महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 813, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
तात धर्मार्थकामानां श्रोतुमिच्छामि निश्चयम् ।
लोकयात्रा हि कात्स्न्र्येन तिष्ठेत् केषु प्रतिष्ठिता ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! मैं धर्म, अर्थ और कामके सम्बन्धमें आपका निश्चित मत सुनना चाहता हूँ। किनपर अवलम्बित होनेपर लोकयात्राका पूर्ण रूपसे निर्वाह होता है? ॥ १ ॥
धर्मार्थकामाः किंमूलास्त्रयाणां प्रभवश्च कः ।
अन्योन्यं चानुषज्जन्ते वर्तन्ते च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
धर्म, अर्थ और कामका मूल क्या है? इन तीनोंकी उत्पत्तिका कारण क्या है? ये कहीं एक साथ मिले हुए और कहीं पृथक्-पृथक् क्यों रहते हैं? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
यदा ते स्युः सुमनसो लोके धर्मार्थनिश्चये ।
कालप्रभवसंस्थासु सज्जन्ते च त्रयस्तदा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! संसारमें जब मनुष्योंका चित्त शुद्ध होता है और वे धर्मपूर्वक किसी अर्थकी प्राप्तिका निश्चय करके प्रवृत्त होते हैं, उस समय उचित काल, कारण तथा कर्मानुष्ठानवश धर्म, अर्थ और काम-तीनों एक साथ मिले हुए प्रकट होते हैं ॥ ३ ॥
धर्ममूलः सदैवार्थः कामोऽर्थफलमुच्यते ।
संकल्पमूलास्ते सर्वे संकल्पो विषयात्मकः ॥ ४ ॥
इनमें धर्म सदा ही अर्थकी प्राप्तिका कारण है और काम अर्थका फल कहलाता है, परंतु इन तीनोंका मूल कारण है संकल्प और संकल्प है विषयरूप ॥ ४ ॥
विषयाश्चैव कात्स्न्र्येन सर्व आहारसिद्धये ।
मूलमेतत् त्रिवर्गस्य निवृत्तिर्मोक्ष उच्यते ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण विषय पूर्णतः इन्द्रियोंके उपभोगमें आनेके लिये हैं। यही धर्म, अर्थ और कामका मूल है, इससे निवृत्त होना ही 'मोक्ष' कहा जाता है ॥ ५ ॥
धर्माच्छरीरसंगुप्तिर्धर्मार्थं चार्थ उच्यते ।