महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 831, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउधर वह वनमें विचरनेवाला मृग अकेला ही अनेकों नदों, नदियों, गड्डों और जंगलोंको बारंबार लाँघता हुआ आगे-आगे भागता जा रहा था ॥ १३ ॥
स तु कामान्मृगो राजन्नासाद्यासाद्य तं नृपम् । पुनरभ्येति जवनो जवेन महता ततः ॥ १४ ॥ राजन्! वह वेगशाली मृग अपनी इच्छासे ही राजाके निकट आ-आकर पुनः बड़े वेगसे आगे भागता था ॥ १४ ॥
स तस्य बाणैर्बहुभिः समभ्यस्तो वनेचरः । प्रक्रीडन्निव राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! यद्यपि राजाके बहुत-से बाण उसके शरीरमें धँस गये थे, तथापि वह वनचारी मृग खेल करता हुआ-सा बारंबार उनके निकट आ जाता था ॥ १५ ॥
पुनश्चजवमास्थाय जवनो मृगयूथपः । अतीत्यातीत्य राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! वह मृगसमूहोंका सरदार था। उसका वेग बड़ा तीव्र था। वह बारंबार बड़े वेगसे छलाँग मारता और दूरतककी भूमि लाँघ-लाँघकर पुनः निकट आ जाता था ॥ १६ ॥
तस्य मर्मच्छिदं घोरं तीक्ष्णं चामित्रकर्शनः । समादाय शरं श्रेष्ठं कार्मुके तु तथासृजत् ॥ १७ ॥ तब शत्रुसूदन नरेशने एक बड़ा भयंकर तीखा बाण हाथमें लिया, जो मर्मस्थलोंको विदीर्ण कर देनेवाला था। उस श्रेष्ठ बाणको उन्होंने धनुषपर रखा ॥ १७ ॥
ततो गव्यूतिमात्रेण मृगयूथपयूथपः । तस्य बाणपथं मुक्त्वा तस्थिवान् प्रहसन्निव ॥ १८ ॥ यह देख मृगोंका वह यूथपति राजाके बाणका मार्ग छोड़कर दो कोस दूर जा पहुँचा और हँसता हुआ-सा खड़ा हो गया ॥ १८ ॥
तस्मिन् निपतिते बाणे भूमौ ज्वलिततेजसि । प्रविवेश महारण्यं मृगो राजाप्यथाद्रवत् ॥ १९ ॥ जब राजाका वह तेजस्वी बाण पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब मृग एक महान् वनमें घुस गया, राजाने उस समय भी उसका पीछा नहीं छोड़ा ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥