भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 845

स तं विदित्वा ब्रह्मर्षिर्यममागतमोजसा । प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा उपविष्टस्तपोधनः ॥ ७ ॥ ब्रह्मर्षि गौतमने वहाँ आये हुए यमराजको उनके तेजसे ही जान लिया। फिर वे तपोधन मुनि हाथ जोड़ संयतचित्त हो उनके पास जा बैठे ॥ ७ ॥

तं धर्मराजो दृष्ट्वैव सत्कृत्यैव द्विजर्षभम् । न्यमन्त्रयत धर्मेण क्रियतां किमिति ब्रुवन् ॥ ८ ॥ धर्मराजने विप्रवर गौतमको देखते ही उनका सत्कार किया और मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ऐसा कहते हुए उन्हें धर्मचर्चा सुननेके लिये सम्मति प्रदान की ॥ ८ ॥

गौतम उवाच

मातापितृभ्यामानृण्यं किं कृत्वा समवाप्नुयात् । कथं च लोकानाप्नोति पुरुषो दुर्लभान् शुचीन् ॥ ९ ॥ **तब गौतमने कहा—**भगवन्! मनुष्य कौन-सा कर्म करके माता-पिताके ऋणसे उऋण हो सकता है? और किस प्रकार उसे दुर्लभ एवं पवित्र लोकोंकी प्राप्ति होती है? ॥ ९ ॥

यम उवाच

तपःशौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च । मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥ १० ॥ **यमराजने कहा—**ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर-भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे। यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ १० ॥

अश्वमेधैश्च यष्टव्यं बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः । तेन लोकानवाप्नोति पुरुषोऽद्भुतदर्शनान् ॥ ११ ॥ राजाको तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान भी करना चाहिये। ऐसा करनेसे पुरुष अद्भुत दृश्योंसे सम्पन्न पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि यमगौतमसंवादे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें यम और गौतमका संवादविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥