महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 812, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं ।। ५३ ।। इत्येष दण्डो विख्यात आदौ मध्ये तथावरे । भूमिपालो यथान्यायं वर्तेतानेन धर्मवित् ।। ५४ ।। इस तरह यह दण्ड आदि, मध्य और अन्तमें विख्यात है। धर्मज्ञ राजाको चाहिये कि इसके द्वारा न्यायोचित बर्ताव करे ।। ५४ ।।
भीष्म उवाच इतीदं वसुहोमस्य शृणुयाद् यो मतं नरः । श्रुत्वा सम्यक् प्रवर्तेत सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।। ५५ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जो नरेश इस प्रकार बताये हुए वसुहोमके इस मतको सुनता और सुनकर यथोचित बर्ताव करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।
इति ते सर्वमाख्यातं यो दण्डो मनुजर्षभ । नियन्ता सर्वलोकस्य धर्माक्रान्तस्य भारत ।। ५६ ।। नरश्रेष्ठ! भरतनन्दन! जो दण्ड सम्पूर्ण धार्मिक जगत्के नियमके भीतर रखनेवाला है, उसके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, उन्हें मैंने तुम्हें बता दीं ।। ५६ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डोत्पत्युपाख्याने द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डकी उत्पत्तिकी कथाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२२ ।।