भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अङ्गेषु राजा द्युतिमान् वसुहोम इति श्रुतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस दण्डकी उत्पत्तिके विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। उसे भी तुम सुन लो। अंगदेशमें वसुहोम नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा राज्य करते थे ॥ १ ॥

स राजा धर्मविन्नित्यं सह पत्न्या महातपाः ।
मुञ्जपृष्ठं जगामाथ पितृदेवर्षिपूजितम् ॥ २ ॥
'एक समयकी बात है, वे महातपस्वी धर्मज्ञ नरेश अपनी पत्नीके साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंसे पूजित मुंजपृष्ठ नामक तीर्थस्थानमें आये ॥ २ ॥

तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते ।
यत्र मुञ्जावटे रामो जटाहरणमादिशत् ॥ ३ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभिः संशितव्रतैः ।
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्तः स देशो रुद्रसेवितः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय पर्वत सुमेरुके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर है, जहाँ मुंजावटमें परशुरामजीने अपनी जटाएँ बाँधनेका आदेश दिया था। तभीसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने उस रुद्रसेवित प्रदेशको मुंजपृष्ठ नाम दे दिया ॥ ३-४ ॥

स तत्र बहुभिर्युक्तस्तदा श्रुतिमयैर्गुणैः ।
ब्राह्मणानामनुमतो देवर्षिसदृशोऽभवत् ॥ ५ ॥
वे वहाँ बहुतेरे वेदोक्त गुणोंसे सम्पन्न हो तपस्या करने लगे। उस तपके प्रभावसे वे देवर्षियोंके तुल्य हो गये। ब्राह्मणोंमें उनका बड़ा सम्मान होने लगा ॥ ५ ॥

तं कदाचिददीनात्मा सखा शक्रस्य मानितः ।
अभ्यगच्छन्महीपालो मान्धाता शत्रुकर्शनः ॥ ६ ॥
एक दिन इन्द्रके सम्मानित सखा उदारचेता शत्रुसूदन राजा मान्धाता उनके दर्शनके लिये आये ॥

सोपसृत्य तु मान्धाता वसुहोमं नराधिपम् ।
दृष्ट्वा प्रकृष्टतपसं विनतोऽग्रेऽभ्यतिष्ठत ॥ ७ ॥