महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
व्याजेन विन्दन् वित्तं हि धर्मात् स परिहीयते ॥ १८ ॥ देवता भी विपरीत कर्ममें लगे हुए अधम मनुष्यको नरकोंमें गिराते हैं; अतः जो छलसे धन प्राप्त करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १८ ॥
सर्वतः सत्कृतः सद्भिर्भूतिप्रवरकारणैः । हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं व्यवस्यति ॥ १९ ॥ ऐश्वर्यकी प्राप्तिके जो प्रधान कारण हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष जिसका सब प्रकारसे सत्कार करते हैं तथा हृदयसे भी जिसका अनुमोदन होता है, राजा उसी धर्मका अनुष्ठान करे ॥ १९ ॥
यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं ब्रूयात् स धर्मवित् । अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ॥ २० ॥ यथा मृगस्य विद्धस्य पदमेकं पदं नयेत् । लक्ष्येद् रुधिरलेपेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥ २१ ॥ जो वेदविहित, स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है। जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है। सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है। जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है ॥ २०-२१ ॥
एवं सद्भिर्विनीतेन पथा गन्तव्यमित्युत । राजर्षीणां वृत्तमेतदवगच्छ युधिष्ठिर ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम्हें भी चलना चाहिये। इसीको तुम राजर्षियोंका सदाचार समझो ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि राजर्षिवृत्तं नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें राजर्षियोंका चरित्र नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥
* यथा—गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥
अर्थात् घमंडमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करते हुए कुमार्गपर चलनेवाले गुरुको भी दण्ड देना आवश्यक है।
कोशाद्धि धर्मः कौन्तेय राज्यमूलं च वर्धते ॥ १ ॥
त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन्दा
भीष्म उवाच
स्वराष्ट्रात् परराष्ट्राच्च कोशं संजनयेन्नृपः ।
कोशाद्धि धर्मः कौन्तेय राज्यमूलं च वर्धते ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! राजाको चाहिये कि वह अपने तथा शत्रुके राज्यसे धन लेकर खजानेको भरे। कोशसे ही धर्मकी वृद्धि होती है और राज्यकी जड़ें बढ़ती अर्थात् सुदृढ़ होती हैं ॥ १ ॥
तस्मात् संजनयेत् कोशं सत्कृत्य परिपालयेत् ।
परिपाल्यानुतनयादेष धर्मः सनातनः ॥ २ ॥
इसलिये राजा कोशका संग्रह करे, संग्रह करके सादर उसकी रक्षा करे और रक्षा करके निरन्तर उसको बढ़ाता रहे; यही राजाका सदासे चला आनेवाला धर्म है ॥ २ ॥
न कोशः शुद्धशौचेन न नृशंसेन जातुचित् ।
मध्यमं पदमास्थाय कोशसंग्रहणं चरेत् ॥ ३ ॥
जो विशुद्ध आचार-विचारसे रहनेवाला है, उसके द्वारा कभी कोशका संग्रह नहीं हो सकता। जो अत्यन्त क्रूर है, वह भी कदापि इसमें सफल नहीं हो सकता; अतः मध्यम मार्गका आश्रय लेकर कोश-संग्रह करना चाहिये ॥ ३ ॥
अबलस्य कुतः कोशो ह्यकोशस्य कुतो बलम् ।
अबलस्य कुतो राज्यमराज्ञः श्रीर्भवेत् कुतः ॥ ४ ॥
यदि राजा बलहीन हो तो उसके पास कोश कैसे रह सकता है? कोशहीनके पास सेना कैसे रह सकती है? जिसके पास सेना ही नहीं है, उसका राज्य कैसे टिक सकता है और राज्यहीनके पास लक्ष्मी कैसे रह सकती है? ॥ ४ ॥
उच्चैर्वृत्तेः श्रियो हानिर्यथैव मरणं तथा ।
तस्मात् कोशं बलं मित्रमथ राजा विवर्धयेत् ॥ ५ ॥
जो धनके कारण ऊँचे तथा महत्त्वपूर्ण पदपर पहुँचा हुआ है, उसके धनकी हानि हो जाय तो उसे मृत्युके तुल्य कष्ट होता है, अतः राजाको कोश, सेना तथा मित्रकी संख्या बढ़ानी चाहिये ॥ ५ ॥
हीनकोशं हि राजानमवजानन्ति मानवाः ।
न चास्याल्पेन तुष्यन्ति कार्यमप्युत्सहन्ति च ॥ ६ ॥
जिस राजाके पास धनका भण्डार नहीं है, उसकी साधारण मनुष्य भी अवहेलना करते हैं। उससे थोड़ा लेकर लोग संतुष्ट नहीं होते हैं और न उसका कार्य करनेमें ही उत्साह दिखाते हैं ।। ६ ।।
श्रियो हि कारणाद् राजा सत्क्रियां लभते पराम् ।
सास्य गूहति पापानि वासो गुह्यमिव स्त्रियाः ।। ७ ।।
लक्ष्मीके कारण ही राजा सर्वत्र बड़ा भारी आदर-सत्कार पाता है। जैसे कपड़ा नारीके गुप्त अंगोंको छिपाये रखता है, उसी प्रकार लक्ष्मी राजाके सारे दोषोंको ढक लेती है ।। ७ ।।
ऋद्धिमस्यानु तप्यन्ते पुरा विप्रकृता नराः ।
शालावृका इवाजस्रं जिघांसुमेव विन्दति ।। ८ ।।
पहलेके तिरस्कृत हुए मनुष्य इस राजाकी बढ़ती हुई समृद्धिको देखकर जलते रहते हैं और अपने वधकी इच्छा रखनेवाले उस राजाका ही कपटपूर्वक आश्रय ले उसी तरह उसकी सेवा करते हैं, जैसे कुत्ते अपने घातक चाण्डालकी सेवामें रहते हैं ।। ८ ।।
ईदृशस्य कुतो राज्ञः सुखं भवति भारत ।
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् ।। ९ ।।
अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित् ।
भारत! ऐसे नरेशको कैसे सुख मिलेगा? अतः राजाको सदा उद्यम ही करना चाहिये, किसीके सामने झुकना नहीं चाहिये; क्योंकि उद्यम ही पुरुषत्व है। जैसे सूखी लकड़ी बिना गाँठके ही टूट जाती है, परंतु झुकती नहीं है, उसी प्रकार राजा नष्ट भले ही हो जाय, परंतु उसे कभी दबना नहीं चाहिये ।। ९ १/२ ।।
अप्यरण्यं समाश्रित्य चरेन्मृगगणैः सह ।। १० ।।
न त्वेवोज्झितमर्यादैर्दस्युभिः सहितश्चरेत् ।
वह वनकी शरण लेकर मृगोंके साथ भले ही विचरे; किंतु मर्यादा भंग करनेवाले डाकुओंके साथ कदापि न रहे ।। १० १/२ ।।
दस्यूनां सुलभा सेना रौद्रकर्मसु भारत ।। ११ ।।
एकान्ततो ह्यमर्यादात् सर्वोऽप्युद्विजते जनः ।
दस्यवोऽप्यभिशङ्कन्ते निरनुक्रोशकारिणः ।। १२ ।।
भारत! डाकुओंको लूट-पाट या हिंसा आदि भयानक कर्मोंके लिये अनायास ही सेना सुलभ हो जाती है। सर्वथा मर्यादाशून्य मनुष्यसे सब लोग उद्विग्न हो उठते हैं। केवल निर्दयतापूर्ण कर्म करनेवाले पुरुषकी ओरसे डाकू भी शंकित रहते हैं ।। ११-१२ ।।
स्थापयेदेव मर्यादां जनचित्तप्रसादिनीम् ।
अल्पेऽप्यर्थे च मर्यादा लोके भवति पूजिता ।। १३ ।।
राजाको ऐसी ही मर्यादा स्थापित करनी चाहिये, जो सब लोगोंके चित्तको प्रसन्न करनेवाली हो। लोकमें छोटे-से काममें भी मर्यादाका ही मान होता है ॥ १३ ॥ नायं लोकोऽस्ति न पर इति व्यवसितो जनः । नालं गन्तुं हि विश्वासं नास्तिके भयशङ्किते ॥ १४ ॥ संसारमें ऐसे भी मनुष्य हैं, जो यह निश्चय किये बैठे हैं कि 'यह लोक और परलोक हैं ही नहीं।' ऐसा नास्तिक मानव भयकी शंकाका स्थान है, उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥ यथा सद्भिः परादानमहिंसा दस्युभिः कृता । अनुरज्यन्ति भूतानि समयदिषु दस्युषु ॥ १५ ॥ दस्युओंमें भी मर्यादा होती है, जैसे अच्छे डाकू दूसरोंका धन तो लूटते हैं, परंतु हिंसा नहीं करते (किसीकी इज्जत नहीं लेते)। जो मर्यादाका ध्यान रखते हैं, उन लुटेरोंमें बहुत-से प्राणी स्नेह भी करते हैं, (क्योंकि उनके द्वारा बहुतोंकी रक्षा भी होती है) ॥ १५ ॥ अयुद्ध्यमानस्य वधो दारामर्षः कृतघ्नता । ब्रह्मवित्तस्य चादानं निःशेषकरणं तथा ॥ १६ ॥ स्त्रिया मोषः पतिस्थानं दस्युष्वेतद् विगर्हितम् । संश्लेषं च परस्त्रीभिर्दस्युरेतानि वर्जयेत् ॥ १७ ॥ युद्ध न करनेवालेको मारना, परायी स्त्रीपर बलात्कार करना, कृतघ्नता, ब्राह्मणके धनका अपहरण, किसीका सर्वस्व छीन लेना, कुमारी कन्याका अपहरण करना तथा किसी ग्राम आदिपर आक्रमण करके स्वयं उसका स्वामी बन बैठना—ये सब बातें डाकुओंमें भी निन्दित मानी गयी हैं। इस्युको भी परस्त्रीका स्पर्श और उपर्युक्त सभी पाप त्याग देने चाहिये ॥ १६-१७ ॥ अभिसंदधते ये च विश्वासायास्य मानवाः । अशेषमेवोपलभ्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ॥ १८ ॥ जिनका सर्वस्व लूट लिया जाता है, वे मनुष्य उन डाकुओंके साथ मेल-जोल और विश्वास बढ़ानेकी चेष्टा करते हैं और उनके स्थान आदिका पता लगाकर फिर उनका सर्वस्व नष्ट कर देते हैं, यह निश्चित बात है ॥ १८ ॥ तस्मात् सशेषं कर्तव्यं स्वाधीनमपि दस्युभिः । न बलस्थोऽहमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ॥ १९ ॥ इसलिये दस्युओंको उचित है कि वे दूसरोंके धनको अपने अधिकारमें पाकर भी कुछ शेष छोड़ दें, सारा-का-सारा न लूट लें। 'मैं बलवान् हूँ' ऐसा समझकर क्रूरतापूर्ण बर्ताव न करें ॥ १९ ॥ स शेषकारिणस्तत्र शेषं पश्यन्ति सर्वशः । निःशेषकारिणो नित्यं निःशेषकरणाद् भयम् ॥ २० ॥
जो डाकू दूसरोंके धनको शेष छोड़ देते हैं, वे सब ओर अपने धनका भी अवशेष देख पाते हैं; तथा जो दूसरोंके धनमेंसे कुछ भी शेष नहीं छोड़ते, उन्हें सदा अपने धनके भी निःशेष हो जानेका भय बना रहता है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥
अत्र धर्मानुवचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्चित्त
भीष्म उवाच
अत्र धर्मानुवचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थौ क्षत्रियस्य विजानतः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! प्राचीनकालकी बातोंको जाननेवाले विद्वान् इस विषयमें जो धर्मका प्रवचन करते हैं, वह इस प्रकार है—विज्ञ क्षत्रियके लिये धर्म और अर्थ—ये दो ही प्रत्यक्ष हैं ॥ १ ॥
तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मयापना ।
अधर्मो धर्म इत्येतद् यथा वृकपदं तथा ॥ २ ॥
धर्म और अधर्मकी समस्या रखकर किसीके कर्तव्यमें व्यवधान नहीं डालना चाहिये; क्योंकि धर्मका फल प्रत्यक्ष नहीं है। जैसे भेड़ियेका पदचिह्न देखकर किसीको यह निश्चय नहीं होता कि यह व्याघ्रका पदचिह्न है या कुत्तेका? उसी प्रकार धर्म और अधर्मके विषयमें निर्णय करना कठिन है ॥ २ ॥
धर्माधर्मफले जातु ददर्शेह न कश्चन ।
बुभूषेद् बलमेवैतत् सर्वं बलवतो वशे ॥ ३ ॥
धर्म और अधर्मका फल किसीने कभी यहाँ प्रत्यक्ष नहीं देखा है। अतः राजा बलप्राप्तिके लिये प्रयत्न करे; क्योंकि यह सब जगत् बलवान्के वशमें होता है ॥ ३ ॥
श्रियो बलममात्यांश्च बलवानिह विन्दति ।
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टं यदल्पकम् ॥ ४ ॥
बलवान् पुरुष इस जगत्में सम्पत्ति, सेना और मन्त्री सब कुछ पा लेता है। जो दरिद्र है, वह पतित समझा जाता है और किसीके पास जो बहुत थोड़ा धन है, वह उच्छिष्ट या जूठन समझा जाता है ॥ ४ ॥
बह्वपथ्यं बलवति न किंचित् क्रियते भयात् ।
उभौ सत्याधिकारस्थौ त्रायेते महतो भयात् ॥ ५ ॥
बलवान् पुरुषमें बहुत-सी बुराई होती है तो भी भयके मारे उसके विषयमें कोई मुँहसे कुछ बात नहीं निकालता है। यदि बल और धर्म दोनों सत्यके ऊपर प्रतिष्ठित हों तो वे मनुष्यकी महान् भयसे रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥
अतिधर्माद् बलं मन्ये बलाद् धर्मः प्रवर्तते ।
बले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमम् ॥ ६ ॥
मैं धर्मसे भी बलको ही अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि बलसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है। जैसे चलने-फिरनेवाले सभी प्राणी पृथ्वीपर ही स्थित हैं, उसी प्रकार धर्म बलपर ही प्रतिष्ठित है ॥ ६ ॥ धूमो वायोरिव वशे बलं धर्मोऽनुवर्तते । अनीश्वरो बले धर्मो द्रुमे वल्लीव संश्रिता ॥ ७ ॥ जैसे धूआँ वायुके अधीन होकर चलता है, उसी प्रकार धर्म भी बलका अनुसरण करता है; अतः जैसे लता किसी वृक्षके सहारे फैलती है, उसी प्रकार निर्बल धर्मबलके ही आधारपर सदा स्थिर रहता है ॥ ७ ॥ वशे बलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव । नास्त्यसाध्यं बलवतां सर्वं बलवतां शुचि ॥ ८ ॥ जैसे भोग-सामग्रीसे सम्पन्न पुरुषोंके अधीन सुख-भोग होता है, उसी प्रकार धर्म बलवानोंके वशमें रहता है। बलवानोंके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। बलवानोंकी सारी वस्तु ही शुद्ध एवं निर्दोष होती है ॥ ८ ॥ दुराचारः क्षीणबलः परित्राणं न गच्छति । अथ तस्मादुद्विजते सर्वो लोको वृकादिव ॥ ९ ॥ जिसका बल नष्ट हो गया है, जो दुराचारी है, उसको भय उपस्थित होनेपर कोई रक्षक नहीं मिलता है। दुर्बलसे सब लोग उसी प्रकार उद्विग्न हो उठते हैं, जैसे भेड़ियेसे ॥ ९ ॥ अपध्वस्तो ह्यवमतो दुःखं जीवति जीवितम् । जीवितं यदपकृष्टं यथैव मरणं तथा ॥ १० ॥ दुर्बल अपनी सम्पत्तिसे वंचित हो जाता है, सबके अपमान और उपेक्षाका पात्र बनता है तथा दुःखमय जीवन व्यतीत करता है। जो जीवन निन्दित हो जाता है, वह मृत्युके ही तुल्य है ॥ १० ॥ यदेवमाहुः पापेन चारित्रेण विवर्जितः । सुभृशं तप्यते तेन वाक्शल्येन परिक्षतः ॥ ११ ॥ दुर्बल मनुष्यके विषयमें लोग इस प्रकार कहने लगते हैं—'अरे! यह तो अपने पापाचारके कारण बन्धु-बान्धवोंद्वारा त्याग दिया गया है।' उनके उस वाग्बाणसे घायल होकर वह अत्यन्त संतप्त हो उठता है ॥ ११ ॥ अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे । त्रयीं विद्यामवेक्षेत तथोपासीत वै द्विजान् ॥ १२ ॥ प्रसादयेन्मधुरया वाचा चाप्यथ कर्मणा । महामनाश्चापि भवेद् विवहेच्च महाकुले ॥ १३ ॥ इत्यस्मीति वदेदेवं परेषां कीर्तयेद् गुणान् । जपेदुदकशीलः स्यात् पेशलो नातिजल्पकः ॥ १४ ॥
ब्रह्मक्षत्रं सम्प्रविशेद् बहु कृत्वा सुदुष्करम् । उच्यमानो हि लोकेन बहुकृत् तदचिन्तयन् ॥ १५ ॥
यहाँ अधर्मपूर्वक धनका उपार्जन करनेपर जो पाप होता है, उससे छूटनेके लिये आचार्योंने यह उपाय बताया है—उक्त पापसे लिप्त हुआ राजा तीनों वेदोंका स्वाध्याय करे, ब्राह्मणोंकी सेवामें उपस्थित रहे, मधुर वाणी तथा सत्कर्मोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करे, अपने मनको उदार बनावे और उच्चकुलमें विवाह करे। मैं अमुक नामवाला आपका सेवक हूँ, इस प्रकार अपना परिचय दे, दूसरोंके गुणोंका बखान करे, प्रतिदिन स्नान करके इष्ट-मन्त्रका जप करे, अच्छे स्वभावका बने अधिक न बोले, लोग उसे बहुत पापाचारी बताकर उसकी निन्दा करें तो भी उसकी परवा न करे और अत्यन्त दुष्कर तथा बहुत-से पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंके समाजमें प्रवेश करे ॥ १२—१५ ॥
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं बहुमतो भवेत् । सुखं च चित्रं भुञ्जीत कृतेनैकेन गोपयेत् ॥ १६ ॥ लोके च लभते पूजां परत्रेह महत् फलम् ॥ १७ ॥
ऐसे आचरणवाला पुरुष पापहीन हो शीघ्र ही बहुसंख्यक मनुष्योंके आदरका पात्र हो जाता है, नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है और अपने किये हुए विशेष सत्कर्मके प्रभावसे अपनी रक्षा कर लेता है। लोकमें सर्वत्र उसका आदर होने लगता है तथा वह इहलोक और परलोकमें भी महान् फलका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥
मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा दस्युः समर्यादः प्रेत्यभावे न नश्यति ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जो दस्यु (डाकू) मर्यादाका पालन करता है, वह मरनेके बाद दुर्गतिमें नहीं पड़ता। इस विषयमें विद्वान् पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥
प्रहर्ता मतिमान् शूरः श्रुतवाननृशंसवान् ।
रक्षन्नाश्रमिणां धर्मं ब्रह्मण्यो गुरुपूजकः ॥ २ ॥
निषाद्यां क्षत्रियाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः ।
कायव्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात् सिद्धिमाप्तवान् ॥ ३ ॥
कायव्यनामसे प्रसिद्ध एक निषादपुत्रने दस्यु होनेपर भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी। वह प्रहारकुशल, शूरवीर, बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ, क्रूरतारहित, आश्रमवासियोंके धर्मकी रक्षा करनेवाला, ब्राह्मणभक्त और गुरुपूजक था। वह क्षत्रिय पितासे एक निषादजातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था; अतः क्षत्रियधर्मका निरन्तर पालन करता था ॥ २-३ ॥
अरण्ये सायं पूर्वाह्ने मृगयूथप्रकोपिता ।
विधिज्ञो मृगजातीनां नैषादानां च कोविदः ॥ ४ ॥
कायव्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालके समय वनमें जाकर मृगोंकी टोलियोंको उत्तेजित कर देता था। वह मृगोंकी विभिन्न जातियोंके स्वभावसे परिचित तथा उन्हें काबूमें करनेकी कलाको जाननेवाला था। निषादोंमें वह सबसे निपुण था ॥ ४ ॥
सर्वकाननदेशज्ञः पारियात्रचरः सदा ।
धर्मज्ञः सर्वभूतानाममोघेषुर्दृढायुधः ॥ ५ ॥
उसे वनके सम्पूर्ण प्रदेशोंका ज्ञान था। वह सदा पारियात्र पर्वतपर विचरनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके धर्मोंका ज्ञाता था। उसका बाण लक्ष्य बेधनेमें अचूक था। उसके सारे अस्त्र-शस्त्र सुदृढ़ थे ॥ ५ ॥
अप्यनेकशतं सेनामेक एव जिगाय सः ।
स वृद्धावन्धबधिरौ महारण्येऽभ्यपूजयत् ॥ ६ ॥
वह सैकड़ों मनुष्योंकी सेनाको अकेले ही जीत लेता था और उस महान् वनमें रहकर अपने अन्धे और बहरे माता-पिताकी सेवा-पूजा किया करता था ॥ ६ ॥
मधुमांसैर्मूलफलैरन्नैरुच्चावचैरपि ।
सत्कृत्य भोजयामास मान्यान् परिचचार च ॥ ७ ॥
वह निषाद मधु, मांस, फल, मूल तथा नाना प्रकारके अन्नोंद्वारा माता-पिताको सत्कारपूर्वक भोजन कराता था तथा दूसरे-दूसरे माननीय पुरुषोंकी भी सेवा-पूजा किया करता था ॥ ७ ॥
आरण्यकान् प्रव्रजितान् ब्राह्मणान् परिपूजयन् ।
अपि तेभ्यो गृहान् गत्वा निनाय सततं वने ॥ ८ ॥
वह वनमें रहनेवाले वानप्रस्थ और संन्यासी ब्राह्मणोंकी पूजा करता और प्रतिदिन उनके घरमें जाकर उनके लिये अन्न आदि वस्तुएँ पहुँचा देता था ॥ ८ ॥
येऽस्मान्न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कया ।
तेषामासज्य गेहेषु कल्प एव स गच्छति ॥ ९ ॥
जो लोग लुटेरेके घरका भोजन होनेकी आशंकासे उसके हाथसे अन्न नहीं ग्रहण करते थे, उनके घरोंमें वह बड़े सबेरे ही अन्न और फल-मूल आदि भोजन-सामग्री रख जाता था ॥ ९ ॥
बहूनि च सहस्राणि ग्रामणित्वेऽभिवव्रिरे ।
निर्मर्यादानि दस्यूनां निरनुक्रोशवर्तिनाम् ॥ १० ॥
एक दिन मर्यादाका अतिक्रमण और भाँति-भाँतिके क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले कई हजार डाकुओंने उससे अपना सरदार बननेके लिये प्रार्थना की ॥ १० ॥
दस्यव ऊचुः
मुहूर्तदेशकालज्ञः प्राज्ञः शूरो दृढव्रतः ।
ग्रामणीर्भव नो मुख्यः सर्वेषामेव सम्मतः ॥ ११ ॥
**डाकू बोले—**तुम देश, काल और मुहूर्तके ज्ञाता, विद्वान्, शूरवीर और दृढप्रतिज्ञ हो; इसलिये हम सब लोगोंकी सम्मतिसे तुम हमारे सरदार हो जाओ ॥ ११ ॥
यथा यथा वक्ष्यसि नः करिष्यामस्तथा तथा ।
पालयास्मान् यथान्यायं यथा माता यथा पिता ॥ १२ ॥
तुम हमें जैसी-जैसी आज्ञा दोगे, वैसा-ही-वैसा हम करेंगे। तुम माता-पिताके समान हमारी यथोचित रीतिसे रक्षा करो ॥ १२ ॥
कायव्य उवाच
मा वधीस्त्वं स्त्रियं भीरुं मा शिशुं मा तपस्विनम् ।
नायुद्धयमानो हन्तव्यो न च ग्राह्या बलात् स्त्रियः ॥ १३ ॥
कायव्यने कहा—प्रिय बन्धुओ! तुम कभी स्त्री, डरपोक, बालक और तपस्वीकी हत्या न करना। जो तुमसे युद्ध न कर रहा हो, उसका भी वध न करना। स्त्रियोंको कभी बलपूर्वक न पकड़ना ॥ १३ ॥ सर्वथा स्त्री न हन्तव्या सर्वसत्त्वेषु केनचित् । नित्यं तु ब्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ॥ १४ ॥ तुममेंसे कोई भी सभी प्राणियोंके स्त्रीवर्गकी किसी तरह भी हत्या न करे। ब्राह्मणोंके हितका सदा ध्यान रखना। आवश्यकता हो तो उनकी रक्षाके लिये युद्ध भी करना ॥ १४ ॥ शस्यं च नापि हर्तव्यं सारविघ्नं च मा कृथाः । पूज्यन्ते यत्र देवाश्च पितरोऽतिथयस्तथा ॥ १५ ॥ खेतकी फसल न उखाड़ लाना, विवाह आदि उत्सवोंमें विघ्न न डालना, जहाँ देवता, पितर और अतिथियोंकी पूजा होती हो, वहाँ कोई उपद्रव न खड़ा करना ॥ १५ ॥ सर्वभूतेष्वपि च वै ब्राह्मणो मोक्षमर्हति । कार्याचोपचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि या भवेत् ॥ १६ ॥ समस्त प्राणियोंमें ब्राह्मण विशेषरूपसे डाकुओंके हाथसे छुटकारा पानेका अधिकारी है। अपना सर्वस्व लगाकर भी तुम्हें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रयन्ति पराभवम् । न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥ १७ ॥ देखो, ब्राह्मणलोग कुपित होकर जिसके पराभवका चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकोंमें कोई रक्षक नहीं होता ॥ १७ ॥ यो ब्राह्मणान् परिवदेद् विनाशं चापि रोचयेत् । सूर्योदय इव ध्वान्ते ध्रुवं तस्य पराभवः ॥ १८ ॥ जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार अवश्य ही पतन हो जाता है ॥ इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षेत सर्वशः । ये ये नो न प्रदास्यन्ति तांस्तांस्तेनाभियास्यसि ॥ १९ ॥ तुम लोग यहीं बैठे-बैठे लुटेरेपनका जो फल है, उसे पानेकी अभिलाषा रखो। जो-जो व्यापारी हमें स्वेच्छासे धन नहीं देंगे, उन्हीं-उन्हींपर तुम दल बाँधकर आक्रमण करोगे ॥ १९ ॥ शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वृद्ध्यर्थं विनिश्चयः । ये च शिष्टान् प्रबाधन्ते दण्डस्तेषां वधः स्मृतः ॥ २० ॥ दण्डका विधान दुष्टोंके दमनके लिये है, अपना धन बढ़ानेके लिये नहीं। जो शिष्ट पुरुषोंको सताते हैं, उनका वध ही उनके लिये दण्ड माना गया है ॥ २० ॥ ये च राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन ।
तदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा ॥ २१ ॥
जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिका लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः ।
अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २२ ॥
जो दस्युजातिमें उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्रके अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होनेपर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं (ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ) ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
ते सर्वमेवानुचक्रुः कायव्यस्यानुशासनम् ।
वृद्धिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ॥ २३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! यह सुनकर उन दस्युओंने कायव्यकी सारी आज्ञा मान ली और सदा उसका अनुसरण किया। इससे उन सभीकी उन्नति हुई और वे पाप-कर्मोंसे हट गये ॥ २३ ॥
कायव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् ।
साधूनामाचरन् क्षेमं दस्यून् पापान्निवर्तयम् ॥ २४ ॥
कायव्यने उस पुण्यकर्मसे बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषोंका कल्याण करते हुए डाकुओंको पापसे बचा लिया था ॥ २४ ॥
इदं कायव्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत् ।
नारण्येभ्यो हि भूतेभ्यो भयं प्राप्नोति किंचन ॥ २५ ॥
जो प्रतिदिन कायव्यके इस चरित्रका चिन्तन करता है, उसे वनवासी प्राणियोंसे किंचिन्मात्र भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २५ ॥
न भयं तस्य भूतेभ्यः सर्वेभ्यश्चैव भारत ।
नासतो विद्यते राजन् स ह्यारण्येषु गोपतिः ॥ २६ ॥
भारत! उसे सम्पूर्ण भूतोंसे भी भय नहीं होता। राजन्! किसी दुष्टात्मासे भी उसको डर नहीं लगता। वह तो वनका अधिपति हो जाता है ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कायव्यचरिते
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कायव्यका चरित्रविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥
अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार
भीष्म उवाच
अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
येन मार्गेण राजा वै कोशं संजनयत्युत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जिस मार्ग या उपायसे राजा अपना खजाना भरता है, उसके विषयमें प्राचीन इतिहासके जानकारलोग ब्रह्माजीकी कही हुई कुछ गाथाएँ कहा करते हैं ॥ १ ॥
न धनं यज्ञशीलानां हार्यं देवस्वमेव च ।
दस्यूनां निष्क्रियाणां च क्षत्रियो हर्तुमर्हति ॥ २ ॥
राजाको यज्ञानुष्ठान करनेवाले द्विजोंका धन नहीं लेना चाहिये। इसी प्रकार उसे देवसम्पत्तिमें भी हाथ नहीं लगाना चाहिये। वह लुटेरों तथा अकर्मण्य मनुष्योंके धनका अपहरण कर सकता है ॥ २ ॥
इमाः प्रजाः क्षत्रियाणां राज्यभोगाश्च भारत ।
धनं हि क्षत्रियस्यैव द्वितीयस्य न विद्यते ॥ ३ ॥
तदस्य स्याद् बलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव च ।
भरतनन्दन! ये समस्त प्रजाएँ क्षत्रियोंकी हैं। राज्यभोग भी क्षत्रियोंके ही हैं और सारा धन भी उन्हींका है, दूसरेका नहीं है; किंतु वह धन उसकी सेनाके लिये है या यज्ञानुष्ठानके लिये ॥ ३ ½ ॥
अभोग्याश्चौषधीश्छित्त्वा भोग्या एव पचन्त्युत ॥ ४ ॥
यो वै न देवान् न पितॄन् न मर्त्यान् हविषार्चति ।
अनर्थकं धनं तत्र प्राहुर्धर्मविदो जनाः ॥ ५ ॥
हरेत् तद् द्रविणं राजन् धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
ततः प्रीणयते लोकं न कोशं तद्धिधं नृपः ॥ ६ ॥
राजन्! जो खानेयोग्य नहीं हैं, उन ओषधियों या वृक्षोंको काटकर मनुष्य उनके द्वारा खानेयोग्य ओषधियोंको पकाते हैं। इसी प्रकार जो देवताओं, पितरों और मनुष्योंका हविष्यके द्वारा पूजन नहीं करता है, उसके धनको धर्मज्ञ पुरुषोंने व्यर्थ बताया है। अतः धर्मात्मा राजा ऐसे धनको छीन ले और उसके द्वारा प्रजाका पालन करे, किंतु वैसे धनसे राजा अपना कोश न भरे ॥ ४—६ ॥
असाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यो यः प्रयच्छति ।
आत्मानं संक्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव सः ॥ ७ ॥
जो राजा दुष्टोंसे धन छीनकर उसे श्रेष्ठ पुरुषोंमें बाँट देता है, वह अपने-आपको सेतु बनाकर उन सबको पार कर देता है। उसे सम्पूर्ण धर्मोंका ज्ञाता ही मानना चाहिये ॥ ७ ॥
तथा तथा जयेल्लोकान् शक्त्या चैव यथा यथा ।
उद्भिञ्जा जन्तवो यद्वच्छुक्लजीवा यथा यथा ॥ ८ ॥
अनिमित्तात् सम्भवन्ति तथायज्ञः प्रजायते ॥ ९ ॥
यथैव दंशमशकं यथा चाण्डपिपीलिकम् ।
सैव वृत्तिरयज्ञेषु यथा धर्मो विधीयते ॥ १० ॥
धर्मज्ञ राजा अपनी शक्तिके अनुसार उसी-उसी तरह लोकोंपर विजय प्राप्त करे, जैसे उद्भिज्ज जन्तु (वृक्ष आदि) अपनी शक्तिके अनुसार आगे बढ़ते हैं तथा जैसे वज्रकीट आदि क्षुद्र जीव बिना ही निमित्तके उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही बिना ही कारणके यज्ञहीन कर्तव्यविरोधी मनुष्य भी राज्यमें उत्पन्न हो जाते हैं। अतः राजाको चाहिये कि मच्छर, डाँस और चींटी आदि कीटोंके साथ जैसा बर्ताव किया जाता है, वही बर्ताव उन सत्कर्मविरोधियोंके साथ करे, जिससे धर्मका प्रचार हो ॥ ८—१० ॥
यथा ह्यकस्माद् भवति भूमौ पांसुर्विलोलितः ।
तथैवेह भवेद् धर्मः सूक्ष्मः सूक्ष्मतरस्तथा ॥ ११ ॥
जिस प्रकार अकस्मात् पृथ्वीकी धूलको लेकर सिलपर पीसा जाय तो वह और भी महीन ही होती है, उसी प्रकार विचार करनेसे धर्मका स्वरूप उत्तरोत्तर सूक्ष्म जान पड़ता है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥
१३७-
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
आनेवाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री—इन तीन मत्स्योंका दृष्टान्त
भीष्म उवाच
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, उसे अनागतविधाता कहते हैं तथा जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका उपाय सूझ जाता है, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति’ कहलाता है। ये दो ही प्रकारके लोग सुखसे अपनी उन्नति करते हैं; परंतु जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला होता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य नष्ट हो जाता है॥ १॥
अत्रैव चेदमव्यग्रं शृणुष्वाख्यानमुत्तमम्।
दीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये॥ २॥
कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय करनेमें जो दीर्घसूत्री होता है, उसको लेकर मैं एक सुन्दर उपाख्यान सुना रहा हूँ। तुम स्वस्थचित्त होकर सुनो॥ २॥
नातिगाधे जलाधारे सुहृदः कुशलास्त्रयः।
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय बभूवुः सहचारिणः॥ ३॥
कुन्तीनन्दन! कहते हैं, एक तालाबमें जो अधिक गहरा नहीं था, बहुत-सी मछलियाँ रहती थीं, उसी जलाशयमें तीन कार्यकुशल मत्स्य भी रहते थे, जो सदा साथ-साथ विचरनेवाले और एक-दूसरेके सुहृद् थे॥ ३॥
तत्रैको दीर्घकालज्ञ उत्पन्नप्रतिभोऽपरः।
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रयाणां सहचारिणाम्॥ ४॥
वहाँ उन तीनों सहचारियोंमेंसे एक तो (अनागतविधाता था, जो) आनेवाले दीर्घकालतककी बात सोच लेता था। दूसरा प्रत्युत्पन्नमति था, जिसकी प्रतिभा ठीक समयपर ही काम दे देती थी और तीसरा दीर्घसूत्री था (जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करता था)॥ ४॥
कदाचित् तं जलस्थायं मत्स्यबन्धाः समन्ततः।
निस्रावयामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः॥ ५॥
एक दिन कुछ मछलीमारोंने उस जलाशयमें चारों ओरसे नालियाँ बनाकर अनेक द्वारोंसे उसका पानी आसपासकी नीची भूमिमें निकालना आरम्भ कर दिया॥ ५॥
प्रक्षीयमाणं तं दृष्ट्वा जलस्थायं भयागमे ।
अब्रवीद् दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहृदौ तदा ॥ ६ ॥
जलाशयका पानी घटता देख भय आनेकी सम्भावना समझकर दूरतककी बातें सोचनेवाले उस मत्स्यने अपने उन दोनों सुहृदोंसे कहा— ॥ ६ ॥
इयमापत् समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम् ।
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न दुष्यति ॥ ७ ॥
‘बन्धुओ! जान पड़ता है कि इस जलाशयमें रहनेवाले सभी मत्स्योंपर संकट आ पहुँचा है; इसलिये जबतक हमारे निकलनेका मार्ग दूषित न हो जाय, तबतक शीघ्र ही हमें यहाँसे अन्यत्र चले जाना चाहिये ॥ ७ ॥
अनागतमनर्थं हि सुनयैर्यैः प्रबाधयेत् ।
स न संशयमाप्नोति रोचतां भो व्रजामहे ॥ ८ ॥
‘जो आनेवाले संकटको उसके आनेसे पहले ही अपनी अच्छी नीतिद्वारा मिटा देता है, वह कभी प्राण जानेके संशयमें नहीं पड़ता। यदि आपलोगोंको मेरी बात ठीक जान पड़े तो चलिये, दूसरे जलाशयको चलें’ ॥ ८ ॥
दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽब्रवीत् सम्यगुच्यते ।
न तु कार्या त्वरा तावदिति मे निश्चिता मतिः ॥ ९ ॥
इसपर वहाँ जो दीर्घसूत्री था, उसने कहा—‘मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो; परंतु मेरा यह दृढ़ विचार है कि अभी हमें जल्दी नहीं करनी चाहिये’ ॥ ९ ॥
अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञः प्राब्रवीद् दीर्घदर्शिनम् ।
प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायातः परिहास्यते ॥ १० ॥
तदनन्तर प्रत्युत्पन्नमतिने दूरदर्शीसे कहा—‘मित्र! जब समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्यायतः कोई युक्ति ढूँढ़ निकालनेमें कभी नहीं चूकती है’ ॥ १० ॥
एवं श्रुत्वा निराक्रम्य दीर्घदर्शी महामतिः ।
जगाम स्रोतसा तेन गम्भीरं सलिलाशयम् ॥ ११ ॥
यह सुनकर परम बुद्धिमान् दीर्घदर्शी (अनागत-विधाता) वहाँसे निकलकर एक नालीके रास्तेसे दूसरे गहरे जलाशयमें चला गया ॥ ११ ॥
ततः प्रसृततोयं तं प्रसमीक्ष्य जलाशयम् ।
बबन्धुर्विविधैर्योगैर्मत्स्यान् मत्स्योपजीविनः ॥ १२ ॥
तदनन्तर मछलियोंसे ही जीविका चलानेवाले मछलीमारोंने जब यह देखा कि जलाशयका जल प्रायः बाहर निकल चुका है, तब उन्होंने अनेक उपायोंद्वारा वहाँकी सब मछलियोंको फँसा लिया ॥ १२ ॥
विलोद्यमाने तस्मिंस्तु स्रुततोये जलाशये ।
अगच्छद् बन्धनं तत्र दीर्घसूत्रः सहापरैः ॥ १३ ॥
जिसका पानी बाहर निकल चुका था, वह जलाशय जब मथा जाने लगा, तब दीर्घसूत्री भी दूसरे मत्स्योंके साथ जालमें फँस गया ।। १३ ।। उद्याने क्रियमाणे तु मत्स्यानां तत्र रज्जुभिः । प्रविश्यान्तरमेतेषां स्थितः सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १४ ॥ जब मछलीमार रस्सी खींचकर मछलियोंसे भरे हुए उस जालको उठाने लगे, तब प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य भी उन्हीं मत्स्योंके भीतर घुसकर जालमें बँध-सा गया ।। १४ ।। गृह्यमेव तदुद्यानं गृहीत्वा तं तथैव सः । सर्वानैव च तांस्तत्र ते विदुर्ग्रथितानिति ॥ १५ ॥ वह जाल मुखसे पकड़ने योग्य था; अतः उसकी ताँतको मुँहमें लेकर वह भी अन्य मछलियोंकी तरह बँधा हुआ प्रतीत होने लगा। मछलीमारोंने उन सब मछलियोंको वहाँ बँधा हुआ ही समझा ।। १५ ।। ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विपुले जले । मुक्त्वा रज्जुं प्रमुक्तोऽसौ शीघ्रं सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १६ ॥ तदनन्तर उस जालको लेकर वे मछलीमार जब दूसरे अगाध जलवाले जलाशयके समीप गये और उन मछलियोंको धोने लगे, उसी समय प्रत्युत्पन्नमति मुखमें ली हुई जालकी रस्सीको छोड़कर उसके बन्धनसे मुक्त हो गया और जलमें समा गया ।। १६ ।। दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनबुद्धिरचेतनः । मरणं प्राप्तवान् मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः ॥ १७ ॥ परंतु बुद्धिहीन और आलसी मूर्ख दीर्घसूत्री अचेत होकर मृत्युको प्राप्त हुआ, जैसे कोई इन्द्रियोंके नष्ट होनेसे नष्ट हो जाता है ।। १७ ।। एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नावबुद्ध्यते । स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ॥ १८ ॥ इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिरपर आये हुए कालको नहीं समझ पाता, वह उस दीर्घसूत्री मत्स्यके समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।। १८ ।। आदौ न कुरुते श्रेयः कुशलोऽस्मीति यः पुमान् । स संशयमवाप्नोति यथा सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १९ ॥ जो पुरुष यह समझकर कि मैं बड़ा कार्यकुशल हूँ, पहलेसे ही अपने कल्याणका उपाय नहीं करता, वह प्रत्युत्पन्नमति मत्स्यके समान प्राणसंशयकी स्थितिमें पड़ जाता है ।। १९ ।। अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः । द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्रो विनश्यति ॥ २० ॥ जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, वह 'अनागतविधाता' और जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका कोई उपाय सूझ जाता है, वह 'प्रत्युत्पन्नमति'—
ये दो ही सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं; परंतु प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला ‘दीर्घसूत्री’ नष्ट हो जाता है ॥ २० ॥
काष्ठाः कला मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः ।
मासाः पक्षाः षड् ऋतवः कल्पः संवत्सरास्तथा ॥ २१ ॥
पृथिवी देश इत्युक्तः कालः स च न दृश्यते ।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं ध्यायते यच्च तत्तथा ॥ २२ ॥
काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर और कल्प—इन्हें ‘काल’ कहते हैं तथा पृथ्वीको ‘देश’ कहा जाता है। इनमेंसे देशका तो दर्शन होता है, किंतु काल दिखायी नहीं देता है। अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये जिस देश और कालको उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥
एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः ।
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामे चाभिमतौ नृणाम् ॥ २३ ॥
ऋषियोंने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्रमें इन देश और कालको ही कार्य-सिद्धिका प्रधान उपाय बताया है। मनुष्योंकी कामना-सिद्धिमें भी ये देश और काल ही प्रधान माने गये हैं ॥ २३ ॥
परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् ।
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ॥ २४ ॥
जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करनेवाला तथा सतत सावधान रहनेवाला है, वह अभीष्ट देश और कालका ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोगसे इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि शाकुलोपाख्याने
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें शाकुलोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥
१३८-
अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान
युधिष्ठिर उवाच
सर्वत्र बुद्धिः कथिता श्रेष्ठा ते भरतर्षभ।
अनागता तथोत्पन्ना दीर्घसूत्रा विनाशिनी ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भरतश्रेष्ठ! आपने सर्वत्र अनागत (संकट आनेसे पहले ही आत्मरक्षाकी व्यवस्था करनेवाली) तथा प्रत्युत्पन्न (समयपर बचावका उपाय सोच लेनेवाली) बुद्धिको ही श्रेष्ठ बताया है और प्रत्येक कार्यमें आलस्यके कारण विलम्ब करनेवाली बुद्धिको विनाशकारी बताया है ॥ १ ॥
तदिच्छामि परां श्रोतुं बुद्धिं ते भरतर्षभ।
यथा राजा न मुह्येत शत्रुभिः परिवारितः ॥ २ ॥
धर्मार्थकुशलो राजा धर्मशास्त्रविशारदः।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
भरतभूषण! अतः अब मैं उस श्रेष्ठ बुद्धिके विषयमें आपसे सुनना चाहता हूँ, जिसका आश्रय लेनेसे धर्म और अर्थमें कुशल तथा धर्मशास्त्रविशारद राजा शत्रुओं-द्वारा घिरा रहनेपर भी मोहमें नहीं पड़ता। कुरुश्रेष्ठ! उसी बुद्धिके विषयमें मैं आपसे प्रश्न करता हूँ; अतः आप मेरे लिये उसकी व्याख्या करें ॥ २-३ ॥
शत्रुभिर्बहुभिर्ग्रस्तो यथा वर्तेत पार्थिवः।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वमेव यथाविधि ॥ ४ ॥
बहुत-से शत्रुओंका आक्रमण हो जानेपर राजाको कैसा बर्ताव करना चाहिये? यह सब कुछ मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
विषमस्थं हि राजानं शत्रवः परिपन्थिनः।
बहवोऽप्येकमुद्धर्तुं यतन्ते पूर्वतापिताः ॥ ५ ॥
पहलेके सताये हुए डाकू आदि शत्रु जब राजाको संकटमें पड़ा हुआ देखते हैं, तब वे बहुत-से मिलकर उस असहाय राजाको उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करते हैं ॥ ५ ॥
सर्वत्र प्रार्थ्यमानेन दुर्बलेन महाबलैः।
एकेनैवासहायेन शक्यं स्थातुं भवेत् कथम् ॥ ६ ॥
जब अनेक महाबली शत्रु किसी दुर्बल राजाको सब ओरसे हड़प जानेके लिये तैयार हो जायँ, तब उस एकमात्र असहाय नरेशके द्वारा उस परिस्थितिका कैसे सामना किया जा
सकता है? ॥ ६ ॥ कथं मित्रमरिं चापि विन्दते भरतर्षभ । चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ॥ ७ ॥ राजा किस प्रकार मित्र और शत्रुको अपने वशमें करता है तथा उसे शत्रु और मित्रके बीचमें रहकर कैसी चेष्टा करनी चाहिये? ॥ ७ ॥ प्रज्ञातलक्षणे मित्रे तथैवामित्रतां गते । कथं तु पुरुषः कुर्यात् कृत्वा किं वा सुखी भवेत् ॥ ८ ॥ पहले लक्षणोंद्वारा जिसे मित्र समझा गया है, वही मनुष्य यदि शत्रु हो जाय, तब उसके साथ कोई पुरुष कैसा बर्ताव करे? अथवा क्या करके वह सुखी हो? ॥ ८ ॥ विग्रहं केन वा कुर्यात् संधिं वा केन योजयेत् । कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेत बलवानपि ॥ ९ ॥ किसके साथ विग्रह करे? अथवा किसके साथ संधि जोड़े और बलवान् पुरुष भी यदि शत्रुओंके बीचमें मिल जाय तो उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ ९ ॥ एतद् वै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं परंतप । नैतस्य कश्चिद् वक्तास्ति श्रोता वापि सुदुर्लभः ॥ १० ॥ ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् सत्यसंधाज्जितेन्द्रियात् । तदन्विष्य महाभाग सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ११ ॥ परंतप पितामह! यह कार्य समस्त कार्योंमें श्रेष्ठ है। सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा, दूसरा कोई इस विषयको बतानेवाला नहीं है। इसको सुननेवाला भी दुर्लभ ही है। अतः महाभाग! आप उसका अनुसंधान करके यह सारा विषय मुझसे कहिये ॥ १०-११ ॥
भीष्म उवाच त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो युधिष्ठिर सुखोदयः । शृणु मे पुत्र कार्त्स्न्येन गुह्यमापत्सु भारत ॥ १२ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन बेटा युधिष्ठिर! तुम्हारा यह विस्तारपूर्वक पूछना बहुत ठीक है। यह सुखकी प्राप्ति करानेवाला है। आपत्तिके समय क्या करना चाहिये? यह विषय गोपनीय होनेसे सबको मालूम नहीं है। तुम यह सब रहस्य मुझसे सुनो ॥ १२ ॥ अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति । सामर्थ्ययोगात् कार्याणामनित्या वै सदा गतिः ॥ १३ ॥ भिन्न-भिन्न कार्योंका ऐसा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण कभी शत्रु भी मित्र बन जाता है और कभी मित्रका मन भी द्वेषभावसे दूषित हो जाता है। वास्तवमें शत्रु-मित्रकी परिस्थिति सदा एक-सी नहीं रहती है ॥ १३ ॥