महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 838, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! वे उससे एक सुवर्णमय कलश और वल्कल माँग रहे थे। आपके पुत्रने अवहेलना करके भी महर्षिकी वह इच्छा पूरी नहीं की; इससे वे विप्र ऋषि अत्यन्त खिन्न और निराश हो गये थे ॥ २२ ॥
एवमुक्तोऽभिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम् । श्रान्तोऽवसीदद् धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम ॥ २३ ॥ (ऋषभ कहते हैं—) नरश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर उन लोकपूजित महर्षिको प्रणाम करके धर्मात्मा राजा वीरद्युम्न तुम्हारे ही समान थककर शिथिल हो गये ॥ २३ ॥
अर्घ्यं ततः समानीय पाद्यं चैव महार्नृषिः । आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् उन महर्षिने तपोवनमें प्रचलित शिष्टाचारकी विधिसे राजाको पाद्य और अर्घ्य आदि सब वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ २४ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे परिवार्य नरर्षभम् । उपाविशन् नरव्याघ्र सप्तर्षय इव ध्रुवम् ॥ २५ ॥ पुरुषसिंह! तब वे सभी मुनि नरश्रेष्ठ वीरद्युम्नको सब ओरसे घेरकर उनके पास बैठ गये, मानो सप्तर्षि ध्रुवको चारों ओरसे घेरकर शोभा पा रहे हों ॥ २५ ॥
अपृच्छंश्चैव तं तत्र राजानमपराजितम् । प्रयोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य निवेशने ॥ २६ ॥ उन सबने वहाँ उन अपराजित नरेशसे उस आश्रमपर पधारनेका सारा प्रयोजन पूछा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
* 'विहायसा गच्छन्त्या मन्दाकिन्या वैहायस्या अयं वैहायसः' अर्थात् आकाशमार्गसे गमन करनेवाली मन्दाकिनी या आकाश गंगाका नाम वैहायसी है। वहींके जलसे भरा होनेके कारण वह कुण्ड वैहायस कहलाता है। बदरिकाश्रममें गंगाका नाम अलकनन्दा है।