महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ
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‘कभी-कभी समयके फेरसे मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु भी मित्र बन जाता है; क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान् होता है ।। १४२ ।। यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु । अर्थयुक्तिमविज्ञाय यः प्रीतौ कुरुते मनः ।। १४३ ।। मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः । ‘जो मनुष्य स्वार्थके सम्बन्धका विचार किये बिना ही मित्रोंपर केवल विश्वास और शत्रुओंपर केवल अविश्वास करता जाता है तथा जो शत्रु हो या मित्र, जो सबके प्रति प्रेमभाव ही स्थापित करने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिये ।। १४३ १/२ ।।