भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 851

चाहिये ॥ ३१ ॥
कोशं दण्डं बलं मित्रं यदन्यदपि संचितम् ।
न कुर्वीतान्तरं राष्ट्रे राजा परिगतः क्षुधा ॥ ३२ ॥
राजा भूखसे पीड़ित होने—जीविकाके लिये कष्ट पानेपर भी खजाना, राजदण्ड, सेना, मित्र तथा अन्य संचित साधनोंको कभी राज्यसे दूर न करे ॥ ३२ ॥
बीजं भक्तेन सम्पाद्यमिति धर्मविदो विदुः ।
अत्रैतच्छम्बरस्याहुर्महामायस्य दर्शनम् ॥ ३३ ॥
धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि मनुष्यको अपने भोजनके लिये संचित अन्नमेंसे भी बीजको बचाकर रखना चाहिये। इस विषयमें महामायावी शम्बरासुरका विचार भी ऐसा ही बताया गया है ॥ ३३ ॥
धिक् तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रं यस्यावसीदति ।
अवृत्त्यान्यमनुष्योऽपि यो वैदेशिक इत्यपि ॥ ३४ ॥
जिसके राज्यकी प्रजा तथा वहाँ आये हुए परदेशी मनुष्य भी जीविकाके बिना कष्ट पा रहे हों उस राजाके जीवनको धिक्कार है ॥ ३४ ॥
राज्ञः कोशबलं मूलं कोशमूलं पुनर्बलम् ।
तन्मूलं सर्वधर्माणां धर्ममूलाः पुनः प्रजाः ॥ ३५ ॥
राजाकी जड़ है सेना और खजाना। इनमें भी खजाना ही सेनाकी जड़ है। सेना सम्पूर्ण धर्मोंकी रक्षाका मूल कारण है और धर्म ही प्रजाकी जड़ है ॥ ३५ ॥
नान्यानपीडयित्वेह कोशः शक्यः कुतो बलम् ।
तदर्थं पीडयित्वा च दोषं प्राप्तुं न सोऽर्हति ॥ ३६ ॥
दूसरोंको पीड़ा दिये बिना धनका संग्रह नहीं किया जा सकता; और धन-संग्रहके बिना सेनाका संग्रह कैसे हो सकता है? अतः आपत्तिकालमें कोश या धन-संग्रहके लिये प्रजाको पीड़ा देकर भी राजा दोषका भागी नहीं हो सकता ॥ ३६ ॥
अकार्यमपि यज्ञार्थं क्रियते यज्ञकर्मसु ।
एतस्मात् कारणाद् राजा न दोषं प्राप्तुमर्हति ॥ ३७ ॥
जैसे यज्ञकर्मोंमें यज्ञके लिये वह कार्य भी किया जाता है जो करनेयोग्य नहीं है (किंतु वह दोषयुक्त नहीं माना जाता)। उसी प्रकार आपत्तिकालमें प्रजापीड़नसे राजाको दोष नहीं लगता है ॥ ३७ ॥
अर्थार्थमन्यद् भवति विपरीतमथापरम् ।
अनर्थार्थमथाप्यन्यत् तत् सर्वं ह्यर्थकारणम् ।
एवं बुद्ध्या सम्प्रपश्येन्मेधावी कार्यनिश्चयम् ॥ ३८ ॥
आपत्तिकालमें प्रजापीड़न अर्थसंग्रहरूप प्रयोजनका साधक होनेके कारण अर्थकारक होता है, इसके विपरीत उसे पीड़ा न देना ही अनर्थकारक हो जाता है। इसी प्रकार जो दूसरे