महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 806, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा मान्धाता उत्तम तपस्वी अंगनरेश वसुहोमके पास पहुँचकर दर्शन करके उनके सामने विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ७ ॥ वसुहोमोऽपि राज्ञो वै पाद्यमर्घ्यं न्यवेदयत् । सप्ताङ्गस्य तु राज्यस्य पप्रच्छ कुशलाव्यये ॥ ८ ॥ वसुहोमने भी राजाको पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया तथा सातों अंगोंसे युक्त उनके राज्यका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥ सद्गिराचरितं पूर्वं यथावदनुयायिनम् । अपृच्छद् वसुहोमस्तं राजन् किं करवाणि ते ॥ ९ ॥ पूर्वकालमें साधु पुरुषोंने जिस पथका अनुसरण किया था, उसीपर यथावत् रूपसे निरन्तर चलनेवाले मान्धातासे वसुहोमने पूछा—'राजन्! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' ॥ ९ ॥ सोऽब्रवीत्परमप्रीतो मान्धाता राजसत्तमम् । वसुहोमं महाप्राज्ञमासीनं कुरुनन्दन ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! तब परम प्रसन्न हुए मान्धाताने वहाँ बैठे हुए महाज्ञानी नृपश्रेष्ठ वसुहोमसे पूछा ॥ १० ॥
मान्धातोवाच
बृहस्पतेर्मतं राजन्नधीतं सकलं त्वया । तथैवौशनसं शास्त्रं विज्ञातं ते नरोत्तम ॥ ११ ॥ **मान्धाता बोले—**राजन्! नरश्रेष्ठ! आपने बृहस्पतिके सम्पूर्ण मतका अध्ययन किया है। साथ ही शुक्राचार्यके नीतिशास्त्रका भी आपको पूर्ण ज्ञान है ॥ ११ ॥ तदहं ज्ञातुमिच्छामि दण्ड उत्पद्यते कथम् । किं चास्य पूर्वं जागर्ति किं वा परममुच्यते ॥ १२ ॥ अतः मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि दण्डकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसके पहले कौन-सी वस्तु जागरूक थी? तथा इस दण्डको सबसे उत्कृष्ट क्यों कहा जाता है? ॥ कथं क्षत्रियसंस्थश्च दण्डः सम्प्रत्यवस्थितः । ब्रूहि मे सुमहाप्राज्ञ दास्याम्याचार्यवेतनम् ॥ १३ ॥ इस समय यह दण्ड क्षत्रियोंके हाथमें कैसे आया है? महामते! यह सब मुझे बताइये। मैं आपको गुरुदक्षिणा प्रदान करूँगा ॥ १३ ॥
वसुहोम उवाच
शृणु राजन् यथा दण्डः सम्भूतो लोकसंग्रहः । प्रजाविनयरक्षार्थं धर्मस्यात्मा सनातनः ॥ १४ ॥