भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 847, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 847

धर्मके विषयमें कुछ भी नहीं कह सकता था ॥ धर्मो ह्यणीयान् वचनाद् बुद्धिश्च भरतर्षभ । श्रुत्वोपास्य सदाचारैः साधुर्भवति स क्वचित् ॥ ६ ॥ भरतभूषण! धर्मका विषय बड़ा सूक्ष्म है, शास्त्र-वचनोंके अनुशीलनसे उसका बोध होता है। शास्त्रश्रवण करनेके पश्चात् अपने सदाचरणोंद्वारा उसका सेवन करके साधुजीवन व्यतीत करनेवाला पुरुष कहीं कोई बिरला ही होता है ॥ ६ ॥ कर्मणा बुद्धिपूर्वेण भवत्याढ्यो न वा पुनः । तादृशोऽयमनुप्रश्नः संव्यवस्यः स्वया धिया ॥ ७ ॥ बुद्धिपूर्वक किये हुए कर्म (प्रयत्न)-से मनुष्य धनाढ्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। तुम्हें ऐसे प्रश्नपर स्वयं अपनी ही बुद्धिसे विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचना चाहिये ॥ ७ ॥ उपायं धर्मबहुलं यात्रार्थं शृणु भारत । नाहमेतादृशं धर्मं बुभूषे धर्मकारणात् ॥ ८ ॥ भारत! उपर्युक्त संकटके समय राजाओंके जीवनकी रक्षाके लिये मैं ऐसा उपाय बताता हूँ जिसमें धर्मकी अधिकता है, उसे ध्यान देकर सुनो। परंतु मैं धर्माचरणके उद्देश्यसे ऐसे धर्मको नहीं अपनाना चाहता ॥ ८ ॥ दुःखादान इह ह्येष स्यात् तु पश्चात् क्षयोपमः । अभिगम्यमतीनां हि सर्वासामेव निश्चयः ॥ ९ ॥ आपत्तिके समय भी यदि प्रजाको दुःख देकर धन वसूल किया जाता है तो पीछे वह राजाके लिये विनाशके तुल्य सिद्ध होता है। आश्रय लेने योग्य जितनी बुद्धियाँ हैं, उन सबका यही निश्चय है ॥ ९ ॥ यथा यथा हि पुरुषो नित्यं शास्त्रमवेक्षते । तथा तथा विजानाति विज्ञानमथ रोचते ॥ १० ॥ पुरुष प्रतिदिन जैसे-जैसे शास्त्रका स्वाध्याय करता है वैसे-वैसे उसका ज्ञान बढ़ता जाता है फिर तो विशेष ज्ञान प्राप्त करनेमें ही उसकी रुचि हो जाती है ॥ १० ॥ अविज्ञानादयोगो हि पुरुषस्योपजायते । विज्ञानादपि योगश्च योगो भूतिकरः परः ॥ ११ ॥ ज्ञान न होनेसे मनुष्यको संकटकालमें उससे बचनेके लिये कोई योग्य उपाय नहीं सूझता; परंतु ज्ञानसे वह उपाय ज्ञात हो जाता है। उचित उपाय ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेका श्रेष्ठ साधन है ॥ ११ ॥ अशंकमानो वचनमनसूयुरिदं शृणु । राज्ञः कोशक्षयादेव जायते बलसंक्षयः ॥ १२ ॥