भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 852

अनर्थकारी (व्यय बढ़ानेवाले सैन्य-संग्रह आदि) कार्य हैं, वे भी युद्धका संकट उपस्थित होनेपर अर्थकारी (विजय साधक) सिद्ध होते हैं। बुद्धिमान् पुरुष इस प्रकार बुद्धिसे विचार करके कर्तव्यका निश्चय करे ॥ ३८ ॥ यज्ञार्थमन्यद् भवति यज्ञोऽन्यार्थस्तथा परः । यज्ञस्यार्थार्थमेवान्यत् तत् सर्वं यज्ञसाधनम् ॥ ३९ ॥ जैसे अन्यान्य सामग्रियाँ यज्ञकी सिद्धिके लिये होती हैं, उत्तम यज्ञ किसी और ही प्रयोजनके लिये होता है, यज्ञ-सम्बन्धी अन्यान्य बातें भी किसी-न-किसी विशेष उद्देश्यकी सिद्धिके लिये ही होती हैं, तथा यह सब कुछ यज्ञका साधन ही है ॥ ३९ ॥ उपमामत्र वक्ष्यामि धर्मतत्त्वप्रकाशिनीम् । यूपं छिन्दन्ति यज्ञार्थं तत्र ये परिपन्थिनः ॥ ४० ॥ द्रुमाः केचन सामन्ता ध्रुवं छिन्दन्ति तानपि । ते चापि निपतन्तोऽन्यान् निघ्नन्त्येव वनस्पतीन् ॥ ४१ ॥ अब मैं यहाँ धर्मके तत्त्वको प्रकाशित करनेवाली एक उपमा बता रहा हूँ। ब्राह्मणलोग यज्ञके लिये यूप निर्माण करनेके उद्देश्यसे वृक्षका छेदन करते हैं। उस वृक्षको काटकर बाहर निकालनेमें जो-जो पार्श्ववर्ती वृक्ष बाधक होते हैं उन्हें भी निश्चय ही वे काट डालते हैं। वे वृक्ष भी गिरते समय दूसरे-दूसरे वनस्पतियोंको भी प्रायः तोड़ ही डालते हैं ॥ ४०-४१ ॥ एवं कोशस्य महतो ये नराः परिपन्थिनः । तानहत्वा न पश्यामि सिद्धिमत्र परंतप ॥ ४२ ॥ परंतप! इस प्रकार जो मनुष्य (प्रजारक्षाके लिये किये जानेवाले) महान् कोशके संग्रहमें बाधा उपस्थित करते हैं, उनका वध किये बिना इस कार्यमें मुझे सफलता होती नहीं दिखायी देती ॥ ४२ ॥ धनेन जयते लोकावुभौ परमिमं तथा । सत्यं च धर्मवचनं यथा नास्त्यधनस्तथा ॥ ४३ ॥ धनसे मनुष्य इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय पाता है तथा सत्य और धर्मका भी सम्पादन कर लेता है, परंतु निर्धनको इस कार्यमें वैसी सफलता नहीं मिलती। उसका अस्तित्व नहीं के बराबर होता है ॥ ४३ ॥ सर्वोपायैराददीत धनं यज्ञप्रयोजनम् । न तुल्यदोषः स्यादेवं कार्याकार्येषु भारत ॥ ४४ ॥ भरतनन्दन! यज्ञ करनेके उद्देश्यको लेकर सभी उपायोंसे धनका संग्रह करे; इस प्रकार करने और न करने योग्य कर्म बन जानेपर भी कर्ताको अन्य अवसरोंके समान दोष नहीं लगता ॥ ४४ ॥ नैतौ सम्भवतो राजन् कथंचिदपि पार्थिव । न ह्यरण्येषु पश्यामि धनवृद्धानहं क्वचित् ॥ ४५ ॥