भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 848

तुम मेरी बातपर संदेह न करते हुए दोषदृष्टिका परित्याग करके यह उपदेश सुनो। खजानेके नष्ट होनेसे ही राजाके बलका नाश होता है ॥ १२ ॥ कोशं च जनयेद् राजा निर्जलेभ्यो यथा जलम् । कालं प्राप्यानुगृह्णीयादेष धर्मः सनातनः ॥ उपायधर्मं प्राप्यैमं पूर्वैराचरितं जनैः ॥ १३ ॥ जैसे मनुष्य निर्जल स्थानोंसे भी खोदकर जल निकाल लेता है उसी प्रकार राजा संकटकालमें निर्धन प्रजासे भी यथासाध्य धन लेकर अपना खजाना बढ़ावे; फिर अच्छा समय आनेपर उस धनके द्वारा प्रजापर अनुग्रह करे, यही सनातनकालसे चला आनेवाला धर्म है। पूर्ववर्ती राजाओंने भी आपत्तिकालमें इस उपायधर्मको पाकर इसका आचरण किया है ॥ १३ ॥ अन्यो धर्मः समर्थानामापत्स्वन्यश्च भारत । प्राक्कोशात् प्राप्यते धर्मो वृत्तिर्धर्माद् गरीयसी ॥ १४ ॥ भारत! सामर्थ्यशाली पुरुषोंका धर्म दूसरा है और आपत्तिग्रस्त मनुष्योंका दूसरा। अतः पहले कोशसंग्रह कर लेनेपर राजाके लिये धर्मपालनका अवसर प्राप्त होता है; क्योंकि जीवन-निर्वाहका साधन प्राप्त करना धर्मसे भी बड़ा है ॥ १४ ॥ धर्मं प्राप्य न्यायवृत्तिं न बलीयान् न विन्दति । यस्माद् बलस्योपपत्तिरेकान्तेन न विद्यते ॥ १५ ॥ तस्मादापत्स्वधर्मोऽपि श्रूयते धर्मलक्षणः । अधर्मो जायते तस्मिन्निति वै कवयो विदुः ॥ १६ ॥ दुर्बल मनुष्य धर्मको पाकर भी न्यायोचित्त जीविका नहीं उपलब्ध कर पाता है। धर्माचरण करनेसे बलकी प्राप्ति अवश्य हो जायगी, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता; इसलिये आपत्तिकालमें अधर्म भी धर्मरूप सुना जाता है। परंतु विद्वान् पुरुष ऐसा मानते हैं कि आपत्तिकालमें भी धर्मके विरुद्ध आचरण करनेसे अधर्म होता ही है ॥ १५-१६ ॥ अनन्तरं क्षत्रियस्य तत्र किं विचिकित्स्यते । यथास्य धर्मो न ग्लायेन्नेयाच्छत्रुवशं यथा । तत् कर्तव्यमिहेत्याहुर्नात्मानवसादयेत् ॥ १७ ॥ आपत्ति दूर होनेके बाद क्षत्रियको क्या करना चाहिये? वह प्रायश्चित्त करे या प्रजासे कर लेना छोड़ दे; यह संशय उपस्थित होता है। इसका समाधान यह है कि वह ऐसा बर्ताव करे जिससे उसके धर्मको हानि न पहुँचे तथा उसे शत्रुके अधीन न होना पड़े। विद्वानोंने उसके लिये यही कर्तव्य बतलाया है, वह किसी तरह अपने-आपको संकटमें न डाले ॥ १७ ॥ सर्वात्मनैव धर्मस्य न परस्य न चात्मनः ।