामोक्षौ भयाभये ।
हिंसाहिंसे तपो यज्ञः संयमोऽथ विषाविषम् ॥ २७ ॥
अन्तश्चादिश्च मध्यं च कृत्यानां च प्रपञ्चनम् ।
मदः प्रमादो दर्पश्च दम्भो धैर्यं नयानयौ ॥ २८ ॥
अशक्तिः शक्तिरित्येवं मानस्तम्भौ व्ययाव्ययौ ।
विनयश्च विसर्गश्च कालाकालौ च भारत ॥ २९ ॥
अनृतं ज्ञानिता सत्यं श्रद्धाश्रद्धे तथैव च ।
क्लीबता व्यवसायश्च लाभालाभौ जयाजयौ ॥ ३० ॥
तीक्ष्णता मृदुता मृत्युरागमानागमौ तथा ।
विरोधश्चाविरोधश्च कार्याकार्ये बलाबले ॥ ३१ ॥
असूया चानसूया च धर्माधर्मौ तथैव च ।
अपत्रपानपत्रपे ह्रीश्च सम्पद्विपत्पदम् ॥ ३२ ॥
तेजः कर्माणि पाण्डित्यं वाक्शक्तिस्तत्त्वबुद्धिता ।
एवं दण्डस्य कौरव्य लोकेऽस्मिन् बहुरूपता ॥ ३३ ॥

अर्थ-अनर्थ, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म, बल-अबल, दौर्भाग्य-सौभाग्य, पुण्य-पाप, गुण-अवगुण, काम-अकाम, ऋतु-मास, दिन-रात, क्षण, प्रमाद-अप्रमाद, हर्ष-क्रोध, शम-दम, दैव-पुरुषार्थ, बन्ध-मोक्ष, भय-अभय, हिंसा-अहिंसा, तप-यज्ञ, संयम, विष-अविष, आदि, अन्त, मध्य, कार्यविस्तार, मद, असावधानता, दर्प, दम्भ, धैर्य, नीति-अनीति, शक्ति-

अशक्ति, मान, स्तब्धता, व्यय-अव्यय, विनय, दान, काल-अकाल, सत्य-असत्य, ज्ञान, श्रद्धा-अश्रद्धा, अकर्मण्यता, उद्योग, लाभ-हानि, जय-पराजय, तीक्ष्णता-मृदुता, मृत्यु, आना-जाना, विरोध-अविरोध, कर्तव्य-अकर्तव्य, सबलता-निर्बलता, असूया-अनसूया, धर्म-अधर्म, लज्जा-अलज्जा, सम्पत्ति-विपत्ति, स्थान, तेज, कर्म, पाण्डित्य, वाक्शक्ति तथा तत्त्वबोध—ये सब दण्डके ही अनेक नाम और रूप हैं। कुरुनन्दन! इस प्रकार इस जगत्में दण्डके बहुत-से रूप हैं ।। २५—३३ ।।

न स्याद् यदीह दण्डो वै प्रमथेयुः परस्परम् ।
भयाद् दण्डस्य नान्योन्यं घ्नन्ति चैव युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर! यदि संसारमें दण्डकी व्यवस्था न होती तो सब लोग एक-दूसरेको नष्ट कर डालते। दण्डके ही भयसे मनुष्य आपसमें मार-काट नहीं मचाते हैं ।। ३४ ।।

दण्डेन रक्ष्यमाणा हि राजन्नहरहः प्रजाः ।
राजानं वर्धयन्तीह तस्माद् दण्डः परायणम् ॥ ३५ ॥
राजन्! दण्डसे सुरक्षित रहती हुई प्रजा ही इस जगत्में अपने राजाको प्रतिदिन धन-धान्यसे सम्पन्न करती रहती है। इसलिये दण्ड ही सबको आश्रय देनेवाला है ।। ३५ ।।

व्यवस्थापयति क्षिप्रमिमं लोकं नरेश्वर ।
सत्ये व्यवस्थितो धर्मो ब्राह्मणेष्ववतिष्ठते ॥ ३६ ॥
नरेश्वर! दण्ड ही इस लोकको शीघ्र ही सत्यमें स्थापित करता है। सत्यमें ही धर्मकी स्थिति है और धर्म ब्राह्मणोंमें स्थित है ।। ३६ ।।

धर्मयुक्ता द्विजश्रेष्ठा वेदयुक्ता भवन्ति च ।
बभूव यज्ञो वेदेभ्यो यज्ञः प्रीणाति देवताः ॥ ३७ ॥
प्रीताश्च देवता नित्यमिन्द्रे परिवदन्त्यपि ।
अन्नं ददाति शक्रश्चाप्यनुगृह्णन्निमाः प्रजाः ॥ ३८ ॥
प्राणाश्च सर्वभूतानां नित्यमन्ने प्रतिष्ठिताः ।
तस्मात् प्रजाः प्रतिष्ठन्ते दण्डो जागर्ति तासु च ॥ ३९ ॥
धर्मयुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदोंका स्वाध्याय करते हैं। वेदोंसे ही यज्ञ प्रकट हुआ है। यज्ञ देवताओंको तृप्त करता है। तृप्त हुए देवता इन्द्रसे प्रजाके लिये प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, इससे इन्द्र प्रजाजनोंपर अनुग्रह करके (समयपर वर्षाके द्वारा खेती उपजाकर) उन्हें अन्न देता है, समस्त प्राणियोंके प्राण सदा अन्नपर ही टिके हुए हैं; इसलिये दण्डसे ही प्रजाओंकी स्थिति बनी हुई है। वही उनकी रक्षाके लिये सदा जाग्रत् रहता है ।। ३७—३९ ।।

एवंप्रयोजनश्चैव दण्डः क्षत्रियतां गतः ।
रक्षन् प्रजाः स जागर्ति नित्यं स्ववहितोऽक्षरः ॥ ४० ॥
इस प्रकार रक्षारूपी प्रयोजन सिद्ध करनेवाला दण्ड क्षत्रियभावको प्राप्त हुआ है। वह अविनाशी होनेके कारण सदा सावधान होकर प्रजाकी रक्षाके लिये जागता रहता

है ॥ ४० ॥ ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्त्वं चित्तं प्रजापतिः । भूतात्मा जीव इत्येवं नामभिः प्रोच्यतेऽष्टभिः ॥ ४१ ॥ ईश्वर, पुरुष, प्राण, सत्त्व, चित्त, प्रजापति, भूतात्मा तथा जीव—इन आठ नामोंसे दण्डका ही प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४१ ॥ अददद् दण्डमेवास्मै धृतमैश्वर्यमेव च । बलेन यश्च संयुक्तः सदा पञ्चविधात्मकः ॥ ४२ ॥ जो सर्वदा सैनिक-बलसे सम्पन्न है तथा जो धर्म, व्यवहार, दण्ड, ईश्वर और जीवरूपसे पाँच* प्रकारके स्वरूप धारण करता है, उस राजाको ईश्वरने ही दण्डनीति तथा अपना ऐश्वर्य प्रदान किया है ॥ ४२ ॥ कुलं बहुधनामात्याः प्रज्ञा प्रोक्ता बलानि तु । आहार्यमष्टकैर्द्रव्यैर्बलमन्यद् युधिष्ठिर ॥ ४३ ॥ युधिष्ठिर! राजाका बल दो तरह का होता है—एक प्राकृत और दूसरा आहार्य। उनमेंसे कुल, प्रचुर धन, मन्त्री तथा बुद्धि—ये चार प्राकृतिक बल कहे गये हैं, आहार्य बल उससे भिन्न है। वह निम्नांकित आठ वस्तुओंके द्वारा आठ प्रकारका माना गया है ॥ ४३ ॥ हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तिर्नावो विष्टिस्तथैव च । दैशिकाश्चाविकाश्चैव तदष्टाङ्गं बलं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, नौका, बेगार, देशकी प्रजा तथा भेड़ आदि पशु—ये आठ अंगोंवाला बल आहार्य माना गया है ॥ ४४ ॥ अथवाङ्गस्य युक्तस्य रथिनो हस्तियायिनः । अश्वारोहाः पदाताश्च मन्त्रिणो रसदाश्च ये ॥ ४५ ॥ भिक्षुकाः प्राड्विवाकाश्च मौहूर्ता दैवचिन्तकाः । कोशो मित्राणि धान्यं च सर्वोपकरणानि च ॥ ४६ ॥ सप्तप्रकृति चाष्टाङ्गं शरीरमिह यद् विदुः । राज्यस्य दण्डमेवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च ॥ ४७ ॥ अथवा संयुक्त अंगके रथी, हाथीसवार, घुड़सवार, पैदल, मन्त्री, वैद्य, भिक्षुक, वकील, ज्योतिषी, दैवज्ञ, कोश, मित्र, धान्य तथा अन्य सब सामग्री, राज्यकी सात प्रकृतियाँ (स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोश, राष्ट्र, दुर्ग और सेना) और उपर्युक्त आठ अंगोंसे युक्त बल—इन सबको राज्यका शरीर माना गया है। इन सबमें दण्ड ही प्रधान अंग है, क्योंकि दण्ड ही सबकी उत्पत्तिका कारण है ॥ ४५—४७ ॥ ईश्वरेण प्रयत्नेन कारणात् क्षत्रियस्य च । दण्डो दत्तः समानात्मा दण्डो हीदं सनातनम् ॥ ४८ ॥

ईश्वरने यत्नपूर्वक धर्मरक्षाके लिये क्षत्रियके हाथमें उसके समान जातिवाला दण्ड समर्पित किया है; इसलिये दण्ड ही इस सनातन व्यवहारका कारण है ॥ राज्ञां पूज्यतमो नान्यो यथा धर्मः प्रदर्शितः । ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं स्वधर्मस्थापनाय च ॥ ४९ ॥ ब्रह्माजीने लोकरक्षा तथा स्वधर्मकी स्थापनाके निमित्त जिस धर्मका प्रदर्शन (उपदेश) किया था, वह दण्ड ही है। राजाओंके लिये उससे बढ़कर परम पूजनीय दूसरा धर्म नहीं है ॥ ४९ ॥ भर्तृप्रत्यय उत्पन्नो व्यवहारस्तथापरः । तस्माद् यः स हितो दृष्टो भर्तृप्रत्ययलक्षणः ॥ ५० ॥ स्वामी अथवा विचारकके विश्वासके अनुसार जो व्यवहार उत्पन्न होता है, वह (वादी-प्रतिवादीद्वारा उठाये हुए विवादसे उत्पन्न व्यवहारकी अपेक्षा) भिन्न है। उससे जो दण्ड दिया जाता है, उसका नाम है 'भर्तृप्रत्ययलक्षण' वह सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर देखा गया है (यह पहला भेद है) ॥ ५० ॥ व्यवहारस्तु वेदात्मा वेदप्रत्यय उच्यते । मौलश्च नरशार्दूल शास्त्रोक्तश्च तथा परः ॥ ५१ ॥ नरश्रेष्ठ! वेदप्रतिपादित दोषोंका आचरण करने-वाले अपराधीके लिये जो व्यवहार या विचार होता है, वह वेदप्रत्यय कहलाता है (यह दूसरा भेद है) और कुलाचार भंग करनेके अपराधपर किये जानेवाले विचार या व्यवहारको मौल कहते हैं (यह तीसरा भेद है)। इसमें भी शास्त्रोक्त दण्डका ही विधान किया जाता है ॥ उक्तो यश्चापि दण्डोऽसौ भर्तृप्रत्ययलक्षणः । ज्ञेयो नः स नरेन्द्रस्थो दण्डः प्रत्यय एव च ॥ ५२ ॥ पहले जो भर्तृप्रत्ययलक्षण दण्ड बताया गया है, वह हमें राजामें ही स्थित जानना चाहिये; क्योंकि वह विश्वास और दण्ड राजापर ही अवलम्बित है ॥ ५२ ॥ दण्डः प्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मकः स्मृतः । व्यवहारः स्मृतो यश्च स वेदविषयात्मकः ॥ ५३ ॥ यद्यपि स्वामीके विश्वासके आधारपर ही वह दण्ड देखा गया है; तथापि उसे भी व्यवहारस्वरूप ही माना गया है। जिसे व्यवहार माना गया है, वह भी वेदोक्त विषयसे भिन्न नहीं है ॥ ५३ ॥ यश्च वेदप्रसूतात्मा स धर्मो गुणदर्शनः । धर्मप्रत्यय उद्दिष्टो यथाधर्मं कृतात्मभिः ॥ ५४ ॥ जिसका स्वरूप वेदसे प्रकट हुआ है, वह धर्म ही है। जो धर्म है, वह अपना गुण (लाभ) दिखाता ही है। पुण्यात्मा पुरुषोंने धर्मके अनुसार ही धर्मविश्वास मूलक दण्डका प्रतिपादन किया है ॥ ५४ ॥

व्यवहारः प्रजागोप्ता ब्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर ।
त्रीन् धारयति लोकान् वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ॥ ५५ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका बताया हुआ जो प्रजा-रक्षक व्यवहार है, वह सत्यस्वरूप होनेके साथ ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है, वही तीनों लोकोंको धारण करता है ॥ ५५ ॥

यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः ।
व्यवहारश्च दृष्टो यः स वेद इति निश्चितम् ॥ ५६ ॥
जो दण्ड है, वही हमारी दृष्टिमें सनातन व्यवहार है। जो व्यवहार देखा गया है, वही वेद है, यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है ॥ ५६ ॥

यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ।
ब्रह्मा पितामहः पूर्वं बभूवाथ प्रजापतिः ॥ ५७ ॥
जो वेद है, वही धर्म है और जो धर्म है, वही सत्पुरुषोंका सन्मार्ग है। सत्पुरुष हैं लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी, जो सबसे पहले प्रकट हुए थे ॥ ५७ ॥

लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् ।
समनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ॥ ५८ ॥
वे ही देवता, मनुष्य, नाग, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा हैं ॥

ततोऽन्यो व्यवहारोऽयं भर्तृप्रत्ययलक्षणः ।
तस्मादिदमथोवाच व्यवहारनिदर्शनम् ॥ ५९ ॥
उन्हींसे भर्तृप्रत्यय नामक इस अन्य प्रकारके दण्डकी प्रवृत्ति हुई; फिर उन्होंने ही इस व्यवहारके लिये यह आदर्श वाक्य कहा— ॥ ५९ ॥

माता पिता च भ्राता च भार्या चैव पुरोहितः ।
नादण्ड्यो विद्यते राज्ञो यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥ ६० ॥
'माता, पिता, भाई, स्त्री तथा पुरोहित कोई भी क्यों न हो, जो अपने धर्ममें स्थिर नहीं रहता, उसे राजा अवश्य दण्ड दे, राजाके लिये कोई भी अदण्डनीय नहीं है' ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डस्वरूपाधिकथने
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डके स्वरूपका वर्णनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥


१- 'विगतः अवहारः धर्मस्य येन सः व्यवहारः'। दूर हो गया है धर्मका अवहार (लोप) जिसके द्वारा, वह व्यवहार है। इस व्युत्पत्तिके अनुसार धर्मको लुप्त होनेसे बचाना ही व्यवहारका व्यवहारत्व है।

३-यहाँ पद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें आये हुए पदोंकी नीलकण्ठने व्यावहारिक दण्डके विशेषणरूपसे भी संगति लगायी है। इन विशेषणोंको रूपक मानकर अर्थ किया है।

* किन्हीं-किन्हींके मतमें प्रजाके जीवन, धन, मान, स्वास्थ्य और न्यायकी रक्षा करनेके कारण राजाका स्वरूप पाँच प्रकारका बताया गया है।

दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अङ्गेषु राजा द्युतिमान् वसुहोम इति श्रुतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस दण्डकी उत्पत्तिके विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। उसे भी तुम सुन लो। अंगदेशमें वसुहोम नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा राज्य करते थे ॥ १ ॥

स राजा धर्मविन्नित्यं सह पत्न्या महातपाः ।
मुञ्जपृष्ठं जगामाथ पितृदेवर्षिपूजितम् ॥ २ ॥
'एक समयकी बात है, वे महातपस्वी धर्मज्ञ नरेश अपनी पत्नीके साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंसे पूजित मुंजपृष्ठ नामक तीर्थस्थानमें आये ॥ २ ॥

तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते ।
यत्र मुञ्जावटे रामो जटाहरणमादिशत् ॥ ३ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभिः संशितव्रतैः ।
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्तः स देशो रुद्रसेवितः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय पर्वत सुमेरुके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर है, जहाँ मुंजावटमें परशुरामजीने अपनी जटाएँ बाँधनेका आदेश दिया था। तभीसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने उस रुद्रसेवित प्रदेशको मुंजपृष्ठ नाम दे दिया ॥ ३-४ ॥

स तत्र बहुभिर्युक्तस्तदा श्रुतिमयैर्गुणैः ।
ब्राह्मणानामनुमतो देवर्षिसदृशोऽभवत् ॥ ५ ॥
वे वहाँ बहुतेरे वेदोक्त गुणोंसे सम्पन्न हो तपस्या करने लगे। उस तपके प्रभावसे वे देवर्षियोंके तुल्य हो गये। ब्राह्मणोंमें उनका बड़ा सम्मान होने लगा ॥ ५ ॥

तं कदाचिददीनात्मा सखा शक्रस्य मानितः ।
अभ्यगच्छन्महीपालो मान्धाता शत्रुकर्शनः ॥ ६ ॥
एक दिन इन्द्रके सम्मानित सखा उदारचेता शत्रुसूदन राजा मान्धाता उनके दर्शनके लिये आये ॥

सोपसृत्य तु मान्धाता वसुहोमं नराधिपम् ।
दृष्ट्वा प्रकृष्टतपसं विनतोऽग्रेऽभ्यतिष्ठत ॥ ७ ॥

राजा मान्धाता उत्तम तपस्वी अंगनरेश वसुहोमके पास पहुँचकर दर्शन करके उनके सामने विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ७ ॥ वसुहोमोऽपि राज्ञो वै पाद्यमर्घ्यं न्यवेदयत् । सप्ताङ्गस्य तु राज्यस्य पप्रच्छ कुशलाव्यये ॥ ८ ॥ वसुहोमने भी राजाको पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया तथा सातों अंगोंसे युक्त उनके राज्यका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥ सद्गिराचरितं पूर्वं यथावदनुयायिनम् । अपृच्छद् वसुहोमस्तं राजन् किं करवाणि ते ॥ ९ ॥ पूर्वकालमें साधु पुरुषोंने जिस पथका अनुसरण किया था, उसीपर यथावत् रूपसे निरन्तर चलनेवाले मान्धातासे वसुहोमने पूछा—'राजन्! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' ॥ ९ ॥ सोऽब्रवीत्परमप्रीतो मान्धाता राजसत्तमम् । वसुहोमं महाप्राज्ञमासीनं कुरुनन्दन ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! तब परम प्रसन्न हुए मान्धाताने वहाँ बैठे हुए महाज्ञानी नृपश्रेष्ठ वसुहोमसे पूछा ॥ १० ॥

मान्धातोवाच

बृहस्पतेर्मतं राजन्नधीतं सकलं त्वया । तथैवौशनसं शास्त्रं विज्ञातं ते नरोत्तम ॥ ११ ॥ **मान्धाता बोले—**राजन्! नरश्रेष्ठ! आपने बृहस्पतिके सम्पूर्ण मतका अध्ययन किया है। साथ ही शुक्राचार्यके नीतिशास्त्रका भी आपको पूर्ण ज्ञान है ॥ ११ ॥ तदहं ज्ञातुमिच्छामि दण्ड उत्पद्यते कथम् । किं चास्य पूर्वं जागर्ति किं वा परममुच्यते ॥ १२ ॥ अतः मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि दण्डकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसके पहले कौन-सी वस्तु जागरूक थी? तथा इस दण्डको सबसे उत्कृष्ट क्यों कहा जाता है? ॥ कथं क्षत्रियसंस्थश्च दण्डः सम्प्रत्यवस्थितः । ब्रूहि मे सुमहाप्राज्ञ दास्याम्याचार्यवेतनम् ॥ १३ ॥ इस समय यह दण्ड क्षत्रियोंके हाथमें कैसे आया है? महामते! यह सब मुझे बताइये। मैं आपको गुरुदक्षिणा प्रदान करूँगा ॥ १३ ॥

वसुहोम उवाच

शृणु राजन् यथा दण्डः सम्भूतो लोकसंग्रहः । प्रजाविनयरक्षार्थं धर्मस्यात्मा सनातनः ॥ १४ ॥

वसुहोम बोले— राजन्! दण्ड सम्पूर्ण जगत्के नियमके अंदर रखनेवाला है। यह धर्मका सनातन स्वरूप है। इसका उद्देश्य है प्रजाको उद्दण्डतासे बचाना। इसकी उत्पत्ति जिस तरहसे हुई है, सो बता रहा हूँ; सुनो ॥ ब्रह्मा यियक्षुर्भगवान् सर्वलोकपितामहः । ऋत्विजं नात्मनस्तुल्यं ददर्शोति हि नः श्रुतम् ॥ १५ ॥ हमारे सुननेमें आया है कि सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा किसी समय यज्ञ करना चाहते थे; किंतु उन्हें अपने योग्य कोई ऋत्विज नहीं दिखायी दिया ॥ १५ ॥ स गर्भं शिरसा देवो बहुवर्षाण्यधारयत् । पूर्णे वर्षसहस्रे तु स गर्भः क्षुवतोऽपतत् ॥ १६ ॥ तब उन्होंने बहुत वर्षोंतक अपने मस्तकपर एक गर्भ धारण किया। जब एक हजार वर्ष बीत गये, तब ब्रह्माजीको छींक आयी और वह गर्भ नीचे गिर पड़ा ॥ स क्षुपो नाम सम्भूतः प्रजापतिररिंदम । ऋत्विगासीन्महाराज यज्ञे तस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ शत्रुदमन नरेश! उससे जो बालक प्रकट हुआ, उसका नाम 'क्षुप' रखा गया। महाराज! महात्मा ब्रह्माजीके उस यज्ञमें प्रजापति क्षुप ही ऋत्विज हुए ॥ १७ ॥ तस्मिन् प्रवृत्ते सत्रे तु ब्रह्मणः पार्थिवर्षभ । दृष्टरूपप्रधानत्वाद् दण्डः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥ १८ ॥ नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीका वह यज्ञ आरम्भ होते ही वहाँ प्रत्यक्ष दीखनेवाले यज्ञकी प्रधानता होनेसे ब्रह्माका वह दण्ड अन्तर्धान हो गया ॥ १८ ॥ तस्मिन्नन्तर्हिते चापि प्रजानां संकरोऽभवत् । नैव कार्यं न वाकार्यं भोज्याभोज्यं न विद्यते ॥ १९ ॥ दण्ड लुप्त होते ही प्रजामें वर्णसंकरता फैलने लगी। कर्तव्याकर्तव्य तथा भक्ष्याभक्ष्यका विचार सर्वथा उठ गया ॥ १९ ॥ पेयापेये कुतः सिद्धिर्हिंसन्ति च परस्परम् । गम्यागम्यं तदा नासीत् स्वं परस्वं च वै समम् ॥ २० ॥ फिर पेयापेयका ही विचार कैसे रह सकता था? सब लोग एक दूसरेकी हिंसा करने लगे। उस समय गम्यागम्यका विचार भी नहीं रह गया था। अपना और पराया धन एक-सा समझा जाने लगा ॥ २० ॥ परस्परं विलुम्पन्ति सारमेया यथामिषम् । अबलान् बलिनो घ्नन्ति निर्मर्यादमवर्तत ॥ २१ ॥ जैसे कुत्ते मांसके टुकड़ेके लिये आपसमें छीना-झपटी और नोच-खसोट करते हैं, उसी तरह मनुष्य भी परस्पर लूट-पाट करने लगे। बलवान् पुरुष दुर्बलोंकी हत्या करने लगे। सर्वत्र उच्छृंखलता फैल गयी ॥ २१ ॥

ततः पितामहो विष्णुं भगवन्तं सनातनम् । सम्पूज्य वरदं देवं महादेवमथाब्रवीत् ॥ २२ ॥ अत्र त्वमनुकम्पां वै कर्तुमर्हसि शंकर । संकरो न भवेदत्र यथा तद् वै विधीयताम् ॥ २३ ॥ ऐसी अवस्था हो जानेपर पितामह ब्रह्माने सनातन भगवान् विष्णुका पूजन करके वरदायक देवता महादेवजीसे कहा—'शंकर! इस परिस्थितिमें आपको कृपा करनी चाहिये। जिस प्रकार संसारमें वर्णसंकरता न फैले, वह उपाय आप करें ॥ २२-२३ ॥

ततः स भगवान् ध्यात्वा चिरं शूलवरायुधः । आत्मानमात्मना दण्डं ससृजे देवसत्तमः ॥ २४ ॥ तब शूल नामक श्रेष्ठ शस्त्र धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महादेवजीने देरतक विचार करके स्वयं अपने आपको ही दण्डके रूपमें प्रकट किया ॥ २४ ॥

तस्माच्च धर्मचरणान्नीतिर्देवी सरस्वती । ससृजे दण्डनीतिं सा त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ २५ ॥ उससे धर्माचरण होता देख नीतिस्वरूपा देवी सरस्वतीने दण्डनीतिकी रचना की जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ २५ ॥

भूयः स भगवान् ध्यात्वा चिरं शूलवरायुधः । तस्य तस्य निकायस्य चकारैकैकमीश्वरम् ॥ २६ ॥ भगवान् शूलपाणिने पुनः चिरकालतक चिन्तन करके भिन्न-भिन्न समूहका एक-एक राजा बनाया ॥ २६ ॥

देवानामीश्वरं चक्रे देवं दशशतेक्षणम् । यमं वैवस्वतं चापि पितॄणामकरोत् प्रभुम् ॥ २७ ॥ उन्होंने सहस्रनेत्रधारी इन्द्रदेवको देवेश्वरके पदपर प्रतिष्ठित किया और सूर्यपुत्र यमको पितरोंका राजा बनाया ॥ २७ ॥

धनानां राक्षसानां च कुबेरमपि चेश्वरम् । पर्वतानां पतिं मेरुं सरितां च महोदधिम् ॥ २८ ॥ कुबेरको धन और राक्षसोंका, सुमेरुको पर्वतोंका और महासागरको सरिताओंका स्वामी बना दिया ॥ २८ ॥

अपां राज्येऽसुराणां च विदधे वरुणं प्रभुम् । मृत्युं प्राणेश्वरमथो तेजसां च हुताशनम् ॥ २९ ॥ शक्तिशाली भगवान् वरुणको जल और असुरोंके राज्यपर प्रतिष्ठित किया। मृत्युको प्राणोंका तथा अग्नि-देवको तेजका आधिपत्य प्रदान किया ॥ २९ ॥

रुद्राणामपि चेशानं गोप्तारं विदधे प्रभुम् । महात्मानं महादेवं विशालाक्षं सनातनम् ॥ ३० ॥

विशाल नेत्रोंवाले सनातन महात्मा महादेवजीने अपने आपको रुद्रोंका अधीश्वर तथा शक्तिशाली संरक्षक बनाया ॥ ३० ॥

वसिष्ठमीशं विप्राणां वसूनां जातवेदसम् । तेजसां भास्करं चक्रे नक्षत्राणां निशाकरम् ॥ ३१ ॥ वसिष्ठको ब्राह्मणोंका, जातवेदा अग्निको वसुओंका, सूर्यको तेजस्वी ग्रहोंका और चन्द्रमाको नक्षत्रोंका अधिपति बनाया ॥ ३१ ॥

वीरुधामंशुमन्तं च भूतानां च प्रभुं वरम् । कुमारं द्वादशभुजं स्कन्दं राजानमादिशत् ॥ ३२ ॥ अंशुमान्‌को लताओंका तथा बारह भुजाओंसे विभूषित शक्तिशाली कुमार स्कन्दको भूतोंका श्रेष्ठ राजा नियुक्त किया ॥ ३२ ॥

कालं सर्वेशमकरोत् संहारविनयात्मकम् । मृत्योश्चतुर्विभागस्य दुःखस्य च सुखस्य च ॥ ३३ ॥ संहार और विनय (उत्पादन) जिसका स्वरूप है, उस सर्वेश्वर कालको चार प्रकारकी मृत्युका, सुखका और दुःखका भी स्वामी बनाया ॥ ३३ ॥

ईश्वरः सर्वदेवस्तु राजराजो नराधिपः । सर्वेषामेव रुद्राणां शूलपाणिरिति श्रुतिः ॥ ३४ ॥ सबके देवता, राजाओंके राजा और मनुष्योंके अधिपति शूलपाणि भगवान् शिव स्वयं समस्त रुद्रोंके अधीश्वर हुए। ऐसा सुना जाता है ॥ ३४ ॥

तमेनं ब्रह्मणः पुत्रमनुजातं क्षुपं ददौ । प्रजानामधिपं श्रेष्ठं सर्वधर्मभृतामपि ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजीके छोटे पुत्र क्षुपको उन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण धर्मधारियोंका श्रेष्ठ अधिपति बना दिया ॥ ३५ ॥

महादेवस्ततस्तस्मिन् वृत्ते यज्ञे यथाविधि । दण्डं धर्मस्य गोप्तारं विष्णवे सत्कृतं ददौ ॥ ३६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीका वह यज्ञ जब विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया, तब महादेवजीने धर्मरक्षक भगवान् विष्णुका सत्कार करके उन्हें वह दण्ड समर्पित किया ॥ ३६ ॥

विष्णुरङ्गिरसे प्रादादङ्गिरा मुनिसत्तमः । प्रादादिन्द्रमरीचिभ्यां मरीचिर्भार्गवे ददौ ॥ ३७ ॥ भगवान् विष्णुने उसे अंगिराको दे दिया। मुनिवर अंगिराने इन्द्र और मरीचिको दिया और मरीचिने भृगुको सौंप दिया ॥ ३७ ॥

भृगुर्ददावृषिभ्यस्तु दण्डं धर्मसमाहितम् । ऋषयो लोकपालेभ्यो लोकपालाः क्षुपाय च ॥ ३८ ॥ क्षुपस्तु मनवे प्रादादादित्यतनयाय च ।

पुत्रेभ्यः श्राद्धदेवस्तु सूक्ष्मधर्मार्थकारणात् ॥ ३९ ॥
भृगुने वह धर्मसमाहित दण्ड ऋषियोंको दिया। ऋषियोंने लोकपालोंको, लोकपालोंने क्षुपको, क्षुपने सूर्यपुत्र मनु (श्राद्धदेव) को और श्राद्धदेवने सूक्ष्म धर्म तथा अर्थकी रक्षाके लिये उसे अपने पुत्रोंको सौंप दिया ॥ ३८-३९ ॥

विभज्य दण्डः कर्तव्यो धर्मेण न यदृच्छया ।
दुष्टानां निग्रहो दण्डो हिरण्यं बाह्यतः क्रिया ॥ ४० ॥
अतः धर्मके अनुसार न्याय-अन्यायका विचार करके ही दण्डका विधान करना चाहिये, मनमानी नहीं करनी चाहिये। दुष्टोंका दमन करना ही दण्डका मुख्य उद्देश्य है, स्वर्णमुद्राएँ लेकर खजाना भरना नहीं। दण्डके तौरपर सुवर्ण (धन) लेना तो बाह्यांग—गौण कर्म है ॥ ४० ॥

व्यङ्गत्त्वं व शरीरस्य वधो नाल्पस्य कारणात् ।
शरीरपीडास्तास्ताश्च देहत्यागो विवासनम् ॥ ४१ ॥
किसी छोटे-से अपराधपर प्रजाका अंग-भंग करना, उसे मार डालना, उसे तरह-तरहकी यातनाएँ देना तथा उसको देहत्यागके लिये विवश करना अथवा देशसे निकाल देना कदापि उचित नहीं है ॥ ४१ ॥

तं ददौ सूर्यपुत्रस्तु मनुर्वै रक्षणार्थकम् ।
आनुपूर्व्याच्च दण्डोऽयं प्रजा जागर्ति पालयन् ॥ ४२ ॥
सूर्यपुत्र मनुने प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपने पुत्रोंके हाथोंमें दण्ड सौंपा था, वही क्रमशः उत्तरोत्तर अधिकारियोंके हाथमें आकर प्रजाका पालन करता हुआ जागता रहता है ॥ ४२ ॥

इन्द्रो जागर्ति भगवानिन्द्रादग्निर्विभावसुः ।
अग्नेर्जागर्ति वरुणो वरुणाच्च प्रजापतिः ॥ ४३ ॥
भगवान् इन्द्र दण्ड-विधान करनेमें सदा जागरूक रहते हैं। इन्द्रसे प्रकाशमान अग्नि, अग्निसे वरुण और वरुणसे प्रजापति उस दण्डको प्राप्त करके उसके यथोचित प्रयोगके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं ॥ ४३ ॥

प्रजापतेस्ततो धर्मो जागर्ति विनयात्मकः ।
धर्माच्च ब्रह्मणः पुत्रो व्यवसायः सनातनः ॥ ४४ ॥
जो सम्पूर्ण जगत्को शिक्षा देनेवाले हैं, वे धर्म प्रजापतिसे दण्डको ग्रहण करके प्रजाकी रक्षाके लिये सदा जागरूक रहते हैं। ब्रह्मपुत्र सनातन व्यवसाय वह दण्ड धर्मसे लेकर लोकरक्षाके लिये जागते रहते हैं ॥

व्यवसायात् ततस्तेजो जागर्ति परिपालयत् ।
ओषध्यस्तेजसस्तस्मादोषधीभ्यश्च पर्वताः ॥ ४५ ॥
पर्वतेभ्यश्च जागर्ति रसो रसगुणात् तथा ।

जागर्ति निर्ऋतिर्देवी ज्योतींषि निर्ऋतेरपि ॥ ४६ ॥
व्यवसायसे दण्ड लेकर तेज जगत्की रक्षा करता हुआ सजग रहता है। तेजसे ओषधियाँ, ओषधियोंसे पर्वत, पर्वतोंसे रस, रससे निर्ऋति और निर्ऋतिसे ज्योतियाँ क्रमशः उस दण्डको हस्तगत करके लोक-रक्षाके लिये जागरूक बनी रहती हैं॥ ४५-४६॥

वेदाः प्रतिष्ठा ज्योतिर्भ्यस्ततो हयशिरः प्रभुः ।
ब्रह्मा पितामहस्तस्माज्जागर्ति प्रभुरव्ययः ॥ ४७ ॥

ज्योतियोंसे दण्ड ग्रहण करके वेद प्रतिष्ठित हुए हैं। वेदोंसे भगवान् हयग्रीव और हयग्रीवसे अविनाशी प्रभु ब्रह्मा वह दण्ड पाकर लोक-रक्षाके लिये जागते रहते हैं॥ ४७ ॥

पितामहान्महादेवो जागर्ति भगवान् शिवः ।
विश्वेदेवाः शिवाच्चापि विश्वेभ्यश्च तथर्षयः ॥ ४८ ॥
ऋषिभ्यो भगवान् सोमः सोमाद् देवाः सनातनाः ।
देवेभ्यो ब्राह्मणा लोके जाग्रतीत्युपधारय ॥ ४९ ॥

पितामह ब्रह्मासे दण्ड और रक्षाका अधिकार पाकर महान् देव भगवान् शिव जागते हैं। शिवसे विश्वेदेव, विश्वेदेवोंसे ऋषि, ऋषियोंसे भगवान् सोम, सोमसे सनातन देवगण और देवताओंसे ब्राह्मण वह अधिकार लेकर लोक-रक्षाके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ ४८-४९॥

ब्राह्मणेभ्यश्च राजन्या लोकान् रक्षन्ति धर्मतः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव क्षत्रियेभ्यः सनातनम् ॥ ५० ॥

तदनन्तर ब्राह्मणोंसे दण्ड धारणका अधिकार पाकर क्षत्रिय धर्मानुसार सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं। क्षत्रियोंसे ही यह सनातन चराचर जगत् सुरक्षित होता रहा है॥ ५० ॥

प्रजा जागर्ति लोकेऽस्मिन् दण्डो जागर्ति तासु च ।
सर्वं संक्षिपते दण्डः पितामहसमप्रभः ॥ ५१ ॥

इस लोकमें प्रजा जागती है और प्रजाओंमें दण्ड जागता है। वह ब्रह्माजीके समान तेजस्वी दण्ड सबको मर्यादाके भीतर रखता है॥ ५१ ॥

जागर्ति कालः पूर्वं च मध्ये चान्ते च भारत ।
ईश्वरः सर्वलोकस्य महादेवः प्रजापतिः ॥ ५२ ॥

भारत! यह कालरूप दण्ड सृष्टिके आदिमें, मध्यमें और अन्तमें भी जागता रहता है। यह सर्वलोकेश्वर महादेवका स्वरूप है। यही समस्त प्रजाओंका पालक है॥ ५२ ॥

देवदेवः शिवः सर्वो जागर्ति सततं प्रभुः ॥
कपर्दी शङ्करो रुद्रः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ५३ ॥

इस दण्डके रूपमें देवाधिदेव कल्याणस्वरूप सर्वात्मा प्रभु जटाजूटधारी उमावल्लभ दुःखहारी स्थाणु-स्वरूप एवं लोक-मंगलकारी भगवान् शिव ही सदा जाग्रत रहते

हैं ।। ५३ ।। इत्येष दण्डो विख्यात आदौ मध्ये तथावरे । भूमिपालो यथान्यायं वर्तेतानेन धर्मवित् ।। ५४ ।। इस तरह यह दण्ड आदि, मध्य और अन्तमें विख्यात है। धर्मज्ञ राजाको चाहिये कि इसके द्वारा न्यायोचित बर्ताव करे ।। ५४ ।।

भीष्म उवाच इतीदं वसुहोमस्य शृणुयाद् यो मतं नरः । श्रुत्वा सम्यक् प्रवर्तेत सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।। ५५ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जो नरेश इस प्रकार बताये हुए वसुहोमके इस मतको सुनता और सुनकर यथोचित बर्ताव करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।

इति ते सर्वमाख्यातं यो दण्डो मनुजर्षभ । नियन्ता सर्वलोकस्य धर्माक्रान्तस्य भारत ।। ५६ ।। नरश्रेष्ठ! भरतनन्दन! जो दण्ड सम्पूर्ण धार्मिक जगत्‌के नियमके भीतर रखनेवाला है, उसके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, उन्हें मैंने तुम्हें बता दीं ।। ५६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डोत्पत्युपाख्याने द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डकी उत्पत्तिकी कथाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२२ ।।

त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

तात धर्मार्थकामानां श्रोतुमिच्छामि निश्चयम् ।
लोकयात्रा हि कात्स्न्र्येन तिष्ठेत् केषु प्रतिष्ठिता ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! मैं धर्म, अर्थ और कामके सम्बन्धमें आपका निश्चित मत सुनना चाहता हूँ। किनपर अवलम्बित होनेपर लोकयात्राका पूर्ण रूपसे निर्वाह होता है? ॥ १ ॥

धर्मार्थकामाः किंमूलास्त्रयाणां प्रभवश्च कः ।
अन्योन्यं चानुषज्जन्ते वर्तन्ते च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥

धर्म, अर्थ और कामका मूल क्या है? इन तीनोंकी उत्पत्तिका कारण क्या है? ये कहीं एक साथ मिले हुए और कहीं पृथक्-पृथक् क्यों रहते हैं? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

यदा ते स्युः सुमनसो लोके धर्मार्थनिश्चये ।
कालप्रभवसंस्थासु सज्जन्ते च त्रयस्तदा ॥ ३ ॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! संसारमें जब मनुष्योंका चित्त शुद्ध होता है और वे धर्मपूर्वक किसी अर्थकी प्राप्तिका निश्चय करके प्रवृत्त होते हैं, उस समय उचित काल, कारण तथा कर्मानुष्ठानवश धर्म, अर्थ और काम-तीनों एक साथ मिले हुए प्रकट होते हैं ॥ ३ ॥

धर्ममूलः सदैवार्थः कामोऽर्थफलमुच्यते ।
संकल्पमूलास्ते सर्वे संकल्पो विषयात्मकः ॥ ४ ॥

इनमें धर्म सदा ही अर्थकी प्राप्तिका कारण है और काम अर्थका फल कहलाता है, परंतु इन तीनोंका मूल कारण है संकल्प और संकल्प है विषयरूप ॥ ४ ॥

विषयाश्चैव कात्स्न्र्येन सर्व आहारसिद्धये ।
मूलमेतत् त्रिवर्गस्य निवृत्तिर्मोक्ष उच्यते ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण विषय पूर्णतः इन्द्रियोंके उपभोगमें आनेके लिये हैं। यही धर्म, अर्थ और कामका मूल है, इससे निवृत्त होना ही 'मोक्ष' कहा जाता है ॥ ५ ॥

धर्माच्छरीरसंगुप्तिर्धर्मार्थं चार्थ उच्यते ।