भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 876

जिसका पानी बाहर निकल चुका था, वह जलाशय जब मथा जाने लगा, तब दीर्घसूत्री भी दूसरे मत्स्योंके साथ जालमें फँस गया ।। १३ ।। उद्याने क्रियमाणे तु मत्स्यानां तत्र रज्जुभिः । प्रविश्यान्तरमेतेषां स्थितः सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १४ ॥ जब मछलीमार रस्सी खींचकर मछलियोंसे भरे हुए उस जालको उठाने लगे, तब प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य भी उन्हीं मत्स्योंके भीतर घुसकर जालमें बँध-सा गया ।। १४ ।। गृह्यमेव तदुद्यानं गृहीत्वा तं तथैव सः । सर्वानैव च तांस्तत्र ते विदुर्ग्रथितानिति ॥ १५ ॥ वह जाल मुखसे पकड़ने योग्य था; अतः उसकी ताँतको मुँहमें लेकर वह भी अन्य मछलियोंकी तरह बँधा हुआ प्रतीत होने लगा। मछलीमारोंने उन सब मछलियोंको वहाँ बँधा हुआ ही समझा ।। १५ ।। ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विपुले जले । मुक्त्वा रज्जुं प्रमुक्तोऽसौ शीघ्रं सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १६ ॥ तदनन्तर उस जालको लेकर वे मछलीमार जब दूसरे अगाध जलवाले जलाशयके समीप गये और उन मछलियोंको धोने लगे, उसी समय प्रत्युत्पन्नमति मुखमें ली हुई जालकी रस्सीको छोड़कर उसके बन्धनसे मुक्त हो गया और जलमें समा गया ।। १६ ।। दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनबुद्धिरचेतनः । मरणं प्राप्तवान् मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः ॥ १७ ॥ परंतु बुद्धिहीन और आलसी मूर्ख दीर्घसूत्री अचेत होकर मृत्युको प्राप्त हुआ, जैसे कोई इन्द्रियोंके नष्ट होनेसे नष्ट हो जाता है ।। १७ ।। एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नावबुद्ध्यते । स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ॥ १८ ॥ इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिरपर आये हुए कालको नहीं समझ पाता, वह उस दीर्घसूत्री मत्स्यके समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।। १८ ।। आदौ न कुरुते श्रेयः कुशलोऽस्मीति यः पुमान् । स संशयमवाप्नोति यथा सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १९ ॥ जो पुरुष यह समझकर कि मैं बड़ा कार्यकुशल हूँ, पहलेसे ही अपने कल्याणका उपाय नहीं करता, वह प्रत्युत्पन्नमति मत्स्यके समान प्राणसंशयकी स्थितिमें पड़ जाता है ।। १९ ।। अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः । द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्रो विनश्यति ॥ २० ॥ जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, वह 'अनागतविधाता' और जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका कोई उपाय सूझ जाता है, वह 'प्रत्युत्पन्नमति'—