महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 892, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि किंचिन्मयाज्ञानात् पुरस्ताद् दुष्कृतं कृतम् । न तन्मनसि कर्तव्यं क्षामये त्वां प्रसीद मे ॥ १०५ ॥ 'यदि मैंने अज्ञानवश पहले कभी तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो तुम्हें उसको मनमें नहीं लाना चाहिये, मैं क्षमा माँगता हूँ। तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ ॥ १०५ ॥
तमेवंवादिनं प्राज्ञः शास्त्रबुद्धिसमन्वितः । उवाचेदं वचः श्रेष्ठं मार्जारं मूषिकस्तदा ॥ १०६ ॥ चूहा बड़ा विद्वान् तथा नीतिशास्त्रको जाननेवाली बुद्धिसे सम्पन्न था। उसने उस समय इस प्रकार कहनेवाले बिलावसे यह उत्तम बात कही— ॥ १०६ ॥
श्रुतं मे तव मार्जार स्वमर्थं परिगृह्णतः । ममापि त्वं विजानासि स्वमर्थं परिगृह्णतः ॥ १०७ ॥ 'भैया बिलाव! तुमने अपनी स्वार्थसिद्धिपर ही ध्यान रखकर जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया तथा मैंने भी अपने प्रयोजनको सामने रखते हुए जो कुछ कहा है, उसे तुम भी अच्छी तरह समझते हो ॥ १०७ ॥
यन्मित्रं भीतवत्साध्यं यन्मित्रं भयसंहितम् । सुरक्षितव्यं तत् कार्यं पाणिः सर्पमुखादिव ॥ १०८ ॥ 'जो किसी डरे हुए प्राणीद्वारा मित्र बनाया गया हो तथा जो स्वयं भी भयभीत होकर ही उसका मित्र बना हो—इन दोनों प्रकारके मित्रोंकी ही रक्षा होनी चाहिये और जैसे बाजीगर सर्पके मुखसे हाथ बचाकर ही उसे खेलाता है, उसी प्रकार अपनी रक्षा करते हुए ही उन्हें एक दूसरेका कार्य करना चाहिये ॥ १०८ ॥
कृत्वा बलवता संधिमात्मानं यो न रक्षति । अपथ्यमिव तद् भुक्तं तस्य नार्थाय कल्पते ॥ १०९ ॥ 'जो व्यक्ति बलवान्से संधि करके अपनी रक्षाका ध्यान नहीं रखता, उसका वह मेल-जोल खाये हुए अपथ्य अन्नके समान हितकर नहीं होता ॥ १०९ ॥
न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपुः । अर्थतस्तु निबध्यन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ११० ॥ अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैर्वनगजा इव । 'न तो कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु। स्वार्थको ही लेकर मित्र और शत्रु एक दूसरेसे बँधे हुए हैं। जैसे पालतू हाथियोंद्वारा जंगली हाथी बाँध लिये जाते हैं, उसी प्रकार अर्थोंद्वारा ही अर्थ बँधते हैं ॥ ११० १/२ ॥
न च कश्चित् कृते कार्ये कर्तारं समवेक्षते ॥ १११ ॥ तस्मात् सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् । 'काम पूरा हो जानेपर कोई भी उसके करनेवालेको नहीं देखता—उसके हितपर नहीं ध्यान देता; अतः सभी कार्योंको अधूरे ही रखना चाहिये ॥ १११ १/२ ॥