महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 896, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्तः परां शान्तिं मार्जारिण स मूषिकः । उवाच परमन्त्रज्ञः श्लक्ष्णमात्महितं वचः ॥ १३५ ॥ बिलावकी ऐसी परम शान्तिपूर्ण बातें सुनकर उत्तम मन्त्रणाके ज्ञाता चूहेने मधुर वाणीमें अपने लिये हितकर वचन कहा— ॥ १३५ ॥
यद् भवानाह तत् सर्वं मया ते लोमश श्रुतम् । ममापि तावद् ब्रुवतः शृणु यत् प्रतिभाति मे ॥ १३६ ॥ ‘लोमश! तुमने जो कुछ कहा, वह सब मैंने ध्यान देकर सुना। अब मेरी बुद्धिमें जो विचार स्फुरित हो रहा है उसे बतलाता हूँ, अतः मेरे इस कथनको भी सुन लो ॥ १३६ ॥
वेदितव्यानि मित्राणि विज्ञेयाश्चापि शत्रवः । एतत् सुसूक्ष्मं लोकेऽस्मिन् दृश्यते प्राज्ञ सम्मतम् ॥ १३७ ॥ ‘मित्रोंको जानना चाहिये, शत्रुओंको भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिये—इस जगत्में मित्र और शत्रुको यह पहचान अत्यन्त सूक्ष्म तथा विज्ञजनोंको अभिमत है ॥ १३७ ॥
शत्रुरूपा हि सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः । संधितास्ते न बुद्ध्यन्ते कामक्रोधवशं गताः ॥ १३८ ॥ ‘अवसर आनेपर कितने ही मित्र शत्रुरूप हो जाते हैं और कितने ही शत्रु मित्र बन जाते हैं। परस्पर संधि कर लेनेके पश्चात् जब वे काम और क्रोधके अधीन हो जाते हैं, तब यह समझना असम्भव हो जाता है कि वे मित्रभावसे युक्त हैं या शत्रुभावसे? ॥ १३८ ॥
नास्ति जातु रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते । सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १३९ ॥ ‘न कभी कोई शत्रु होता है और न मित्र होता है। आवश्यक शक्तिके सम्बन्धसे लोग एक दूसरेके मित्र और शत्रु हुआ करते हैं ॥ १३९ ॥
यो यस्मिन् जीवति स्वार्थं पश्येत् पीडां न जीवति । स तस्य मित्रं तावत् स्याद् यावन्न स्याद् विपर्ययः ॥ १४० ॥ ‘जो जिसके जीते-जी अपना स्वार्थ सधता देखता है और जिसके मर जानेपर अपनी हानि मानता है, वह तबतक उसका मित्र बना रहता है, जबतक कि इस स्थितिमें कोई उलट-फेर नहीं होता ॥ १४० ॥
नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् । अर्थयुक्त्यानुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १४१ ॥ ‘मैत्री कोई स्थिर वस्तु नहीं है और शत्रुता भी सदा स्थिर रहनेवाली चीज नहीं है। स्वार्थके सम्बन्धसे मित्र और शत्रु होते रहते हैं ॥ १४१ ॥
मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित् कालपर्यये । शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि बलवत्तरः ॥ १४२ ॥