महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 877, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंये दो ही सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं; परंतु प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला ‘दीर्घसूत्री’ नष्ट हो जाता है ॥ २० ॥
काष्ठाः कला मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः ।
मासाः पक्षाः षड् ऋतवः कल्पः संवत्सरास्तथा ॥ २१ ॥
पृथिवी देश इत्युक्तः कालः स च न दृश्यते ।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं ध्यायते यच्च तत्तथा ॥ २२ ॥
काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर और कल्प—इन्हें ‘काल’ कहते हैं तथा पृथ्वीको ‘देश’ कहा जाता है। इनमेंसे देशका तो दर्शन होता है, किंतु काल दिखायी नहीं देता है। अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये जिस देश और कालको उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥
एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः ।
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामे चाभिमतौ नृणाम् ॥ २३ ॥
ऋषियोंने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्रमें इन देश और कालको ही कार्य-सिद्धिका प्रधान उपाय बताया है। मनुष्योंकी कामना-सिद्धिमें भी ये देश और काल ही प्रधान माने गये हैं ॥ २३ ॥
परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् ।
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ॥ २४ ॥
जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करनेवाला तथा सतत सावधान रहनेवाला है, वह अभीष्ट देश और कालका ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोगसे इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि शाकुलोपाख्याने
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें शाकुलोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥