महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 893, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मिन् कालेऽपि च भवान् दिवाकीर्तिभयार्दितः ।। ११२ ।।
मम न ग्रहके शक्तः पलायनपरायणः ।
'जब चाण्डाल आ जायगा, उस समय तुम उसीके भयसे पीड़ित हो भागने लग
जाओगे; फिर मुझे पकड़ न सकोगे ।। ११२ १/२ ।।
छिन्नं तु तन्तुबाहुल्यं तन्तुरेकोऽवशेषितः ।। ११३ ।।
छेत्स्याम्यहं तमप्याशु निर्वृतो भव लोमश ।
'मैंने बहुतसे तंतु काट डाले हैं, केवल एक ही डोरी बाकी रख छोड़ी है। उसे भी मैं
शीघ्र ही काट डालूँगा; अतः लोमश! तुम शान्त रहो, घबराओ न' ।।
तयोः संवदतोरेवं तथैवापन्नयोर्द्वयोः ।। ११४ ।।
क्षयं जगाम सा रात्रिर्लोमशं त्वाविशद् भयम् ।
इस प्रकार संकटमें पड़े हुए उन दोनोंके वार्तालाप करते-करते ही वह रात बीत गयी।
अब लोमशके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। ११४ १/२ ।।
ततः प्रभातसमये विकृतः कृष्णपिङ्गल ।। ११५ ।।
स्थूलस्फिग् विकृतो रूक्षः श्वयूथपरिवारितः ।
शंकुकर्णो महावक्त्रो मलिनो घोरदर्शनः ।। ११६ ।।
परिघो नाम चाण्डालः शस्त्रपाणिरदृश्यत ।
तदनन्तर प्रातःकाल परिघ नामक चाण्डाल हाथमें हथियार लेकर आता दिखायी
दिया। उसकी आकृति बड़ी विकराल थी। शरीरका रंग काला और पीला था। उसका
नितम्ब भाग बहुत स्थूल था। कितने ही अंग विकृत हो गये थे। वह स्वभावका रूखा जान
पड़ता था। कुत्तोंसे घिरा हुआ वह मलिनवेषधारी चाण्डाल बड़ा भयंकर दिखायी दे रहा था,
उसका मुँह विशाल था और कान दीवारमें गड़ी हुई खूँटियोंके समान जान पड़ते थे ।।
तं दृष्ट्वा यमदूताभं मार्जारस्त्रस्तचेतनः ।। ११७ ।।
उवाच वचनं भीतः किमिदानीं करिष्यसि ।
यमदूतके समान चाण्डालको आते देख बिलावका चित्त भयसे व्याकुल हो गया। उसने
डरते-डरते यही कहा—'भैया चूहा! अब क्या करोगे?' ।। ११७ १/२ ।।
अथ तावपि संत्रस्तौ तं दृष्ट्वा घोरसंकुलम् ।। ११८ ।।
क्षणेन नकुलोलूकौ नैराश्यमुपजग्मतुः ।
एक ओर वे दोनों भयभीत थे। दूसरी ओर भयानक प्राणियोंसे घिरा हुआ चाण्डाल आ
रहा था। उन सबको देखकर नेवला और उल्लू क्षणभरमें ही निराश हो गये ।। ११८ १/२ ।।
बलिनौ मतिमन्तौ च संघाते चाप्युपागतौ ।। ११९ ।।
अशक्तौ सुनयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ।