भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 865, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 865

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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्चित्त

भीष्म उवाच

अत्र धर्मानुवचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थौ क्षत्रियस्य विजानतः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! प्राचीनकालकी बातोंको जाननेवाले विद्वान् इस विषयमें जो धर्मका प्रवचन करते हैं, वह इस प्रकार है—विज्ञ क्षत्रियके लिये धर्म और अर्थ—ये दो ही प्रत्यक्ष हैं ॥ १ ॥

तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मयापना ।
अधर्मो धर्म इत्येतद् यथा वृकपदं तथा ॥ २ ॥
धर्म और अधर्मकी समस्या रखकर किसीके कर्तव्यमें व्यवधान नहीं डालना चाहिये; क्योंकि धर्मका फल प्रत्यक्ष नहीं है। जैसे भेड़ियेका पदचिह्न देखकर किसीको यह निश्चय नहीं होता कि यह व्याघ्रका पदचिह्न है या कुत्तेका? उसी प्रकार धर्म और अधर्मके विषयमें निर्णय करना कठिन है ॥ २ ॥

धर्माधर्मफले जातु ददर्शेह न कश्चन ।
बुभूषेद् बलमेवैतत् सर्वं बलवतो वशे ॥ ३ ॥
धर्म और अधर्मका फल किसीने कभी यहाँ प्रत्यक्ष नहीं देखा है। अतः राजा बलप्राप्तिके लिये प्रयत्न करे; क्योंकि यह सब जगत् बलवान्‌के वशमें होता है ॥ ३ ॥

श्रियो बलममात्यांश्च बलवानिह विन्दति ।
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टं यदल्पकम् ॥ ४ ॥
बलवान् पुरुष इस जगत्‌में सम्पत्ति, सेना और मन्त्री सब कुछ पा लेता है। जो दरिद्र है, वह पतित समझा जाता है और किसीके पास जो बहुत थोड़ा धन है, वह उच्छिष्ट या जूठन समझा जाता है ॥ ४ ॥

बह्वपथ्यं बलवति न किंचित् क्रियते भयात् ।
उभौ सत्याधिकारस्थौ त्रायेते महतो भयात् ॥ ५ ॥
बलवान् पुरुषमें बहुत-सी बुराई होती है तो भी भयके मारे उसके विषयमें कोई मुँहसे कुछ बात नहीं निकालता है। यदि बल और धर्म दोनों सत्यके ऊपर प्रतिष्ठित हों तो वे मनुष्यकी महान् भयसे रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥

अतिधर्माद् बलं मन्ये बलाद् धर्मः प्रवर्तते ।
बले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमम् ॥ ६ ॥

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