महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 850, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम कल्प अर्थात् स्वधर्मानुकूल वृत्तिका त्याग करनेवाले पुरुषके लिये अपनेसे नीचे वर्णकी वृत्तिसे जीविका चलानेका विधान है ॥ २४ ॥ आपद्गतेन धर्माणांमन्यायेनोपजीवनम् । अपि ह्येतद् ब्राह्मणेषु दृष्टं वृत्तिपरिक्षये ॥ २५ ॥ जो आपत्तिमें पड़ा हो वह धर्मके विपरीत आचरणद्वारा जीवन-निर्वाह कर सकता है। जीविका क्षीण होनेपर ब्राह्मणोंमें ऐसा व्यवहार देखा गया है ॥ २५ ॥ क्षत्रिये संशयः कस्मादित्येवं निश्चितं सदा । आददीत विशिष्टेभ्यो नावसीदेत् कथंचन ॥ २६ ॥ फिर क्षत्रियके लिये कैसे संदेह किया जा सकता है? उसके लिये भी सदा यही निश्चित है कि वह आपत्तिकालमें विशिष्ट अर्थात् धनवान् पुरुषोंसे बलपूर्वक धन ग्रहण करे। धनके अभावमें वह किसी तरह कष्ट न भोगे ॥ २६ ॥ हन्तारं रक्षितारं च प्रजानां क्षत्रियं विदुः । तस्मात् संरक्षता कार्यमादानं क्षत्रबन्धुना ॥ २७ ॥ विद्वान् पुरुष क्षत्रियको प्रजाका रक्षक और विनाशक भी मानते हैं। अतः क्षत्रियबन्धुको प्रजाकी रक्षा करते हुए ही धन ग्रहण करना चाहिये ॥ २७ ॥ अन्यत्र राजन् हिंसाया वृत्तिर्नेहास्ति कस्यचित् । अप्यरण्यसमुत्थस्य एकस्य चरतो मुनेः ॥ २८ ॥ राजन्! इस संसारमें किसीकी भी ऐसी वृत्ति नहीं है, जो हिंसासे शून्य हो। औरोंकी तो बात ही क्या है, वनमें रहकर एकाकी विचरनेवाले तपस्वी मुनिकी भी वृत्ति सर्व था हिंसारहित नहीं है ॥ २८ ॥ न शंखलिखितां वृत्तिं शक्यमास्थाय जीवितुम् । विशेषतः कुरुश्रेष्ठ प्रजापालनमीप्सया ॥ २९ ॥ कुरुश्रेष्ठ! कोई भी ललाटमें लिखी हुई वृत्तिका ही भरोसा करके जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता; अतः प्रजापालनकी इच्छा रखनेवाले राजाका भाग्यके भरोसे निर्वाह चलाना तो सर्वथा अशक्य है ॥ २९ ॥ परस्परं हि संरक्षा राज्ञा राष्ट्रेण चापदि । नित्यमेव हि कर्तव्या एष धर्मः सनातनः ॥ ३० ॥ इसलिये आपत्तिकालमें राजा और राज्यकी प्रजा दोनोंको निरन्तर एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये। यही सदाका धर्म है ॥ ३० ॥ राजा राष्ट्रं यथाऽऽपत्सु द्रव्यौघैरपि रक्षति । राष्ट्रेण राजा व्यसने रक्षितव्यस्तथा भवेत् ॥ ३१ ॥ जैसे राजा प्रजापर संकट आ जाय तो राशि-राशि धन लुटाकर भी उसकी रक्षा करता है, उसी तरह राजाके ऊपर संकट पड़नेपर राष्ट्रकी प्रजाको भी उसकी रक्षा करनी