भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 894

वे दोनों बलवान् और बुद्धिमान् तो थे ही। चूहेके घातमें पासहीमें बैठे हुए थे; परंतु अच्छी नीतिसे संगठित हो जानेके कारण चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण न कर सके ॥ ११९ १/२ ॥

कार्यार्थे कृतसंधानौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ ॥ १२० ॥
उलूकनकुलौ तत्र जग्मतुः स्वं स्वमालयम् ।
चूहे और बिलावको कार्यवश संधिसूत्रमें बँधे देख उल्लू और नेवला दोनों अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ १२० १/२ ॥

ततश्चिच्छेद तं पाशं मार्जारस्य च मूषिकः ॥ १२१ ॥
विप्रमुक्तोऽथ मार्जारस्तमेवाभ्यपतद् द्रुमम् ।
स तस्मात् सम्भ्रमावर्तान्मुक्तो घोरेण शत्रुणा ॥ १२२ ॥
बिलं विवेश पलितः शाखां लेभे स लोमशः ।
तदनन्तर चूहेने बिलावका बन्धन काट दिया। जालसे छूटते ही बिलाव उसी पेड़पर चढ़ गया। उस घोर शत्रु तथा उस भारी घबराहटसे छुटकारा पाकर पलित अपने बिलमें घुस गया और लोमश वृक्षकी शाखापर जा बैठा ॥ १२१-१२२ १/२ ॥

उन्माथमप्यथादाय चाण्डालो वीक्ष्य सर्वशः ॥ १२३ ॥
विहताशः क्षणेनास्ते तस्माद् देशादपाक्रमत् ।
जगाम स स्वभवनं चाण्डालो भरतर्षभ ॥ १२४ ॥
भरतश्रेष्ठ! चाण्डालने उस जालको लेकर उसे सब ओरसे उलट-पलटकर देखा और निराश होकर क्षणभरमें उस स्थानसे हट गया और अन्तमें अपने घरको चला गया ॥ १२३-१२४ ॥

ततस्तस्माद् भयान्मुक्तो दुर्लभं प्राप्य जीवितम् ।
बिलस्थं पादपाग्रस्थः पलितं लोमशोऽब्रवीत् ॥ १२५ ॥
उस भारी भयसे मुक्त हो दुर्लभ जीवन पाकर वृक्षकी शाखापर बैठे हुए लोमशने बिलके भीतर बैठे हुए चूहेसे कहा— ॥ १२५ ॥

अकृत्वा संविदं काञ्चित् सहसा समवप्लुतः ।
कृतज्ञं कृतकर्माणं कच्चिन्मां नाभिशंकसे ॥ १२६ ॥
‘भैया! तुम मुझसे कोई बातचीत किये बिना ही इस प्रकार सहसा बिलमें क्यों घुस गये? मैं तो तुम्हारा बड़ा ही कृतज्ञ हूँ। मैंने तुम्हारे प्राणोंकी रक्षा करके तुम्हारा भी बड़ा भारी काम किया है। तुम्हें मेरी ओरसे कुछ शंका तो नहीं है? ॥ १२६ ॥

गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम् ।
मित्रोपभोगसमये किं मां त्वं नोपसर्पसि ॥ १२७ ॥
‘मित्र! तुमने विपत्तिके समय मेरा विश्वास किया और मुझे जीवनदान दिया। अब तो मैत्रीके सुखका उपभोग करनेका समय है, ऐसे समय तुम मेरे पास क्यों नहीं आते