भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 860

व्याजेन विन्दन् वित्तं हि धर्मात् स परिहीयते ॥ १८ ॥ देवता भी विपरीत कर्ममें लगे हुए अधम मनुष्यको नरकोंमें गिराते हैं; अतः जो छलसे धन प्राप्त करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १८ ॥

सर्वतः सत्कृतः सद्भिर्भूतिप्रवरकारणैः । हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं व्यवस्यति ॥ १९ ॥ ऐश्वर्यकी प्राप्तिके जो प्रधान कारण हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष जिसका सब प्रकारसे सत्कार करते हैं तथा हृदयसे भी जिसका अनुमोदन होता है, राजा उसी धर्मका अनुष्ठान करे ॥ १९ ॥

यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं ब्रूयात् स धर्मवित् । अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ॥ २० ॥ यथा मृगस्य विद्धस्य पदमेकं पदं नयेत् । लक्ष्येद् रुधिरलेपेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥ २१ ॥ जो वेदविहित, स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है। जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है। सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है। जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है ॥ २०-२१ ॥

एवं सद्भिर्विनीतेन पथा गन्तव्यमित्युत । राजर्षीणां वृत्तमेतदवगच्छ युधिष्ठिर ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम्हें भी चलना चाहिये। इसीको तुम राजर्षियोंका सदाचार समझो ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि राजर्षिवृत्तं नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें राजर्षियोंका चरित्र नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥


* यथा—गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥
अर्थात् घमंडमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करते हुए कुमार्गपर चलनेवाले गुरुको भी दण्ड देना आवश्यक है।