महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 862, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस राजाके पास धनका भण्डार नहीं है, उसकी साधारण मनुष्य भी अवहेलना करते हैं। उससे थोड़ा लेकर लोग संतुष्ट नहीं होते हैं और न उसका कार्य करनेमें ही उत्साह दिखाते हैं ।। ६ ।।
श्रियो हि कारणाद् राजा सत्क्रियां लभते पराम् ।
सास्य गूहति पापानि वासो गुह्यमिव स्त्रियाः ।। ७ ।।
लक्ष्मीके कारण ही राजा सर्वत्र बड़ा भारी आदर-सत्कार पाता है। जैसे कपड़ा नारीके गुप्त अंगोंको छिपाये रखता है, उसी प्रकार लक्ष्मी राजाके सारे दोषोंको ढक लेती है ।। ७ ।।
ऋद्धिमस्यानु तप्यन्ते पुरा विप्रकृता नराः ।
शालावृका इवाजस्रं जिघांसुमेव विन्दति ।। ८ ।।
पहलेके तिरस्कृत हुए मनुष्य इस राजाकी बढ़ती हुई समृद्धिको देखकर जलते रहते हैं और अपने वधकी इच्छा रखनेवाले उस राजाका ही कपटपूर्वक आश्रय ले उसी तरह उसकी सेवा करते हैं, जैसे कुत्ते अपने घातक चाण्डालकी सेवामें रहते हैं ।। ८ ।।
ईदृशस्य कुतो राज्ञः सुखं भवति भारत ।
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् ।। ९ ।।
अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित् ।
भारत! ऐसे नरेशको कैसे सुख मिलेगा? अतः राजाको सदा उद्यम ही करना चाहिये, किसीके सामने झुकना नहीं चाहिये; क्योंकि उद्यम ही पुरुषत्व है। जैसे सूखी लकड़ी बिना गाँठके ही टूट जाती है, परंतु झुकती नहीं है, उसी प्रकार राजा नष्ट भले ही हो जाय, परंतु उसे कभी दबना नहीं चाहिये ।। ९ १/२ ।।
अप्यरण्यं समाश्रित्य चरेन्मृगगणैः सह ।। १० ।।
न त्वेवोज्झितमर्यादैर्दस्युभिः सहितश्चरेत् ।
वह वनकी शरण लेकर मृगोंके साथ भले ही विचरे; किंतु मर्यादा भंग करनेवाले डाकुओंके साथ कदापि न रहे ।। १० १/२ ।।
दस्यूनां सुलभा सेना रौद्रकर्मसु भारत ।। ११ ।।
एकान्ततो ह्यमर्यादात् सर्वोऽप्युद्विजते जनः ।
दस्यवोऽप्यभिशङ्कन्ते निरनुक्रोशकारिणः ।। १२ ।।
भारत! डाकुओंको लूट-पाट या हिंसा आदि भयानक कर्मोंके लिये अनायास ही सेना सुलभ हो जाती है। सर्वथा मर्यादाशून्य मनुष्यसे सब लोग उद्विग्न हो उठते हैं। केवल निर्दयतापूर्ण कर्म करनेवाले पुरुषकी ओरसे डाकू भी शंकित रहते हैं ।। ११-१२ ।।
स्थापयेदेव मर्यादां जनचित्तप्रसादिनीम् ।
अल्पेऽप्यर्थे च मर्यादा लोके भवति पूजिता ।। १३ ।।