महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 875, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रक्षीयमाणं तं दृष्ट्वा जलस्थायं भयागमे ।
अब्रवीद् दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहृदौ तदा ॥ ६ ॥
जलाशयका पानी घटता देख भय आनेकी सम्भावना समझकर दूरतककी बातें सोचनेवाले उस मत्स्यने अपने उन दोनों सुहृदोंसे कहा— ॥ ६ ॥
इयमापत् समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम् ।
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न दुष्यति ॥ ७ ॥
‘बन्धुओ! जान पड़ता है कि इस जलाशयमें रहनेवाले सभी मत्स्योंपर संकट आ पहुँचा है; इसलिये जबतक हमारे निकलनेका मार्ग दूषित न हो जाय, तबतक शीघ्र ही हमें यहाँसे अन्यत्र चले जाना चाहिये ॥ ७ ॥
अनागतमनर्थं हि सुनयैर्यैः प्रबाधयेत् ।
स न संशयमाप्नोति रोचतां भो व्रजामहे ॥ ८ ॥
‘जो आनेवाले संकटको उसके आनेसे पहले ही अपनी अच्छी नीतिद्वारा मिटा देता है, वह कभी प्राण जानेके संशयमें नहीं पड़ता। यदि आपलोगोंको मेरी बात ठीक जान पड़े तो चलिये, दूसरे जलाशयको चलें’ ॥ ८ ॥
दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽब्रवीत् सम्यगुच्यते ।
न तु कार्या त्वरा तावदिति मे निश्चिता मतिः ॥ ९ ॥
इसपर वहाँ जो दीर्घसूत्री था, उसने कहा—‘मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो; परंतु मेरा यह दृढ़ विचार है कि अभी हमें जल्दी नहीं करनी चाहिये’ ॥ ९ ॥
अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञः प्राब्रवीद् दीर्घदर्शिनम् ।
प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायातः परिहास्यते ॥ १० ॥
तदनन्तर प्रत्युत्पन्नमतिने दूरदर्शीसे कहा—‘मित्र! जब समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्यायतः कोई युक्ति ढूँढ़ निकालनेमें कभी नहीं चूकती है’ ॥ १० ॥
एवं श्रुत्वा निराक्रम्य दीर्घदर्शी महामतिः ।
जगाम स्रोतसा तेन गम्भीरं सलिलाशयम् ॥ ११ ॥
यह सुनकर परम बुद्धिमान् दीर्घदर्शी (अनागत-विधाता) वहाँसे निकलकर एक नालीके रास्तेसे दूसरे गहरे जलाशयमें चला गया ॥ ११ ॥
ततः प्रसृततोयं तं प्रसमीक्ष्य जलाशयम् ।
बबन्धुर्विविधैर्योगैर्मत्स्यान् मत्स्योपजीविनः ॥ १२ ॥
तदनन्तर मछलियोंसे ही जीविका चलानेवाले मछलीमारोंने जब यह देखा कि जलाशयका जल प्रायः बाहर निकल चुका है, तब उन्होंने अनेक उपायोंद्वारा वहाँकी सब मछलियोंको फँसा लिया ॥ १२ ॥
विलोद्यमाने तस्मिंस्तु स्रुततोये जलाशये ।
अगच्छद् बन्धनं तत्र दीर्घसूत्रः सहापरैः ॥ १३ ॥