महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 874, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
आनेवाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री—इन तीन मत्स्योंका दृष्टान्त
भीष्म उवाच
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, उसे अनागतविधाता कहते हैं तथा जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका उपाय सूझ जाता है, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति’ कहलाता है। ये दो ही प्रकारके लोग सुखसे अपनी उन्नति करते हैं; परंतु जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला होता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य नष्ट हो जाता है॥ १॥
अत्रैव चेदमव्यग्रं शृणुष्वाख्यानमुत्तमम्।
दीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये॥ २॥
कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय करनेमें जो दीर्घसूत्री होता है, उसको लेकर मैं एक सुन्दर उपाख्यान सुना रहा हूँ। तुम स्वस्थचित्त होकर सुनो॥ २॥
नातिगाधे जलाधारे सुहृदः कुशलास्त्रयः।
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय बभूवुः सहचारिणः॥ ३॥
कुन्तीनन्दन! कहते हैं, एक तालाबमें जो अधिक गहरा नहीं था, बहुत-सी मछलियाँ रहती थीं, उसी जलाशयमें तीन कार्यकुशल मत्स्य भी रहते थे, जो सदा साथ-साथ विचरनेवाले और एक-दूसरेके सुहृद् थे॥ ३॥
तत्रैको दीर्घकालज्ञ उत्पन्नप्रतिभोऽपरः।
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रयाणां सहचारिणाम्॥ ४॥
वहाँ उन तीनों सहचारियोंमेंसे एक तो (अनागतविधाता था, जो) आनेवाले दीर्घकालतककी बात सोच लेता था। दूसरा प्रत्युत्पन्नमति था, जिसकी प्रतिभा ठीक समयपर ही काम दे देती थी और तीसरा दीर्घसूत्री था (जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करता था)॥ ४॥
कदाचित् तं जलस्थायं मत्स्यबन्धाः समन्ततः।
निस्रावयामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः॥ ५॥
एक दिन कुछ मछलीमारोंने उस जलाशयमें चारों ओरसे नालियाँ बनाकर अनेक द्वारोंसे उसका पानी आसपासकी नीची भूमिमें निकालना आरम्भ कर दिया॥ ५॥