भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 849

सर्वोपायैरुज्जिहीर्षेदात्मानमिति निश्चयः ॥ १८ ॥
संकटकालमें मनुष्य अपने या दूसरेके धर्मकी ओर न देखे; अपितु सम्पूर्ण हृदयसे सभी उपायोंद्वारा अपने आपके ही उद्धारकी अभिलाषा करे, यही सबका निश्चय है ॥ १८ ॥
तत्र धर्मविदां तात निश्चयो धर्मनैपुणम् ।
उद्यमो नैपुणं क्षात्रे बाहुवीर्यादिति श्रुतिः ॥ १९ ॥
तात! धर्मज्ञ पुरुषोंका निश्चय जैसे उनकी धर्म-विषयक निपुणताको सूचित करता है, उसी प्रकार बाहुबलसे अपनी उन्नतिके लिये उद्योग करना क्षत्रियकी निपुणताका सूचक है; यह श्रुतिका निर्णय है ॥ १९ ॥
क्षत्रियो वृत्तिसंरोधे कस्य नादातुमर्हति ।
अन्यत्र तापसस्वाच्च ब्राह्मणस्वाच्च भारत ॥ २० ॥
भरतनन्दन! क्षत्रिय यदि आजीविकासे रहित हो जाय तो वह तपस्वी और ब्राह्मणका धन छोड़कर और किसका धन नहीं ले सकता है (अर्थात् सभीका ले सकता है) ॥ २० ॥
यथा वै ब्राह्मणः सीदन्नयाज्यमपि याजयेत् ।
अभोज्यान्नानि चाश्नीयात् तथेदं नात्र संशयः ॥ २१ ॥
जैसे ब्राह्मण यदि जीविकाके अभावमें कष्ट पा रहा हो तो वह यज्ञके अनधिकारीसे भी यज्ञ करा सकता है तथा प्राण बचानेके लिये न खाने योग्य अन्नको भी खा सकता है, उसी प्रकार यह (पूर्वश्लोकमें) क्षत्रियके लिये भी कर्तव्यका निर्देश किया गया है। इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
पीडितस्य किमद्वारमुत्पथो विधृतस्य च ।
अद्वारतः प्रद्रवति यदा भवति पीडितः ॥ २२ ॥
आपद्ग्रस्त मनुष्यके लिये कौन-सा द्वार नहीं है? (वह जिस ओरसे निकल भागे, वही उसके लिये द्वार है)। कैदीके लिये कौन-सा बुरा मार्ग है (वह बिना मार्गके भी भागकर आत्मरक्षा कर सके तो ऐसा प्रयत्न कर सकता है)। मनुष्य जब आपत्तिमें घिरा होता है तब वह बिना दरवाजेके भी भाग निकलता है ॥ २२ ॥
यस्य कोशबलग्लान्या सर्वलोकपराभवः ।
भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट् शूद्रजीविका ॥ २३ ॥
खजाना और सेना न रहनेसे जिस क्षत्रियको सब लोगोंकी ओरसे पराभव प्राप्त होनेकी सम्भावना हो, उसीके लिये उपर्युक्त बातें बतायी गयी हैं। भीख माँगने और वैश्य या शूद्रकी जीविका अपनानेका क्षत्रियके लिये विधान नहीं है ॥ २३ ॥
स्वधर्मानन्तरा वृत्तिर्जात्याननुपजीवतः ।
जहतः प्रथमं कल्पमनुकल्पेन जीवनम् ॥ २४ ॥
परंतु जब अपनी जातिके लिये प्रतिपादित धर्मका अवलम्बन करके जीवन-निर्वाह न कर सके तब उसके लिये स्वधर्मसे विपरीत वृत्ति भी बतायी गयी है। क्योंकि आपत्तिकालमें