महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 807, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसुहोम बोले— राजन्! दण्ड सम्पूर्ण जगत्के नियमके अंदर रखनेवाला है। यह धर्मका सनातन स्वरूप है। इसका उद्देश्य है प्रजाको उद्दण्डतासे बचाना। इसकी उत्पत्ति जिस तरहसे हुई है, सो बता रहा हूँ; सुनो ॥ ब्रह्मा यियक्षुर्भगवान् सर्वलोकपितामहः । ऋत्विजं नात्मनस्तुल्यं ददर्शोति हि नः श्रुतम् ॥ १५ ॥ हमारे सुननेमें आया है कि सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा किसी समय यज्ञ करना चाहते थे; किंतु उन्हें अपने योग्य कोई ऋत्विज नहीं दिखायी दिया ॥ १५ ॥ स गर्भं शिरसा देवो बहुवर्षाण्यधारयत् । पूर्णे वर्षसहस्रे तु स गर्भः क्षुवतोऽपतत् ॥ १६ ॥ तब उन्होंने बहुत वर्षोंतक अपने मस्तकपर एक गर्भ धारण किया। जब एक हजार वर्ष बीत गये, तब ब्रह्माजीको छींक आयी और वह गर्भ नीचे गिर पड़ा ॥ स क्षुपो नाम सम्भूतः प्रजापतिररिंदम । ऋत्विगासीन्महाराज यज्ञे तस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ शत्रुदमन नरेश! उससे जो बालक प्रकट हुआ, उसका नाम 'क्षुप' रखा गया। महाराज! महात्मा ब्रह्माजीके उस यज्ञमें प्रजापति क्षुप ही ऋत्विज हुए ॥ १७ ॥ तस्मिन् प्रवृत्ते सत्रे तु ब्रह्मणः पार्थिवर्षभ । दृष्टरूपप्रधानत्वाद् दण्डः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥ १८ ॥ नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीका वह यज्ञ आरम्भ होते ही वहाँ प्रत्यक्ष दीखनेवाले यज्ञकी प्रधानता होनेसे ब्रह्माका वह दण्ड अन्तर्धान हो गया ॥ १८ ॥ तस्मिन्नन्तर्हिते चापि प्रजानां संकरोऽभवत् । नैव कार्यं न वाकार्यं भोज्याभोज्यं न विद्यते ॥ १९ ॥ दण्ड लुप्त होते ही प्रजामें वर्णसंकरता फैलने लगी। कर्तव्याकर्तव्य तथा भक्ष्याभक्ष्यका विचार सर्वथा उठ गया ॥ १९ ॥ पेयापेये कुतः सिद्धिर्हिंसन्ति च परस्परम् । गम्यागम्यं तदा नासीत् स्वं परस्वं च वै समम् ॥ २० ॥ फिर पेयापेयका ही विचार कैसे रह सकता था? सब लोग एक दूसरेकी हिंसा करने लगे। उस समय गम्यागम्यका विचार भी नहीं रह गया था। अपना और पराया धन एक-सा समझा जाने लगा ॥ २० ॥ परस्परं विलुम्पन्ति सारमेया यथामिषम् । अबलान् बलिनो घ्नन्ति निर्मर्यादमवर्तत ॥ २१ ॥ जैसे कुत्ते मांसके टुकड़ेके लिये आपसमें छीना-झपटी और नोच-खसोट करते हैं, उसी तरह मनुष्य भी परस्पर लूट-पाट करने लगे। बलवान् पुरुष दुर्बलोंकी हत्या करने लगे। सर्वत्र उच्छृंखलता फैल गयी ॥ २१ ॥