भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 863, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 863

राजाको ऐसी ही मर्यादा स्थापित करनी चाहिये, जो सब लोगोंके चित्तको प्रसन्न करनेवाली हो। लोकमें छोटे-से काममें भी मर्यादाका ही मान होता है ॥ १३ ॥ नायं लोकोऽस्ति न पर इति व्यवसितो जनः । नालं गन्तुं हि विश्वासं नास्तिके भयशङ्किते ॥ १४ ॥ संसारमें ऐसे भी मनुष्य हैं, जो यह निश्चय किये बैठे हैं कि 'यह लोक और परलोक हैं ही नहीं।' ऐसा नास्तिक मानव भयकी शंकाका स्थान है, उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥ यथा सद्भिः परादानमहिंसा दस्युभिः कृता । अनुरज्यन्ति भूतानि समयदिषु दस्युषु ॥ १५ ॥ दस्युओंमें भी मर्यादा होती है, जैसे अच्छे डाकू दूसरोंका धन तो लूटते हैं, परंतु हिंसा नहीं करते (किसीकी इज्जत नहीं लेते)। जो मर्यादाका ध्यान रखते हैं, उन लुटेरोंमें बहुत-से प्राणी स्नेह भी करते हैं, (क्योंकि उनके द्वारा बहुतोंकी रक्षा भी होती है) ॥ १५ ॥ अयुद्ध्यमानस्य वधो दारामर्षः कृतघ्नता । ब्रह्मवित्तस्य चादानं निःशेषकरणं तथा ॥ १६ ॥ स्त्रिया मोषः पतिस्थानं दस्युष्वेतद् विगर्हितम् । संश्लेषं च परस्त्रीभिर्दस्युरेतानि वर्जयेत् ॥ १७ ॥ युद्ध न करनेवालेको मारना, परायी स्त्रीपर बलात्कार करना, कृतघ्नता, ब्राह्मणके धनका अपहरण, किसीका सर्वस्व छीन लेना, कुमारी कन्याका अपहरण करना तथा किसी ग्राम आदिपर आक्रमण करके स्वयं उसका स्वामी बन बैठना—ये सब बातें डाकुओंमें भी निन्दित मानी गयी हैं। इस्युको भी परस्त्रीका स्पर्श और उपर्युक्त सभी पाप त्याग देने चाहिये ॥ १६-१७ ॥ अभिसंदधते ये च विश्वासायास्य मानवाः । अशेषमेवोपलभ्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ॥ १८ ॥ जिनका सर्वस्व लूट लिया जाता है, वे मनुष्य उन डाकुओंके साथ मेल-जोल और विश्वास बढ़ानेकी चेष्टा करते हैं और उनके स्थान आदिका पता लगाकर फिर उनका सर्वस्व नष्ट कर देते हैं, यह निश्चित बात है ॥ १८ ॥ तस्मात् सशेषं कर्तव्यं स्वाधीनमपि दस्युभिः । न बलस्थोऽहमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ॥ १९ ॥ इसलिये दस्युओंको उचित है कि वे दूसरोंके धनको अपने अधिकारमें पाकर भी कुछ शेष छोड़ दें, सारा-का-सारा न लूट लें। 'मैं बलवान् हूँ' ऐसा समझकर क्रूरतापूर्ण बर्ताव न करें ॥ १९ ॥ स शेषकारिणस्तत्र शेषं पश्यन्ति सर्वशः । निःशेषकारिणो नित्यं निःशेषकरणाद् भयम् ॥ २० ॥