महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सकता है? ॥ ६ ॥ कथं मित्रमरिं चापि विन्दते भरतर्षभ । चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ॥ ७ ॥ राजा किस प्रकार मित्र और शत्रुको अपने वशमें करता है तथा उसे शत्रु और मित्रके बीचमें रहकर कैसी चेष्टा करनी चाहिये? ॥ ७ ॥ प्रज्ञातलक्षणे मित्रे तथैवामित्रतां गते । कथं तु पुरुषः कुर्यात् कृत्वा किं वा सुखी भवेत् ॥ ८ ॥ पहले लक्षणोंद्वारा जिसे मित्र समझा गया है, वही मनुष्य यदि शत्रु हो जाय, तब उसके साथ कोई पुरुष कैसा बर्ताव करे? अथवा क्या करके वह सुखी हो? ॥ ८ ॥ विग्रहं केन वा कुर्यात् संधिं वा केन योजयेत् । कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेत बलवानपि ॥ ९ ॥ किसके साथ विग्रह करे? अथवा किसके साथ संधि जोड़े और बलवान् पुरुष भी यदि शत्रुओंके बीचमें मिल जाय तो उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ ९ ॥ एतद् वै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं परंतप । नैतस्य कश्चिद् वक्तास्ति श्रोता वापि सुदुर्लभः ॥ १० ॥ ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् सत्यसंधाज्जितेन्द्रियात् । तदन्विष्य महाभाग सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ११ ॥ परंतप पितामह! यह कार्य समस्त कार्योंमें श्रेष्ठ है। सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा, दूसरा कोई इस विषयको बतानेवाला नहीं है। इसको सुननेवाला भी दुर्लभ ही है। अतः महाभाग! आप उसका अनुसंधान करके यह सारा विषय मुझसे कहिये ॥ १०-११ ॥
भीष्म उवाच त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो युधिष्ठिर सुखोदयः । शृणु मे पुत्र कार्त्स्न्येन गुह्यमापत्सु भारत ॥ १२ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन बेटा युधिष्ठिर! तुम्हारा यह विस्तारपूर्वक पूछना बहुत ठीक है। यह सुखकी प्राप्ति करानेवाला है। आपत्तिके समय क्या करना चाहिये? यह विषय गोपनीय होनेसे सबको मालूम नहीं है। तुम यह सब रहस्य मुझसे सुनो ॥ १२ ॥ अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति । सामर्थ्ययोगात् कार्याणामनित्या वै सदा गतिः ॥ १३ ॥ भिन्न-भिन्न कार्योंका ऐसा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण कभी शत्रु भी मित्र बन जाता है और कभी मित्रका मन भी द्वेषभावसे दूषित हो जाता है। वास्तवमें शत्रु-मित्रकी परिस्थिति सदा एक-सी नहीं रहती है ॥ १३ ॥
तस्माद् विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् । देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥ १४ ॥ अतः देश-कालको समझकर कर्तव्य-अकर्तव्यका निश्चय करके किसीपर विश्वास और किसीके साथ युद्ध करना चाहिये ॥ १४ ॥
संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः । अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥ १५ ॥ भारत! कर्तव्यका विचार करके सदा हित चाहनेवाले विद्वान् मित्रोंके साथ संधि करनी चाहिये और आवश्यकता पड़नेपर शत्रुओंसे भी संधि कर लेनी चाहिये; क्योंकि प्राणोंकी रक्षा सदा ही कर्तव्य है ॥ १५ ॥
यो ह्यमित्रैर्नरो नित्यं न संदध्यादपण्डितः । न सोऽर्थं प्राप्नुयात् किंचित् फलान्यपि च भारत ॥ १६ ॥ भारत! जो मूर्ख मानव शत्रुओंके साथ कभी किसी भी दशामें संधि ही नहीं करता, वह अपने किसी भी उद्देश्यको सिद्ध नहीं कर सकता और न कोई फल ही पा सकता है ॥ १६ ॥
यस्त्वमित्रेण संदध्यानमित्रेण च विरुद्ध्यते । अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद् विन्दते फलम् ॥ १७ ॥ जो स्वार्थसिद्धिका अवसर देखकर शत्रुसे तो संधि कर लेता है और मित्रोंके साथ विरोध बढ़ा लेता है, वह महान् फल प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मार्जारस्य च संवादं न्यग्रोधे मूषिकस्य च ॥ १८ ॥ इस विषयमें विद्वान् पुरुष वटवृक्षके आश्रयमें रहनेवाले एक बिलाव और चूहेके संवादरूप एक प्रचीन कथानकका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ १८ ॥
वने महति कस्मिंश्चिन्न्यग्रोधः सुमहानभूत् । लताजालपरिच्छिन्नो नानाद्विजगणान्वितः ॥ १९ ॥ किसी महान् वनमें एक विशाल बरगदका वृक्ष था, जो लतासमूहोंसे आच्छादित तथा भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे सुशोभित था ॥ १९ ॥
स्कन्धवान् मेघसङ्काशः शीतच्छायो मनोरमः । अरण्यमभितो जातः स तु व्यालमृगाकुलः ॥ २० ॥ वह अपनी मोटी-मोटी डालियोंसे हरा-भरा होनेके कारण मेघके समान दिखायी देता था। उसकी छाया शीतल थी। वह मनोरम वृक्ष वनके समीप होनेके कारण बहुत-से सर्पों तथा पशुओंका आश्रय बना हुआ था ॥ २० ॥
तस्य मूलं समाश्रित्य कृत्वा शतमुखं बिलम् । वसति स्म महाप्राज्ञः पलितो नाम मूषिकः ॥ २१ ॥
उसीकी जड़मे सौ दरवाजोंका बिल बनाकर पलित नामक एक परम बुद्धिमान् चूहा निवास करता था ।। २१ ।।
शाखां तस्य समाश्रित्य वसति स्म सुखं पुरा ।
लोमशो नाम मार्जारः पक्षिसंघातखादकः ।। २२ ।।
उसी बरगदकी डालीपर पहले लोमश नामका एक बिलाव भी बड़े सुखसे रहता था। पक्षियोंका समूह ही उसका भोजन था ।। २२ ।।
तत्र चागत्य चाण्डालो ह्यररण्ये कृतकेतनः ।
प्रयोजयति चोन्माथं नित्यमस्तंगते रवौ ।। २३ ।।
तत्र स्नायुमयान् पाशान् यथावत् संविधाय सः ।
गृहं गत्वा सुखं शेते प्रभातामेति शर्वरीम् ।। २४ ।।
उसी वनमें एक चाण्डाल भी घर बनाकर रहता था। वह प्रतिदिन सायंकाल सूर्यास्त हो जानेपर वहाँ आकर जाल फैला देता और उसकी ताँतकी डोरियोंको यथास्थान लगा घर जाकर मौजसे सोता था; फिर सबेरा होनेपर वहाँ आया करता था ।। २३-२४ ।।
तत्र स्म नित्यं बध्यन्ते नक्तं बहुविधा मृगाः ।
कदाचिदत्र मार्जारस्त्वप्रमत्तो व्यबध्यत ।। २५ ।।
रातको उस जालमें प्रतिदिन नाना प्रकारके पशु फँस जाते थे (उन्हींको लेनेके लिये वह सबेरे आता था)। एक दिन अपनी असावधानीके कारण पूर्वोक्त बिलाव भी उस जालमें फँस गया ।। २५ ।।
तस्मिन् बद्धे महाप्राणे शत्रौ नित्याततायिनि ।
तं कालं पलितो ज्ञात्वा प्रचचार सुनिर्भयः ।। २६ ।।
उस महान् शक्तिशाली और नित्य आततायी शत्रुके फँस जानेपर जब पलितको यह समाचार मालूम हुआ, तब वह उस समय बिलसे बाहर निकलकर सब ओर निर्भय विचरने लगा ।। २६ ।।
तेनानुचरता तस्मिन् वने विश्वस्तचारिणा ।
भक्ष्यं मृगयमाणेन चिराद् दृष्टं तदामिषम् ।। २७ ।।
स तमुन्माथमारुह्य तदामिषमभक्षयत् ।। २८ ।।
उस वनमें विश्वस्त होकर विचरते तथा आहारकी खोज करते हुए उस चूहेने बहुत देरके बाद वह माँस देखा, जो जालपर बिखेरा गया था। चूहा उस जालपर चढ़कर उस मांसको खाने लगा ।। २७-२८ ।।
तस्योपरि सपत्नस्य बद्धस्य मनसा हसन् ।
आमिषे तु प्रसक्तः स कदाचिदवलोकयन् ।। २९ ।।
जालके ऊपर मांस खानेमें लगा हुआ वह चूहा अपने शत्रुके ऊपर मन-ही-मन हँस रहा था। इतनेहीमें कभी उसकी दृष्टि दूसरी ओर घूम गयी ।। २९ ।।
अपश्यदपरं घोरमात्मनः शत्रुमागतम् । शरप्रसूनसङ्काशं महीविवरशायिनम् ॥ ३० ॥ फिर तो उसने एक दूसरे भयंकर शत्रुको वहाँ आया हुआ देखा, जो सरकण्डेके फूलके समान भूरे रंगका था। वह धरतीमें विवर बनाकर उसके भीतर सोया करता था ॥ ३० ॥
नकुलं हरिणं नाम चपलं ताम्रलोचनम् । तेन मूषिकगन्धेन त्वरमाणमुपागतम् ॥ ३१ ॥ वह जातिका न्यौला था। उसकी आँखें ताँबेके समान दिखायी देती थीं। वह चपल नेवला हरिणके नामसे प्रसिद्ध था और उसी चूहेकी गन्ध पाकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचा था ॥ ३१ ॥
भक्ष्यार्थं संलिहानं तं भूमावूर्ध्वमुखं स्थितम् । शाखागतमरिं चान्यमपश्यत् कोटरालयम् ॥ ३२ ॥ उलूकं चन्द्रकं नाम तीक्ष्णतुण्डं क्षपाचरम् । इधर तो वह नेवला अपना आहार ग्रहण करनेके लिये जीभ लपलपाता हुआ ऊपर मुँह किये पृथ्वीपर खड़ा था और दूसरी ओर बरगदकी शाखापर बैठा हुआ दूसरा ही शत्रु दिखायी दिया, जो वृक्षके खोंखलेमें निवास करता था। वह चन्द्रक नामसे प्रसिद्ध उल्लू था। उसकी चोंच बड़ी तीखी थी। वह रातमें विचरनेवाला पक्षी था ॥ ३२ १/२ ॥
गतस्य विषयं तत्र नकुलोलूकयोस्तथा ॥ ३३ ॥ अथास्यासीदियं चिन्ता तत् प्राप्य सुमहद् भयम् । न्यौले और उल्लू—दोनोंका लक्ष्य बने हुए उस चूहेको बड़ा भय हुआ। अब उसे इस प्रकार चिन्ता होने लगी— ॥
आपद्यस्यां सुकष्टायां मरणे प्रत्युपस्थिते ॥ ३४ ॥ समन्ताद् भय उत्पन्ने कथं कार्यं हितैषिणा । ‘अहो! इस कष्टदायिनी विपत्तिमें मृत्यु निकट आकर खड़ी है। चारों ओरसे भय उत्पन्न हो गया है। ऐसी अवस्थामें अपना हित चाहनेवाले प्राणीको किस उपायका अवलम्बन करना चाहिये?’ ॥ ३४ १/२ ॥
स तथा सर्वतो रुद्धः सर्वत्र भयदर्शनः ॥ ३५ ॥ अभवद् भयसंतप्तश्चक्रे च परमां मतिम् । इस प्रकार सब ओरसे उसका मार्ग अवरुद्ध हो गया था। सर्वत्र उसे भय-ही-भय दिखायी देता था। उस भयसे वह संतप्त हो उठा। इसके बाद उसने पुनः श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले सोचना आरम्भ किया— ॥ ३५ १/२ ॥
आपद्धिनाशभूयिष्ठं गर्तः कार्यं हि जीवितम् ॥ ३६ ॥ समन्तात् संशयात् सैषा तस्मादापदुपस्थिता ।
'आपत्तिमें पड़कर विनाशके समीप पहुँचे हुए प्राणियोंको भी अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न तो करना ही चाहिये। आज सब ओरसे प्राणोंका संशय उपस्थित है; अतः यह मुझपर बड़ी भारी आपत्ति आ गयी है।। ३६ १/२ ।। गतं मां सहसा भूमिं नकुलो भक्षयिष्यति ।। ३७ ।। उलूकश्चेह तिष्ठन्तं मार्जारः पाशसंक्षयात् । 'यदि मैं पृथ्वीपर उतरकर भागता हूँ तो सहसा नेवला मुझे पकड़कर खा जायगा। यदि यहीं ठहर जाता हूँ तो उल्लू मुझे चोंचसे मार डालेगा और यदि जाल काटकर भीतर घुसता हूँ तो बिलाव जीवित नहीं छोड़ेगा ।। ३७ १/२ ।। न त्वेवास्मद्विधः प्राज्ञः सम्मोहं गन्तुमर्हति ।। ३८ ।। करिष्ये जीविते यत्नं यावद् युक्त्या प्रतिग्रहात् । 'तथापि मुझ-जैसे बुद्धिमान्को घबराना नहीं चाहिये। अतः जहाँतक युक्ति काम देगी, परस्पर सहयोगका आदान-प्रदान करके मैं जीवन-रक्षाके लिये प्रयत्न करूँगा ।। ३८ १/२ ।। न हि बुद्ध्यान्वितः प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ।। ३९ ।। निमज्जत्यापदं प्राप्य महतीं दारुणामपि ।। ४० ।। 'बुद्धिमान्, विद्वान् और नीतिशास्त्रमें निपुण पुरुष भारी और भयंकर विपत्तिमें पड़नेपर भी उसमें डूब नहीं जाता है—उससे छूटनेकी चेष्टा करता है ।। ३९-४० ।। न त्वन्यामिह मार्जाराद् गतिं पश्यामि साम्प्रतम् । विषमस्थो ह्ययं शत्रुः कृत्यं चास्य महन्मया ।। ४१ ।। 'मैं इस समय इस बिलावका सहारा लेनेके सिवा, अपने लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं देखता। यद्यपि यह मेरा कट्टर शत्रु है, तथापि इस समय स्वयं ही भारी संकटमें पड़ा हुआ है। मेरे द्वारा इसका भी बड़ा भारी काम निकल सकता है ।। ४१ ।। जीवितार्थी कथं त्वद्य शत्रुभिः प्रार्थितस्त्रिभिः । तस्मादेनमहं शत्रुं मार्जारं संश्रयामि वै ।। ४२ ।। 'इधर, मैं भी जीवनकी रक्षा चाहता हूँ, तीन-तीन शत्रु मुझपर घात लगाये बैठे हैं; अतः क्यों न आज मैं अपने शत्रु इस बिलावका ही आश्रय लूँ? ।। ४२ ।। नीतिशास्त्रं समाश्रित्य हितमस्योपवर्णये । येनेमं शत्रुसंघातं मतिपूर्वेण वञ्चये ।। ४३ ।। 'आज नीतिशास्त्रका सहारा लेकर इसके हितका वर्णन करूँगा जिससे बुद्धिके द्वारा इस शत्रुसमुदायको धोखा देकर बच जाऊँगा ।। ४३ ।। अयमत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गतः । मूढो ग्राहयितुं स्वार्थं सङ्गत्या यदि शक्यते ।। ४४ ।। 'इसमें संदेह नहीं कि बिलाव मेरा महान् दुश्मन है, तथापि इस समय महान् संकटमें है। यदि सम्भव हो तो इस मूर्खको संगतिके द्वारा स्वार्थ सिद्ध करनेकी बातपर राजी
करूँ ॥ ४४ ॥ कदाचिद् व्यसनं प्राप्य संधिं कुर्यान्मया सह । बलिना संनिकृष्टस्य शत्रोरपि परिग्रहः ॥ ४५ ॥ कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना । ‘हो सकता है कि विपत्तिमें पड़ा होनेके कारण यह मेरे साथ संधि कर ले। आचार्योंका कथन है कि संकट आ पड़नेपर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले बलवान् पुरुषको भी अपने निकटवर्ती शत्रुसे मेल कर लेना चाहिये ॥ ४५ १/२ ॥ श्रेष्ठो हि पण्डितः शत्रुर्न च मित्रमपण्डितः ॥ ४६ ॥ मम त्वमित्रे माजरि जीवितं सम्प्रतिष्ठितम् । ‘विद्वान् शत्रु भी अच्छा होता है किंतु मूर्ख मित्र भी अच्छा नहीं है। मेरा जीवन तो आज मेरे शत्रु बिलावके ही अधीन है ॥ ४६ १/२ ॥ हन्तास्मै सम्प्रवक्ष्यामि हेतुमात्माभिरक्षणे ॥ ४७ ॥ अपीदानीमयं शत्रुः सङ्गत्या पण्डितो भवेत् । ‘अच्छा, अब मैं इसे आत्मरक्षाके लिये एक युक्ति बता रहा हूँ। सम्भव है, यह शत्रु इस समय मेरी संगतिसे विद्वान् हो जाय—विवेकसे काम ले’ ॥ ४७ १/२ ॥ एवं विचिन्तयामास मूषिकः शत्रुचेष्टितम् ॥ ४८ ॥ ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः संधिविग्रहकालवित् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं मार्जारं मूषिकोऽब्रवीत् ॥ ४९ ॥ इस प्रकार चूहेने शत्रुकी चेष्टापर विचार किया। वह अर्थसिद्धिके उपायको यथार्थरूपसे जाननेवाला तथा संधि और विग्रहके अवसरको समझनेवाला था। उसने बिलावको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें कहा— ॥ ४८-४९ ॥ सौहृदेनाभिभाषे त्वां कच्चिन्मार्जार जीवसि । जीवितं हि तवेच्छामि श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५० ॥ ‘भैया बिलाव! मैं तुम्हारे प्रति मैत्रीका भाव रखकर बातचीत कर रहा हूँ। तुम अभी जीवित तो हो न? मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहे; क्योंकि इसमें मेरी और तुम्हारी दोनोंकी एक-सी भलाई है ॥ ५० ॥ न ते सौम्य भयं कार्यं जीविष्यसि यथासुखम् । अहं त्वामुद्धरिष्यामि यदि मां न जिघांससि ॥ ५१ ॥ ‘सौम्य! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम आनन्दपूर्वक जीवित रह सकोगे। यदि मुझे मार डालनेकी इच्छा त्याग दो तो मैं इस संकटसे तुम्हारा उद्धार कर दूँगा ॥ ५१ ॥ अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दुष्करः प्रतिभाति मे । येन शक्यस्त्वया मोक्षः प्राप्तुं श्रेयस्तथा मया ॥ ५२ ॥
‘एक उपाय है जिससे तुम इस संकटसे छुटकारा पा सकते हो और मैं भी कल्याणका भागी हो सकता हूँ। यद्यपि वह उपाय मुझे दुष्कर प्रतीत होता है ॥ ५२ ॥
मयाप्युपायो दृष्टोऽयं विचार्य मतिमात्मनः ।
आत्मार्थं च त्वदर्थं च श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५३ ॥
‘मैंने अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह सोच-विचार करके अपने और तुम्हारे लिये एक उपाय ढूँढ़ निकाला है, जिससे हम दोनोंकी समानरूपसे भलाई होगी ॥ ५३ ॥
इदं हि नकुलोलूकं पापबुद्ध्याभिसंस्थितम् ।
न धर्षयति मार्जार तेन मे स्वस्ति साम्प्रतम् ॥ ५४ ॥
‘मार्जार! देखो, ये नेवला और उल्लू दोनों पापबुद्धिसे यहाँ ठहरे हुए हैं। मेरी ओर घात लगाये बैठे हैं। जबतक वे मुझपर आक्रमण नहीं करते, तभीतक मैं कुशलसे हूँ ॥ ५४ ॥
कूजंश्चपलनेत्रोऽयं कौशिको मां निरीक्षते ।
नगशाखाग्रगः पापस्तस्याहं भृशमुद्विजे ॥ ५५ ॥
‘यह चंचल नेत्रोंवाला पापी उल्लू वृक्षकी डालीपर बैठकर ‘हू हू’ करता मेरी ही ओर घूर रहा है। उससे मुझे बड़ा डर लगता है ॥ ५५ ॥
सतां साप्तपदं मैत्रं स सखा मेऽसि पण्डितः ।
सांवास्यकं करिष्यामि नास्ति ते भयमद्य वै ॥ ५६ ॥
‘साधु पुरुषोंमें तो सात पग साथ-साथ चलनेसे ही मित्रता हो जाती है। हम और तुम तो यहाँ सदासे ही साथ रहते हैं; अतः तुम मेरे विद्वान् मित्र हो। मैं इतने दिन साथ रहनेका अपना मित्रोचित धर्म अवश्य निभाऊँगा, इसलिये अब तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ५६ ॥
न हि शक्तोऽसि मार्जार पाशं छेत्तुं मया विना ।
अहं छेत्स्यामि पाशांस्ते यदि मां त्वं न हिंससि ॥ ५७ ॥
‘मार्जार! तुम मेरी सहायताके बिना अपना यह बन्धन नहीं काट सकते। यदि तुम मेरी हिंसा न करो तो मैं तुम्हारे ये सारे बन्धन काट डालूँगा ॥ ५७ ॥
त्वमाश्रितो द्रुमस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रितः ।
चिरोषितावुभावावां वृक्षेऽस्मिन् विदितं च ते ॥ ५८ ॥
‘तुम इस पेड़के ऊपर रहते हो और मैं इसकी जड़में रहता हूँ। इस प्रकार हम दोनों चिरकालसे इस वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, यह बात तो तुम्हें ज्ञात ही है ॥ ५८ ॥
यस्मिन्नाश्वासते कश्चिद् यश्च नाश्वसिति क्वचित् ।
न तौ धीराः प्रशंसन्ति नित्यमुद्विग्नमानसौ ॥ ५९ ॥
‘जिसपर कोई भरोसा नहीं करता तथा जो दूसरे किसीपर स्वयं भी भरोसा नहीं करता, उन दोनोंकी धीर पुरुष कोई प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि उनके मनमें सदा उद्वेग भरा रहता है ॥ ५९ ॥
तस्माद् विवर्धतां प्रीतिर्नित्यं संगतमस्तु नौ ।
कालातीतमहिथं तु न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥ ६० ॥ 'अतः हमलोगोंमें सदा प्रेम बढ़े तथा नित्य प्रति हमारी संगति बनी रहे। जब कार्यका समय बीत जाता है, उसके बाद विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ ६० ॥
अर्थयुक्तिमिमां तत्र यथाभूतां निशामय । तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ॥ ६१ ॥ 'बिलाव! हम दोनोंके प्रयोजनका जो यह संयोग आ बना है, उसे यथार्थरूपसे सुनो। मैं तुम्हारे जीवनकी रक्षा चाहता हूँ और तुम मेरे जीवनकी रक्षा चाहते हो ॥ ६१ ॥
कश्चित् तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् । स तारयति तत् काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ॥ ६२ ॥ 'कोई पुरुष जब लकड़ीके सहारे किसी गहरी एवं विशाल नदीको पार करता है, तब उस लकड़ीको भी किनारे लगा देता है तथा वह लकड़ी भी उसे तारनेमें सहायक होती है ॥ ६२ ॥
ईदृशो नौ समायोगो भविष्यति सुविस्तरः । अहं त्वां तारयिष्यामि मां च त्वं तारयिष्यसि ॥ ६३ ॥ 'इसी प्रकार हम दोनोंका यह संयोग चिरस्थायी होगा। मैं तुम्हें विपत्तिसे पार कर दूँगा और तुम मुझे आपत्तिसे बचा लोगे' ॥ ६३ ॥
एवमुक्त्वा तु पलितस्तमर्थमुभयोर्हितम् । हेतुमद् ग्रहणीयं च कालापेक्षी न्यवेक्ष्य च ॥ ६४ ॥ इस प्रकार पलित दोनोंके लिये हितकर, युक्तियुक्त और मानने योग्य बात कहकर उत्तर मिलनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हुआ बिलावकी ओर देखने लगा ॥ ६४ ॥
अथ सुव्याहृतं श्रुत्वा तस्य शत्रोर्विचक्षणः । हेतुमद् ग्रहणीयार्थं मार्जारो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६५ ॥ अपने उस शत्रुके यह युक्तियुक्त और मान लेने योग्य सुन्दर भाषण सुनकर बुद्धिमान् बिलाव कुछ बोलनेको उद्यत हुआ ॥ ६५ ॥
बुद्धिमान् वाक्यसम्पन्नस्तद्वाक्यमनुवर्णयन् । स्वामवस्थां समीक्ष्याथ साम्नैव प्रत्यपूजयत् ॥ ६६ ॥ उसकी बुद्धि अच्छी थी। वह बोलनेकी कलामें कुशल था। पहले तो उसने चूहेकी बातको मन-ही-मन दुहराया; फिर अपनी दशापर दृष्टिपात करके उसने सामनीतिसे ही उस चूहेकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ६६ ॥
ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो मणिवैदूर्यलोचनः । मूषिकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽब्रवीत् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर जिसके आगेके दाँत बड़े तीखे थे और दोनों नेत्र नीलमके समान चमक रहे थे, उस लोमश नामक बिलावने चूहेकी ओर किंचिद् दृष्टिपात करके इस प्रकार कहा
— ।। ६७ ।।
नन्दामि सौम्य भद्रं ते यो मां जीवितुमिच्छसि ।
श्रेयश्च यदि जानीषे क्रियतां मा विचारय ।। ६८ ।।
‘सौम्य! मैं तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, जो कि तुम मुझे जीवन प्रदान करना चाहते हो। यदि हमारे कल्याणका उपाय जानते हो तो इसे अवश्य करो, कोई अन्यथा विचार मनमें न लाओ ।। ६८ ।।
अहं हि भृशमापन्नस्त्वमापन्नपरो मम ।
द्वयोरापन्नयोः संधिः क्रियतां मा चिराय च ।। ६९ ।।
‘मैं भारी विपत्तिमें फँसा हूँ और तुम भी महान् संकटमें पड़े हुए हो। इस प्रकार आपत्तिमें पड़े हुए हम दोनोंको संधि कर लेनी चाहिये। इसमें विलम्ब न हो ।। ६९ ।।
विधास्ये प्राप्तकालं यत् कार्यं सिद्धिकरं विभो ।
मयि कृच्छ्राद् विनिर्मुक्ते न विनङ्क्ष्यति ते कृतम् ।। ७० ।।
‘प्रभो! समय आनेपर तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि करनेवाला जो भी कार्य होगा, उसे अवश्य करूँगा। इस संकटसे मेरे मुक्त हो जानेपर तुम्हारा किया हुआ उपकार नष्ट नहीं होगा। मैं इसका बदला अवश्य चुकाऊँगा ।। ७० ।।
न्यस्तमानोऽस्मि भक्तोऽस्मि शिष्यस्त्वद्धितकृत् तथा ।
निदेशवशवर्ती च भवन्तं शरणं गतः ।। ७१ ।।
‘इस समय मेरा मान भंग हो चुका है। मैं तुम्हारा भक्त और शिष्य हो गया हूँ। तुम्हारे हितका साधन करूँगा और सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहूँगा। मैं सब प्रकारसे तुम्हारी शरणमें आ गया हूँ’ ।। ७१ ।।
इत्येवमुक्तः पलितो मार्जारं वशमागतम् ।
वाक्यं हितमुवाचेदमभिनीतार्थमर्थवित् ।। ७२ ।।
बिलावके ऐसा कहनेपर अपने प्रयोजनको समझनेवाले पलितने वशमें आये हुए उस बिलावसे यह अभिप्रायपूर्ण हितकर बात कही— ।। ७२ ।।
उदारं यद् भवानाह नैतच्चित्रं भवद्विधे ।
विहितो यस्तु मार्गो मे हितार्थं शृणु तं मम ।। ७३ ।।
‘भैया बिलाव! आपने जो उदारतापूर्ण वचन कहा है, यह आप-जैसे बुद्धिमान्के लिये आश्चर्यकी बात नहीं है। मैंने दोनोंके हितके लिये जो बात निर्धारित की है, वह मुझसे सुनो ।। ७३ ।।
अहं त्वानुप्रवेक्ष्यामि नकुलान्मे महत् भयम् ।
त्रायस्व भो मा वधीस्त्वं शक्तोऽस्मि तव रक्षणे ।। ७४ ।।
‘भैया! इस नेवलेसे मुझे बड़ा डर लग रहा है। इसलिये मैं तुम्हारे पीछे इस जालमें प्रवेश कर जाऊँगा, परंतु दादा! तुम मुझे मार न डालना, बचा लेना; क्योंकि जीवित रहनेपर
ही मैं तुम्हारी रक्षा करनेमें समर्थ हूँ ।।
उलूकाच्चैव मां रक्ष क्षुद्रः प्रार्थयते हि माम् ।
अहं छेत्स्यामि ते पाशान् सखे सत्येन ते शपे ।। ७५ ।।
'इधर यह नीच उल्लू भी मेरे प्राणका ग्राहक बना हुआ है। इससे भी तुम मुझे बचा लो। सखे! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, मैं तुम्हारे बन्धन काट दूँगा' ।। ७५ ।।
तद्वचः संगतं श्रुत्वा लोमशो युक्तमर्थवत् ।
हर्षादुद्वीक्ष्य पलितं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ।। ७६ ।।
चूहेकी यह युक्तियुक्त, सुसंगत और अभिप्रायपूर्ण बात सुनकर लोमशने उसकी ओर हर्षभरी दृष्टिसे देखा तथा स्वागतपूर्वक उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ७६ ।।
तं सम्पूज्याथ पलितं मार्जारः सौहृदे स्थितः ।
स विचिन्त्याब्रवीद् धीरः प्रीतस्त्वरित एव च ।। ७७ ।।
इस प्रकार पलितकी प्रशंसा एवं पूजा करके सौहार्दमें प्रतिष्ठित हुए धीरबुद्धि मार्जारने भलीभाँति सोच-विचारकर तुरंत ही प्रसन्नतापूर्वक कहा— ।। ७७ ।।
शीघ्रमागच्छ भद्रं ते त्वं मे प्राणसमः सखा ।
तव प्राज्ञ प्रसादाद्धि प्रायः प्राप्स्यामि जीवितम् ।। ७८ ।।
'भैया! शीघ्र आओ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम तो हमारे प्राणोंके समान प्रिय सखा हो। विद्वन्! इस समय मुझे प्रायः तुम्हारी ही कृपासे जीवन प्राप्त होगा ।। ७८ ।।
यद् यदेवंगतेनाद्य शक्यं कर्तुं मया तव ।
तदाज्ञापय कर्तास्मि संधिरेवास्तु नौ सखे ।। ७९ ।।
'सखे! इस दशामें पड़े हुए मुझ सेवकके द्वारा तुम्हारा जो-जो कार्य किया जा सकता हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दो, मैं अवश्य करूँगा। हम दोनोंमें संधि रहनी चाहिये ।। ७९ ।।
अस्मात् तु संकटान्मुक्तः समित्रगणबान्धवः ।
सर्वकार्याणि कर्ताहं प्रियाणि च हितानि च ।। ८० ।।
'इस संकटसे मुक्त होनेपर मैं अपने सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ तुम्हारे सभी प्रिय एवं हितकर कार्य करता रहूँगा ।। ८० ।।
मुक्तश्च व्यसनादस्मात् सौम्याहमपि नाम ते ।
प्रीतिमुत्पादयेयं च प्रीतिकर्तुश्च सत्क्रियाम् ।। ८१ ।।
'सौम्य! इस विपत्तिसे छुटकारा पानेपर मैं भी तुम्हारे हृदयमें प्रीति उत्पन्न करूँगा। तुम मेरा प्रिय करनेवाले हो, अतः तुम्हारा भलीभाँति आदर-सत्कार करूँगा ।। ८१ ।।
प्रत्युपकुर्वन् बह्वपि न भाति
पूर्वोपकारिणा तुल्यः ।
एकः करोति हि कृते
निष्कारणमेव कुरुतेऽन्यः ।। ८२ ।।
'कोई किसीके उपकारका कितना ही अधिक बदला क्यों न चुका दे; वह प्रथम उपकार करनेवालेके समान नहीं शोभा पाता है; क्योंकि एक तो किसीके उपकार करनेपर बदलेमें उसका उपकार करता है; परंतु दूसरेने बिना किसी कारणके ही उसकी भलाई की है' ।। ८२ ।।
भीष्म उवाच
ग्राहयित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषिकस्तथा ।
प्रविवेश तु विश्रभ्य क्रोडमस्य कृतागसः ।। ८३ ।।
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार चूहेने बिलावसे अपने मतलबकी बात स्वीकार कराकर और स्वयं भी उसका विश्वास करके उस अपराधी शत्रु की भी गोदमें जा बैठा ।। ८३ ।।
एवमाश्वासितो विद्वान् मार्जारिण स मूषिकः ।
मार्जारोरसि विस्रब्धः सुष्वाप पितृमातृवत् ।। ८४ ।।
बिलावने जब उस विद्वान् चूहेको पूर्वोक्तरूपसे आश्वासन दिया, तब वह माता-पिताकी गोदके समान उस बिलावकी छातीपर निर्भय होकर सो गया ।। ८४ ।।
लीनं तु तस्य गात्रेषु मार्जारस्य च मूषिकम् ।
दृष्ट्वा तौ नकुलोलूकौ निराशौ प्रत्यपद्यताम् ।। ८५ ।।
चूहेको बिलावके अंगोंमें छिपा हुआ देख नेवला और उल्लू दोनों निराश हो गये ।। ८५ ।।
तथैव तौ सुसंत्रस्तौ दृढमागततन्द्रितौ ।
दृष्ट्वा तयोः परां प्रीतिं विस्मयं परमं गतौ ।। ८६ ।।
उन दोनोंको बड़े जोरसे औंघाई आ रही थी और वे अत्यन्त भयभीत भी हो गये थे। उस समय चूहे और बिलावका वह विशेष प्रेम देखकर नेवला और उल्लू दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ८६ ।।
बलिनौ मतिमन्तौ च सुवृत्तौ चाप्युपासितौ ।
अशक्तौ तु नयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ।। ८७ ।।
यद्यपि वे बड़े बलवान्, बुद्धिमान्, सुन्दर बर्ताव करनेवाले, कार्यकुशल तथा निकटवर्ती थे तो भी उस संधिकी नीतिसे काम लेनेके कारण उन चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण करनेमें समर्थ न हो सके ।। ८७ ।।
कार्यार्थं कृतसंधी तौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ ।
उलूकनकुलौ तूर्णं जग्मतुस्तौ स्वमालयम् ।। ८८ ।।
अपने-अपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये चूहे और बिलावने आपसमें संधि कर ली, यह देखकर उल्लू और नेवला दोनों तत्काल अपने निवासस्थानको लौट गये ।। ८८ ।।
लीनः स तस्य गात्रेषु पलितो देशकालवित् । चिच्छेद पाशान् नृपते कालापेक्षी शनैः शनैः ॥ ८९ ॥ नरेश्वर! चूहा देश-कालकी गतिको अच्छी तरह जानता था; इसलिये वह बिलावके अंगोंमें ही छिपा रहकर चाण्डालके आनेके समयकी प्रतीक्षा करता हुआ धीरे-धीरे जालको काटने लगा ॥ ८९ ॥
अथ बन्धपरिक्लिष्टो मार्जारो वीक्ष्य मूषिकम् । छिन्दन्तं वै तदा पाशानत्वरन्तं त्वरान्वितः ॥ ९० ॥ तमत्वरन्तं पलितं पाशानां छेदने तथा । संचोदयितुमारेभे मार्जारो मूषिकं तदा ॥ ९१ ॥ बिलाव उस बन्धनसे तंग आ गया था। उसने देखा, चूहा जाल तो काट रहा है; किंतु इस कार्यमें फुर्ती नहीं दिखा रहा है, तब वह उतावला होकर बन्धन काटनेमें जल्दी न करनेवाले पलित नामक चूहेको उकसाता हुआ बोला— ॥ ९०-९१ ॥
किं सौम्य नातित्वरसे किं कृतार्थोऽवमन्यसे । छिन्धि पाशानमित्रघ्न पुरा श्वपच एति च ॥ ९२ ॥ ‘सौम्य! तुम जल्दी क्यों नहीं करते हो? क्या तुम्हारा काम बन गया, इसलिये मेरी अवहेलना करते हो? शत्रुसूदन! देखो, अब चाण्डाल आ रहा होगा। उसके आनेसे पहले ही मेरे बन्धनोंको काट दो’ ॥ ९२ ॥
इत्युक्तस्त्वरता तेन मतिमान् पलितोऽब्रवीत् । मार्जारमकृतप्रज्ञं पथ्यमात्महितं वचः ॥ ९३ ॥ उतावले हुए बिलावके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् पलितने अपवित्र विचार रखनेवाले उस मार्जारसे अपने लिये हितकर और लाभदायक बात कही— ॥ ९३ ॥
तूष्णीं भव न ते सौम्य त्वरा कार्या न सम्भ्रमः । वयमेवात्र कालज्ञा न कालः परिहास्यते ॥ ९४ ॥ ‘सौम्य चुप रहो, तुम्हें जल्दी नहीं करनी चाहिये, घबरानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मैं समयको खूब पहचानता हूँ, ठीक अवसर आनेपर मैं कभी नहीं चूकूँगा ॥
अकाले कृत्यमारब्धं कर्तुर्नार्थाय कल्पते । तदेव काल आरब्धं महतेऽर्थाय कल्पते ॥ ९५ ॥ ‘बेमौके शुरू किया हुआ काम करनेवालेके लिये लाभदायक नहीं होता है और वही उपयुक्त समयपर आरम्भ किया जाय तो महान् अर्थका साधक हो जाता है ॥ ९५ ॥
अकाले विप्रमुक्तान्मे त्वत्त एव भयं भवेत् । तस्मात् कालं प्रतीक्षस्व किमिति त्वरसे सखे ॥ ९६ ॥ ‘यदि असमयमें ही तुम छूट गये तो मुझे तुम्हींसे भय प्राप्त हो सकता है, इसलिये मेरे मित्र! थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो; क्यों इतनी जल्दी मचा रहे हो? ॥ ९६ ॥
यदा पश्यामि चाण्डालमायान्तं शस्त्रपाणिनम् । ततश्छेत्स्यामि ते पाशान् प्राप्ते साधारणे भये ॥ ९७ ॥ ‘जब मैं देख लूँगा कि चाण्डाल हाथमें हथियार लिये आ रहा है, तब तुम्हारे ऊपर साधारण-सा भय उपस्थित होनेपर मैं शीघ्र ही तुम्हारे बन्धन काट डालूँगा ॥ ९७ ॥
तस्मिन् काले प्रमुक्तस्त्वं तरुमेवाधिरोक्ष्यसे । न हि ते जीवितादन्यत् किंचित् कृत्यं भविष्यति ॥ ९८ ॥ ‘उस समय छूटते ही तुम पहले पेड़पर ही चढ़ोगे। अपने जीवनकी रक्षाके सिवा दूसरा कोई कार्य तुम्हें आवश्यक नहीं प्रतीत होगा ॥ ९८ ॥
ततो भवत्यपक्रान्ते त्रस्ते भीते च लोमश । अहं बिलं प्रवेक्ष्यामि भवान् शाखां भजिष्यति ॥ ९९ ॥ ‘लोमशजी! जब आप त्रास और भयसे आक्रान्त हो भाग खड़े होंगे, उस समय मैं बिलमें घुस जाऊँगा और आप वृक्षकी शाखापर जा बैठेंगे' ॥ ९९ ॥
एवमुक्तस्तु मार्जारो मूषिकेणात्मनो हितम् । वचनं वाक्यतत्त्वज्ञो जीवितार्थी महामतिः ॥ १०० ॥ चूहेके ऐसा कहनेपर वाणीके मर्मको समझनेवाला और अपने जीवनकी रक्षा चाहनेवाला परम बुद्धिमान् बिलाव अपने हितकी बात बताता हुआ बोला ॥ १०० ॥
अथात्मकृत्ये त्वरितः सम्यक् प्रश्रितमाचरन् । उवाच लोमशो वाक्यं मूषिकं चिरकारिणम् ॥ १०१ ॥ लोमशको अपना काम बनानेकी जल्दी लगी हुई थी; अतः वह भलीभाँति विनयपूर्ण बर्ताव करता हुआ विलम्ब करनेवाले चूहेसे इस प्रकार कहने लगा— ॥
न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवः । यथा त्वां मोक्षितः कृच्छ्रात् त्वरमाणेन वै मया ॥ १०२ ॥ ‘श्रेष्ठ पुरुष मित्रोंके कार्य बड़े प्रेम और प्रसन्नताके साथ किया करते हैं; तुम्हारी तरह नहीं। जैसे मैंने तुरंत ही तुम्हें संकटसे छुड़ा लिया था ॥ १०२ ॥
तथा हि त्वरमाणेन त्वया कार्यं हितं मम । यत्नं कुरु महाप्राज्ञ यथा रक्षाऽऽवयोर्भवेत् ॥ १०३ ॥ ‘इसी प्रकार तुम्हें भी जल्दी ही मेरे हितका कार्य करना चाहिये। महाप्राज्ञ! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे हम दोनोंकी रक्षा हो सके ॥ १०३ ॥
अथवा पूर्ववैरं त्वं स्मरन् कालं जिहीर्षसि । पश्य दुष्कृतकर्मंस्त्वं व्यक्तमायुःक्षयं तव ॥ १०४ ॥ ‘अथवा यदि पहलेके वैरका स्मरण करके तुम यहाँ व्यर्थ समय काटना चाहते हो तो पापी! देख लेना, इसका क्या फल होगा? निश्चय ही तुम्हारी आयु क्षीण हो चली है ॥ १०४ ॥
यदि किंचिन्मयाज्ञानात् पुरस्ताद् दुष्कृतं कृतम् । न तन्मनसि कर्तव्यं क्षामये त्वां प्रसीद मे ॥ १०५ ॥ 'यदि मैंने अज्ञानवश पहले कभी तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो तुम्हें उसको मनमें नहीं लाना चाहिये, मैं क्षमा माँगता हूँ। तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ ॥ १०५ ॥
तमेवंवादिनं प्राज्ञः शास्त्रबुद्धिसमन्वितः । उवाचेदं वचः श्रेष्ठं मार्जारं मूषिकस्तदा ॥ १०६ ॥ चूहा बड़ा विद्वान् तथा नीतिशास्त्रको जाननेवाली बुद्धिसे सम्पन्न था। उसने उस समय इस प्रकार कहनेवाले बिलावसे यह उत्तम बात कही— ॥ १०६ ॥
श्रुतं मे तव मार्जार स्वमर्थं परिगृह्णतः । ममापि त्वं विजानासि स्वमर्थं परिगृह्णतः ॥ १०७ ॥ 'भैया बिलाव! तुमने अपनी स्वार्थसिद्धिपर ही ध्यान रखकर जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया तथा मैंने भी अपने प्रयोजनको सामने रखते हुए जो कुछ कहा है, उसे तुम भी अच्छी तरह समझते हो ॥ १०७ ॥
यन्मित्रं भीतवत्साध्यं यन्मित्रं भयसंहितम् । सुरक्षितव्यं तत् कार्यं पाणिः सर्पमुखादिव ॥ १०८ ॥ 'जो किसी डरे हुए प्राणीद्वारा मित्र बनाया गया हो तथा जो स्वयं भी भयभीत होकर ही उसका मित्र बना हो—इन दोनों प्रकारके मित्रोंकी ही रक्षा होनी चाहिये और जैसे बाजीगर सर्पके मुखसे हाथ बचाकर ही उसे खेलाता है, उसी प्रकार अपनी रक्षा करते हुए ही उन्हें एक दूसरेका कार्य करना चाहिये ॥ १०८ ॥
कृत्वा बलवता संधिमात्मानं यो न रक्षति । अपथ्यमिव तद् भुक्तं तस्य नार्थाय कल्पते ॥ १०९ ॥ 'जो व्यक्ति बलवान्से संधि करके अपनी रक्षाका ध्यान नहीं रखता, उसका वह मेल-जोल खाये हुए अपथ्य अन्नके समान हितकर नहीं होता ॥ १०९ ॥
न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपुः । अर्थतस्तु निबध्यन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ११० ॥ अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैर्वनगजा इव । 'न तो कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु। स्वार्थको ही लेकर मित्र और शत्रु एक दूसरेसे बँधे हुए हैं। जैसे पालतू हाथियोंद्वारा जंगली हाथी बाँध लिये जाते हैं, उसी प्रकार अर्थोंद्वारा ही अर्थ बँधते हैं ॥ ११० १/२ ॥
न च कश्चित् कृते कार्ये कर्तारं समवेक्षते ॥ १११ ॥ तस्मात् सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् । 'काम पूरा हो जानेपर कोई भी उसके करनेवालेको नहीं देखता—उसके हितपर नहीं ध्यान देता; अतः सभी कार्योंको अधूरे ही रखना चाहिये ॥ १११ १/२ ॥
तस्मिन् कालेऽपि च भवान् दिवाकीर्तिभयार्दितः ।। ११२ ।।
मम न ग्रहके शक्तः पलायनपरायणः ।
'जब चाण्डाल आ जायगा, उस समय तुम उसीके भयसे पीड़ित हो भागने लग
जाओगे; फिर मुझे पकड़ न सकोगे ।। ११२ १/२ ।।
छिन्नं तु तन्तुबाहुल्यं तन्तुरेकोऽवशेषितः ।। ११३ ।।
छेत्स्याम्यहं तमप्याशु निर्वृतो भव लोमश ।
'मैंने बहुतसे तंतु काट डाले हैं, केवल एक ही डोरी बाकी रख छोड़ी है। उसे भी मैं
शीघ्र ही काट डालूँगा; अतः लोमश! तुम शान्त रहो, घबराओ न' ।।
तयोः संवदतोरेवं तथैवापन्नयोर्द्वयोः ।। ११४ ।।
क्षयं जगाम सा रात्रिर्लोमशं त्वाविशद् भयम् ।
इस प्रकार संकटमें पड़े हुए उन दोनोंके वार्तालाप करते-करते ही वह रात बीत गयी।
अब लोमशके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। ११४ १/२ ।।
ततः प्रभातसमये विकृतः कृष्णपिङ्गल ।। ११५ ।।
स्थूलस्फिग् विकृतो रूक्षः श्वयूथपरिवारितः ।
शंकुकर्णो महावक्त्रो मलिनो घोरदर्शनः ।। ११६ ।।
परिघो नाम चाण्डालः शस्त्रपाणिरदृश्यत ।
तदनन्तर प्रातःकाल परिघ नामक चाण्डाल हाथमें हथियार लेकर आता दिखायी
दिया। उसकी आकृति बड़ी विकराल थी। शरीरका रंग काला और पीला था। उसका
नितम्ब भाग बहुत स्थूल था। कितने ही अंग विकृत हो गये थे। वह स्वभावका रूखा जान
पड़ता था। कुत्तोंसे घिरा हुआ वह मलिनवेषधारी चाण्डाल बड़ा भयंकर दिखायी दे रहा था,
उसका मुँह विशाल था और कान दीवारमें गड़ी हुई खूँटियोंके समान जान पड़ते थे ।।
तं दृष्ट्वा यमदूताभं मार्जारस्त्रस्तचेतनः ।। ११७ ।।
उवाच वचनं भीतः किमिदानीं करिष्यसि ।
यमदूतके समान चाण्डालको आते देख बिलावका चित्त भयसे व्याकुल हो गया। उसने
डरते-डरते यही कहा—'भैया चूहा! अब क्या करोगे?' ।। ११७ १/२ ।।
अथ तावपि संत्रस्तौ तं दृष्ट्वा घोरसंकुलम् ।। ११८ ।।
क्षणेन नकुलोलूकौ नैराश्यमुपजग्मतुः ।
एक ओर वे दोनों भयभीत थे। दूसरी ओर भयानक प्राणियोंसे घिरा हुआ चाण्डाल आ
रहा था। उन सबको देखकर नेवला और उल्लू क्षणभरमें ही निराश हो गये ।। ११८ १/२ ।।
बलिनौ मतिमन्तौ च संघाते चाप्युपागतौ ।। ११९ ।।
अशक्तौ सुनयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ।
वे दोनों बलवान् और बुद्धिमान् तो थे ही। चूहेके घातमें पासहीमें बैठे हुए थे; परंतु अच्छी नीतिसे संगठित हो जानेके कारण चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण न कर सके ॥ ११९ १/२ ॥
कार्यार्थे कृतसंधानौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ ॥ १२० ॥
उलूकनकुलौ तत्र जग्मतुः स्वं स्वमालयम् ।
चूहे और बिलावको कार्यवश संधिसूत्रमें बँधे देख उल्लू और नेवला दोनों अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ १२० १/२ ॥
ततश्चिच्छेद तं पाशं मार्जारस्य च मूषिकः ॥ १२१ ॥
विप्रमुक्तोऽथ मार्जारस्तमेवाभ्यपतद् द्रुमम् ।
स तस्मात् सम्भ्रमावर्तान्मुक्तो घोरेण शत्रुणा ॥ १२२ ॥
बिलं विवेश पलितः शाखां लेभे स लोमशः ।
तदनन्तर चूहेने बिलावका बन्धन काट दिया। जालसे छूटते ही बिलाव उसी पेड़पर चढ़ गया। उस घोर शत्रु तथा उस भारी घबराहटसे छुटकारा पाकर पलित अपने बिलमें घुस गया और लोमश वृक्षकी शाखापर जा बैठा ॥ १२१-१२२ १/२ ॥
उन्माथमप्यथादाय चाण्डालो वीक्ष्य सर्वशः ॥ १२३ ॥
विहताशः क्षणेनास्ते तस्माद् देशादपाक्रमत् ।
जगाम स स्वभवनं चाण्डालो भरतर्षभ ॥ १२४ ॥
भरतश्रेष्ठ! चाण्डालने उस जालको लेकर उसे सब ओरसे उलट-पलटकर देखा और निराश होकर क्षणभरमें उस स्थानसे हट गया और अन्तमें अपने घरको चला गया ॥ १२३-१२४ ॥
ततस्तस्माद् भयान्मुक्तो दुर्लभं प्राप्य जीवितम् ।
बिलस्थं पादपाग्रस्थः पलितं लोमशोऽब्रवीत् ॥ १२५ ॥
उस भारी भयसे मुक्त हो दुर्लभ जीवन पाकर वृक्षकी शाखापर बैठे हुए लोमशने बिलके भीतर बैठे हुए चूहेसे कहा— ॥ १२५ ॥
अकृत्वा संविदं काञ्चित् सहसा समवप्लुतः ।
कृतज्ञं कृतकर्माणं कच्चिन्मां नाभिशंकसे ॥ १२६ ॥
‘भैया! तुम मुझसे कोई बातचीत किये बिना ही इस प्रकार सहसा बिलमें क्यों घुस गये? मैं तो तुम्हारा बड़ा ही कृतज्ञ हूँ। मैंने तुम्हारे प्राणोंकी रक्षा करके तुम्हारा भी बड़ा भारी काम किया है। तुम्हें मेरी ओरसे कुछ शंका तो नहीं है? ॥ १२६ ॥
गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम् ।
मित्रोपभोगसमये किं मां त्वं नोपसर्पसि ॥ १२७ ॥
‘मित्र! तुमने विपत्तिके समय मेरा विश्वास किया और मुझे जीवनदान दिया। अब तो मैत्रीके सुखका उपभोग करनेका समय है, ऐसे समय तुम मेरे पास क्यों नहीं आते
हो? ।। १२७ ।। कृत्वा हि पूर्वं मित्राणि यः पश्चान्नानुतिष्ठति । न स मित्राणि लभते कृच्छ्रास्वापत्सु दुर्मतिः ।। १२८ ।। 'जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य पहले बहुत-से मित्र बनाकर पीछे उस मित्रभावमें स्थिर नहीं रहता है, वह कष्टदायिनी विपत्तिमें पड़नेपर उन मित्रोंको नहीं पाता है अर्थात् उनसे उसको सहायता नहीं मिलती ।। १२८ ।। सत्कृतोऽहं त्वया मित्र सामर्थ्यादात्मनः सखे । स मां मित्रत्वमापन्नमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ।। १२९ ।। 'सखे! मित्र! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार मेरा पूरा सत्कार किया है और मैं भी तुम्हारा मित्र हो गया हूँ; अतः तुम्हें मेरे साथ रहकर इस मित्रताका सुख भोगना चाहिये ।। १२९ ।। यानि मे सन्ति मित्राणि ये च सम्बन्धिबान्धवाः । सर्वे त्वां पूजयिष्यन्ति शिष्या गुरुमिव प्रियम् ।। १३० ।। 'मेरे जो भी मित्र, सम्बन्धी और बन्धु-बान्धव हैं, वे सब तुम्हारी उसी प्रकार सेवा-पूजा करेंगे, जैसे शिष्य अपने श्रद्धेय गुरुकी करते हैं ।। १३० ।। अहं च पूजयिष्ये त्वां समित्रगणबान्धवम् । जीवितस्य प्रदातारं कृतज्ञः को न पूजयेत् ।। १३१ ।। 'मैं भी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा सदा ही आदर-सत्कार करूँगा। संसारमें ऐसा कौन पुरुष होगा, जो अपने जीवनदाताकी पूजा न करे? ।। १३१ ।। ईश्वरो मे भवानस्तु स्वशरीरगृहस्य च । अर्थानां चैव सर्वेषामनुशास्ता च मे भव ।। १३२ ।। 'तुम मेरे शरीरके और मेरे घरके भी स्वामी हो जाओ। मेरी जो कुछ भी सम्पत्ति है, वह सारी-की-सारी तुम्हारी है। तुम उसके शासक और व्यवस्थापक बनो ।। १३२ ।। अमात्यो मे भव प्राज्ञ पितेवेह प्रशाधि माम् । न तेऽस्ति भयमस्मत्तो जीवितेनात्मनः शपे ।। १३३ ।। 'विद्वन्! तुम मेरे मन्त्री हो जाओ और पिताकी भाँति मुझे कर्तव्यका उपदेश दो। मैं अपने जीवनकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें हमलोगोंकी ओरसे कोई भय नहीं है ।। १३३ ।। बुद्ध्या त्वमुशना साक्षाद् बलेनाधिकृता वयम् । त्वं मन्त्रबलयुक्तो हि दत्त्वा जीवितमद्य मे ।। १३४ ।। 'तुम साक्षात् शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान् हो। तुममें मन्त्रणाका बल है। आज तुमने मुझे जीवनदान देकर अपने मन्त्रणाबलसे हम सब लोगोंके हृदयपर अधिकार प्राप्त कर लिया है' ।। १३४ ।।
एवमुक्तः परां शान्तिं मार्जारिण स मूषिकः । उवाच परमन्त्रज्ञः श्लक्ष्णमात्महितं वचः ॥ १३५ ॥ बिलावकी ऐसी परम शान्तिपूर्ण बातें सुनकर उत्तम मन्त्रणाके ज्ञाता चूहेने मधुर वाणीमें अपने लिये हितकर वचन कहा— ॥ १३५ ॥
यद् भवानाह तत् सर्वं मया ते लोमश श्रुतम् । ममापि तावद् ब्रुवतः शृणु यत् प्रतिभाति मे ॥ १३६ ॥ ‘लोमश! तुमने जो कुछ कहा, वह सब मैंने ध्यान देकर सुना। अब मेरी बुद्धिमें जो विचार स्फुरित हो रहा है उसे बतलाता हूँ, अतः मेरे इस कथनको भी सुन लो ॥ १३६ ॥
वेदितव्यानि मित्राणि विज्ञेयाश्चापि शत्रवः । एतत् सुसूक्ष्मं लोकेऽस्मिन् दृश्यते प्राज्ञ सम्मतम् ॥ १३७ ॥ ‘मित्रोंको जानना चाहिये, शत्रुओंको भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिये—इस जगत्में मित्र और शत्रुको यह पहचान अत्यन्त सूक्ष्म तथा विज्ञजनोंको अभिमत है ॥ १३७ ॥
शत्रुरूपा हि सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः । संधितास्ते न बुद्ध्यन्ते कामक्रोधवशं गताः ॥ १३८ ॥ ‘अवसर आनेपर कितने ही मित्र शत्रुरूप हो जाते हैं और कितने ही शत्रु मित्र बन जाते हैं। परस्पर संधि कर लेनेके पश्चात् जब वे काम और क्रोधके अधीन हो जाते हैं, तब यह समझना असम्भव हो जाता है कि वे मित्रभावसे युक्त हैं या शत्रुभावसे? ॥ १३८ ॥
नास्ति जातु रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते । सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १३९ ॥ ‘न कभी कोई शत्रु होता है और न मित्र होता है। आवश्यक शक्तिके सम्बन्धसे लोग एक दूसरेके मित्र और शत्रु हुआ करते हैं ॥ १३९ ॥
यो यस्मिन् जीवति स्वार्थं पश्येत् पीडां न जीवति । स तस्य मित्रं तावत् स्याद् यावन्न स्याद् विपर्ययः ॥ १४० ॥ ‘जो जिसके जीते-जी अपना स्वार्थ सधता देखता है और जिसके मर जानेपर अपनी हानि मानता है, वह तबतक उसका मित्र बना रहता है, जबतक कि इस स्थितिमें कोई उलट-फेर नहीं होता ॥ १४० ॥
नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् । अर्थयुक्त्यानुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १४१ ॥ ‘मैत्री कोई स्थिर वस्तु नहीं है और शत्रुता भी सदा स्थिर रहनेवाली चीज नहीं है। स्वार्थके सम्बन्धसे मित्र और शत्रु होते रहते हैं ॥ १४१ ॥
मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित् कालपर्यये । शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि बलवत्तरः ॥ १४२ ॥
‘कभी-कभी समयके फेरसे मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु भी मित्र बन जाता है; क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान् होता है ।। १४२ ।। यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु । अर्थयुक्तिमविज्ञाय यः प्रीतौ कुरुते मनः ।। १४३ ।। मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः । ‘जो मनुष्य स्वार्थके सम्बन्धका विचार किये बिना ही मित्रोंपर केवल विश्वास और शत्रुओंपर केवल अविश्वास करता जाता है तथा जो शत्रु हो या मित्र, जो सबके प्रति प्रेमभाव ही स्थापित करने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिये ।। १४३ १/२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 898)
चूहेकी सहायताके फलस्वरूप चाण्डालके जालसे बिलावकी मुक्ति