महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 870, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकायव्यने कहा—प्रिय बन्धुओ! तुम कभी स्त्री, डरपोक, बालक और तपस्वीकी हत्या न करना। जो तुमसे युद्ध न कर रहा हो, उसका भी वध न करना। स्त्रियोंको कभी बलपूर्वक न पकड़ना ॥ १३ ॥ सर्वथा स्त्री न हन्तव्या सर्वसत्त्वेषु केनचित् । नित्यं तु ब्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ॥ १४ ॥ तुममेंसे कोई भी सभी प्राणियोंके स्त्रीवर्गकी किसी तरह भी हत्या न करे। ब्राह्मणोंके हितका सदा ध्यान रखना। आवश्यकता हो तो उनकी रक्षाके लिये युद्ध भी करना ॥ १४ ॥ शस्यं च नापि हर्तव्यं सारविघ्नं च मा कृथाः । पूज्यन्ते यत्र देवाश्च पितरोऽतिथयस्तथा ॥ १५ ॥ खेतकी फसल न उखाड़ लाना, विवाह आदि उत्सवोंमें विघ्न न डालना, जहाँ देवता, पितर और अतिथियोंकी पूजा होती हो, वहाँ कोई उपद्रव न खड़ा करना ॥ १५ ॥ सर्वभूतेष्वपि च वै ब्राह्मणो मोक्षमर्हति । कार्याचोपचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि या भवेत् ॥ १६ ॥ समस्त प्राणियोंमें ब्राह्मण विशेषरूपसे डाकुओंके हाथसे छुटकारा पानेका अधिकारी है। अपना सर्वस्व लगाकर भी तुम्हें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रयन्ति पराभवम् । न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥ १७ ॥ देखो, ब्राह्मणलोग कुपित होकर जिसके पराभवका चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकोंमें कोई रक्षक नहीं होता ॥ १७ ॥ यो ब्राह्मणान् परिवदेद् विनाशं चापि रोचयेत् । सूर्योदय इव ध्वान्ते ध्रुवं तस्य पराभवः ॥ १८ ॥ जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार अवश्य ही पतन हो जाता है ॥ इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षेत सर्वशः । ये ये नो न प्रदास्यन्ति तांस्तांस्तेनाभियास्यसि ॥ १९ ॥ तुम लोग यहीं बैठे-बैठे लुटेरेपनका जो फल है, उसे पानेकी अभिलाषा रखो। जो-जो व्यापारी हमें स्वेच्छासे धन नहीं देंगे, उन्हीं-उन्हींपर तुम दल बाँधकर आक्रमण करोगे ॥ १९ ॥ शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वृद्ध्यर्थं विनिश्चयः । ये च शिष्टान् प्रबाधन्ते दण्डस्तेषां वधः स्मृतः ॥ २० ॥ दण्डका विधान दुष्टोंके दमनके लिये है, अपना धन बढ़ानेके लिये नहीं। जो शिष्ट पुरुषोंको सताते हैं, उनका वध ही उनके लिये दण्ड माना गया है ॥ २० ॥ ये च राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन ।