भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 853, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 853

राजन्! पृथ्वीनाथ! धनका संग्रह और उसका त्याग—ये दोनों एक व्यक्तिमें एक ही साथ किसी तरह नहीं रह सकते; क्योंकि मैं वनमें रहनेवाले त्यागी महात्माओंको कहीं भी धनमें बढ़ा-चढ़ा नहीं देखता ॥ ४५ ॥
यदिदं दृश्यते वित्तं पृथिव्यामिह किंचन ।
ममेदं स्यान्ममेदं स्यादित्येवं कांक्षते जनः ॥ ४६ ॥
यहाँ इस पृथ्वीपर यह जो कुछ भी धन देखा जाता है, 'यह मेरा हो जाय, यह मेरा हो जाय', ऐसी ही अभिलाषा सभी लोगोंको रहती है ॥ ४६ ॥
न च राज्यसमो धर्मः कश्चिदस्ति परंतप ।
धर्मः संशब्दितो राज्ञामापद्धर्मतोऽन्यथा ॥ ४७ ॥
परंतप! राजाके लिये राज्यकी रक्षाके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है। अभी जिस धर्मकी चर्चा की गयी है, वह केवल राजाओंके लिये आपत्तिकालमें ही आचरणमें लाने योग्य है; अन्यथा नहीं ॥ ४७ ॥
दानेन कर्मणा चान्ये तपसान्ये तपस्विनः ।
बुद्ध्या दाक्ष्येण चैवान्ये विन्दन्ति धनसंचयान् ॥ ४८ ॥
कुछ लोग दानसे, कुछ लोग यज्ञकर्म करनेसे, कुछ तपस्वी तपस्या करनेसे, कुछ लोग बुद्धिसे और अन्य बहुत-से मनुष्य कार्यकौशलसे धनराशि प्राप्त कर लेते हैं ॥
अधनं दुर्बलं प्राहुर्धनेन बलवान् भवेत् ।
सर्वं धनवता प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् ॥ ४९ ॥
निर्धनको दुर्बल कहा जाता है। धनसे मनुष्य बलवान् होता है। धनवान्‌को सब कुछ सुलभ है। जिसके पास खजाना है, वह सारे संकटोंसे पार हो जाता है ॥
कोशेन धर्मः कामश्च परलोकस्तथा ह्ययम् ।
तं च धर्मेण लिप्सैत नाधर्मेण कदाचन ॥ ५० ॥
धन-संचयसे ही धर्म, काम, लोक तथा परलोककी सिद्धि होती है। उस धनको धर्मसे ही पानेकी इच्छा करे, अधर्मसे कभी नहीं ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥