महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 879, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसकता है? ॥ ६ ॥ कथं मित्रमरिं चापि विन्दते भरतर्षभ । चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ॥ ७ ॥ राजा किस प्रकार मित्र और शत्रुको अपने वशमें करता है तथा उसे शत्रु और मित्रके बीचमें रहकर कैसी चेष्टा करनी चाहिये? ॥ ७ ॥ प्रज्ञातलक्षणे मित्रे तथैवामित्रतां गते । कथं तु पुरुषः कुर्यात् कृत्वा किं वा सुखी भवेत् ॥ ८ ॥ पहले लक्षणोंद्वारा जिसे मित्र समझा गया है, वही मनुष्य यदि शत्रु हो जाय, तब उसके साथ कोई पुरुष कैसा बर्ताव करे? अथवा क्या करके वह सुखी हो? ॥ ८ ॥ विग्रहं केन वा कुर्यात् संधिं वा केन योजयेत् । कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेत बलवानपि ॥ ९ ॥ किसके साथ विग्रह करे? अथवा किसके साथ संधि जोड़े और बलवान् पुरुष भी यदि शत्रुओंके बीचमें मिल जाय तो उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ ९ ॥ एतद् वै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं परंतप । नैतस्य कश्चिद् वक्तास्ति श्रोता वापि सुदुर्लभः ॥ १० ॥ ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् सत्यसंधाज्जितेन्द्रियात् । तदन्विष्य महाभाग सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ११ ॥ परंतप पितामह! यह कार्य समस्त कार्योंमें श्रेष्ठ है। सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा, दूसरा कोई इस विषयको बतानेवाला नहीं है। इसको सुननेवाला भी दुर्लभ ही है। अतः महाभाग! आप उसका अनुसंधान करके यह सारा विषय मुझसे कहिये ॥ १०-११ ॥
भीष्म उवाच त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो युधिष्ठिर सुखोदयः । शृणु मे पुत्र कार्त्स्न्येन गुह्यमापत्सु भारत ॥ १२ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन बेटा युधिष्ठिर! तुम्हारा यह विस्तारपूर्वक पूछना बहुत ठीक है। यह सुखकी प्राप्ति करानेवाला है। आपत्तिके समय क्या करना चाहिये? यह विषय गोपनीय होनेसे सबको मालूम नहीं है। तुम यह सब रहस्य मुझसे सुनो ॥ १२ ॥ अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति । सामर्थ्ययोगात् कार्याणामनित्या वै सदा गतिः ॥ १३ ॥ भिन्न-भिन्न कार्योंका ऐसा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण कभी शत्रु भी मित्र बन जाता है और कभी मित्रका मन भी द्वेषभावसे दूषित हो जाता है। वास्तवमें शत्रु-मित्रकी परिस्थिति सदा एक-सी नहीं रहती है ॥ १३ ॥