भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

तस्मिन् कालेऽपि च भवान् दिवाकीर्तिभयार्दितः ।। ११२ ।।

मम न ग्रहके शक्तः पलायनपरायणः ।

'जब चाण्डाल आ जायगा, उस समय तुम उसीके भयसे पीड़ित हो भागने लग

जाओगे; फिर मुझे पकड़ न सकोगे ।। ११२ १/२ ।।

छिन्नं तु तन्तुबाहुल्यं तन्तुरेकोऽवशेषितः ।। ११३ ।।

छेत्स्याम्यहं तमप्याशु निर्वृतो भव लोमश ।

'मैंने बहुतसे तंतु काट डाले हैं, केवल एक ही डोरी बाकी रख छोड़ी है। उसे भी मैं

शीघ्र ही काट डालूँगा; अतः लोमश! तुम शान्त रहो, घबराओ न' ।।

तयोः संवदतोरेवं तथैवापन्नयोर्द्वयोः ।। ११४ ।।

क्षयं जगाम सा रात्रिर्लोमशं त्वाविशद् भयम् ।

इस प्रकार संकटमें पड़े हुए उन दोनोंके वार्तालाप करते-करते ही वह रात बीत गयी।

अब लोमशके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। ११४ १/२ ।।

ततः प्रभातसमये विकृतः कृष्णपिङ्गल ।। ११५ ।।

स्थूलस्फिग् विकृतो रूक्षः श्वयूथपरिवारितः ।

शंकुकर्णो महावक्त्रो मलिनो घोरदर्शनः ।। ११६ ।।

परिघो नाम चाण्डालः शस्त्रपाणिरदृश्यत ।

तदनन्तर प्रातःकाल परिघ नामक चाण्डाल हाथमें हथियार लेकर आता दिखायी

दिया। उसकी आकृति बड़ी विकराल थी। शरीरका रंग काला और पीला था। उसका

नितम्ब भाग बहुत स्थूल था। कितने ही अंग विकृत हो गये थे। वह स्वभावका रूखा जान

पड़ता था। कुत्तोंसे घिरा हुआ वह मलिनवेषधारी चाण्डाल बड़ा भयंकर दिखायी दे रहा था,

उसका मुँह विशाल था और कान दीवारमें गड़ी हुई खूँटियोंके समान जान पड़ते थे ।।

तं दृष्ट्वा यमदूताभं मार्जारस्त्रस्तचेतनः ।। ११७ ।।

उवाच वचनं भीतः किमिदानीं करिष्यसि ।

यमदूतके समान चाण्डालको आते देख बिलावका चित्त भयसे व्याकुल हो गया। उसने

डरते-डरते यही कहा—'भैया चूहा! अब क्या करोगे?' ।। ११७ १/२ ।।

अथ तावपि संत्रस्तौ तं दृष्ट्वा घोरसंकुलम् ।। ११८ ।।

क्षणेन नकुलोलूकौ नैराश्यमुपजग्मतुः ।

एक ओर वे दोनों भयभीत थे। दूसरी ओर भयानक प्राणियोंसे घिरा हुआ चाण्डाल आ

रहा था। उन सबको देखकर नेवला और उल्लू क्षणभरमें ही निराश हो गये ।। ११८ १/२ ।।

बलिनौ मतिमन्तौ च संघाते चाप्युपागतौ ।। ११९ ।।

अशक्तौ सुनयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ।

वे दोनों बलवान् और बुद्धिमान् तो थे ही। चूहेके घातमें पासहीमें बैठे हुए थे; परंतु अच्छी नीतिसे संगठित हो जानेके कारण चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण न कर सके ॥ ११९ १/२ ॥

कार्यार्थे कृतसंधानौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ ॥ १२० ॥
उलूकनकुलौ तत्र जग्मतुः स्वं स्वमालयम् ।
चूहे और बिलावको कार्यवश संधिसूत्रमें बँधे देख उल्लू और नेवला दोनों अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ १२० १/२ ॥

ततश्चिच्छेद तं पाशं मार्जारस्य च मूषिकः ॥ १२१ ॥
विप्रमुक्तोऽथ मार्जारस्तमेवाभ्यपतद् द्रुमम् ।
स तस्मात् सम्भ्रमावर्तान्मुक्तो घोरेण शत्रुणा ॥ १२२ ॥
बिलं विवेश पलितः शाखां लेभे स लोमशः ।
तदनन्तर चूहेने बिलावका बन्धन काट दिया। जालसे छूटते ही बिलाव उसी पेड़पर चढ़ गया। उस घोर शत्रु तथा उस भारी घबराहटसे छुटकारा पाकर पलित अपने बिलमें घुस गया और लोमश वृक्षकी शाखापर जा बैठा ॥ १२१-१२२ १/२ ॥

उन्माथमप्यथादाय चाण्डालो वीक्ष्य सर्वशः ॥ १२३ ॥
विहताशः क्षणेनास्ते तस्माद् देशादपाक्रमत् ।
जगाम स स्वभवनं चाण्डालो भरतर्षभ ॥ १२४ ॥
भरतश्रेष्ठ! चाण्डालने उस जालको लेकर उसे सब ओरसे उलट-पलटकर देखा और निराश होकर क्षणभरमें उस स्थानसे हट गया और अन्तमें अपने घरको चला गया ॥ १२३-१२४ ॥

ततस्तस्माद् भयान्मुक्तो दुर्लभं प्राप्य जीवितम् ।
बिलस्थं पादपाग्रस्थः पलितं लोमशोऽब्रवीत् ॥ १२५ ॥
उस भारी भयसे मुक्त हो दुर्लभ जीवन पाकर वृक्षकी शाखापर बैठे हुए लोमशने बिलके भीतर बैठे हुए चूहेसे कहा— ॥ १२५ ॥

अकृत्वा संविदं काञ्चित् सहसा समवप्लुतः ।
कृतज्ञं कृतकर्माणं कच्चिन्मां नाभिशंकसे ॥ १२६ ॥
‘भैया! तुम मुझसे कोई बातचीत किये बिना ही इस प्रकार सहसा बिलमें क्यों घुस गये? मैं तो तुम्हारा बड़ा ही कृतज्ञ हूँ। मैंने तुम्हारे प्राणोंकी रक्षा करके तुम्हारा भी बड़ा भारी काम किया है। तुम्हें मेरी ओरसे कुछ शंका तो नहीं है? ॥ १२६ ॥

गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम् ।
मित्रोपभोगसमये किं मां त्वं नोपसर्पसि ॥ १२७ ॥
‘मित्र! तुमने विपत्तिके समय मेरा विश्वास किया और मुझे जीवनदान दिया। अब तो मैत्रीके सुखका उपभोग करनेका समय है, ऐसे समय तुम मेरे पास क्यों नहीं आते

हो? ।। १२७ ।। कृत्वा हि पूर्वं मित्राणि यः पश्चान्नानुतिष्ठति । न स मित्राणि लभते कृच्छ्रास्वापत्सु दुर्मतिः ।। १२८ ।। 'जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य पहले बहुत-से मित्र बनाकर पीछे उस मित्रभावमें स्थिर नहीं रहता है, वह कष्टदायिनी विपत्तिमें पड़नेपर उन मित्रोंको नहीं पाता है अर्थात् उनसे उसको सहायता नहीं मिलती ।। १२८ ।। सत्कृतोऽहं त्वया मित्र सामर्थ्यादात्मनः सखे । स मां मित्रत्वमापन्नमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ।। १२९ ।। 'सखे! मित्र! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार मेरा पूरा सत्कार किया है और मैं भी तुम्हारा मित्र हो गया हूँ; अतः तुम्हें मेरे साथ रहकर इस मित्रताका सुख भोगना चाहिये ।। १२९ ।। यानि मे सन्ति मित्राणि ये च सम्बन्धिबान्धवाः । सर्वे त्वां पूजयिष्यन्ति शिष्या गुरुमिव प्रियम् ।। १३० ।। 'मेरे जो भी मित्र, सम्बन्धी और बन्धु-बान्धव हैं, वे सब तुम्हारी उसी प्रकार सेवा-पूजा करेंगे, जैसे शिष्य अपने श्रद्धेय गुरुकी करते हैं ।। १३० ।। अहं च पूजयिष्ये त्वां समित्रगणबान्धवम् । जीवितस्य प्रदातारं कृतज्ञः को न पूजयेत् ।। १३१ ।। 'मैं भी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा सदा ही आदर-सत्कार करूँगा। संसारमें ऐसा कौन पुरुष होगा, जो अपने जीवनदाताकी पूजा न करे? ।। १३१ ।। ईश्वरो मे भवानस्तु स्वशरीरगृहस्य च । अर्थानां चैव सर्वेषामनुशास्ता च मे भव ।। १३२ ।। 'तुम मेरे शरीरके और मेरे घरके भी स्वामी हो जाओ। मेरी जो कुछ भी सम्पत्ति है, वह सारी-की-सारी तुम्हारी है। तुम उसके शासक और व्यवस्थापक बनो ।। १३२ ।। अमात्यो मे भव प्राज्ञ पितेवेह प्रशाधि माम् । न तेऽस्ति भयमस्मत्तो जीवितेनात्मनः शपे ।। १३३ ।। 'विद्वन्! तुम मेरे मन्त्री हो जाओ और पिताकी भाँति मुझे कर्तव्यका उपदेश दो। मैं अपने जीवनकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें हमलोगोंकी ओरसे कोई भय नहीं है ।। १३३ ।। बुद्ध्या त्वमुशना साक्षाद् बलेनाधिकृता वयम् । त्वं मन्त्रबलयुक्तो हि दत्त्वा जीवितमद्य मे ।। १३४ ।। 'तुम साक्षात् शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान् हो। तुममें मन्त्रणाका बल है। आज तुमने मुझे जीवनदान देकर अपने मन्त्रणाबलसे हम सब लोगोंके हृदयपर अधिकार प्राप्त कर लिया है' ।। १३४ ।।

एवमुक्तः परां शान्तिं मार्जारिण स मूषिकः । उवाच परमन्त्रज्ञः श्लक्ष्णमात्महितं वचः ॥ १३५ ॥ बिलावकी ऐसी परम शान्तिपूर्ण बातें सुनकर उत्तम मन्त्रणाके ज्ञाता चूहेने मधुर वाणीमें अपने लिये हितकर वचन कहा— ॥ १३५ ॥

यद् भवानाह तत् सर्वं मया ते लोमश श्रुतम् । ममापि तावद् ब्रुवतः शृणु यत् प्रतिभाति मे ॥ १३६ ॥ ‘लोमश! तुमने जो कुछ कहा, वह सब मैंने ध्यान देकर सुना। अब मेरी बुद्धिमें जो विचार स्फुरित हो रहा है उसे बतलाता हूँ, अतः मेरे इस कथनको भी सुन लो ॥ १३६ ॥

वेदितव्यानि मित्राणि विज्ञेयाश्चापि शत्रवः । एतत् सुसूक्ष्मं लोकेऽस्मिन् दृश्यते प्राज्ञ सम्मतम् ॥ १३७ ॥ ‘मित्रोंको जानना चाहिये, शत्रुओंको भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिये—इस जगत्में मित्र और शत्रुको यह पहचान अत्यन्त सूक्ष्म तथा विज्ञजनोंको अभिमत है ॥ १३७ ॥

शत्रुरूपा हि सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः । संधितास्ते न बुद्ध्यन्ते कामक्रोधवशं गताः ॥ १३८ ॥ ‘अवसर आनेपर कितने ही मित्र शत्रुरूप हो जाते हैं और कितने ही शत्रु मित्र बन जाते हैं। परस्पर संधि कर लेनेके पश्चात् जब वे काम और क्रोधके अधीन हो जाते हैं, तब यह समझना असम्भव हो जाता है कि वे मित्रभावसे युक्त हैं या शत्रुभावसे? ॥ १३८ ॥

नास्ति जातु रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते । सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १३९ ॥ ‘न कभी कोई शत्रु होता है और न मित्र होता है। आवश्यक शक्तिके सम्बन्धसे लोग एक दूसरेके मित्र और शत्रु हुआ करते हैं ॥ १३९ ॥

यो यस्मिन् जीवति स्वार्थं पश्येत् पीडां न जीवति । स तस्य मित्रं तावत् स्याद् यावन्न स्याद् विपर्ययः ॥ १४० ॥ ‘जो जिसके जीते-जी अपना स्वार्थ सधता देखता है और जिसके मर जानेपर अपनी हानि मानता है, वह तबतक उसका मित्र बना रहता है, जबतक कि इस स्थितिमें कोई उलट-फेर नहीं होता ॥ १४० ॥

नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् । अर्थयुक्त्यानुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १४१ ॥ ‘मैत्री कोई स्थिर वस्तु नहीं है और शत्रुता भी सदा स्थिर रहनेवाली चीज नहीं है। स्वार्थके सम्बन्धसे मित्र और शत्रु होते रहते हैं ॥ १४१ ॥

मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित् कालपर्यये । शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि बलवत्तरः ॥ १४२ ॥

‘कभी-कभी समयके फेरसे मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु भी मित्र बन जाता है; क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान् होता है ।। १४२ ।। यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु । अर्थयुक्तिमविज्ञाय यः प्रीतौ कुरुते मनः ।। १४३ ।। मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः । ‘जो मनुष्य स्वार्थके सम्बन्धका विचार किये बिना ही मित्रोंपर केवल विश्वास और शत्रुओंपर केवल अविश्वास करता जाता है तथा जो शत्रु हो या मित्र, जो सबके प्रति प्रेमभाव ही स्थापित करने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिये ।। १४३ १/२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 898)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चूहेकी सहायताके फलस्वरूप चाण्डालके जालसे बिलावकी मुक्ति

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।। १४४ ।। विश्वासाद् भयमुत्पन्नमपि मूलानि कृन्तति । ‘जो विश्वासपात्र न हो, उसपर कभी विश्वास न करे और जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मनुष्यका मूलोच्छेद कर डालता है ।। १४४ १/२ ।।

अर्थयुक्त्या हि जायन्ते पिता माता सुतस्तथा ।। १४५ ।। मातुला भागिनेयाश्च तथा सम्बन्धिबान्धवाः । ‘माता-पिता, पुत्र, मामा, भांजे, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव-इन सबमें स्वार्थके सम्बन्धसे ही स्नेह होता है ।।

पुत्रं हि मातापितरौ त्यजतः पतितं प्रियम् ।। १४६ ।। लोको रक्षति चात्मानं पश्य स्वार्थस्य सारताम् । ‘अपना प्यारा पुत्र भी यदि पतित हो जाता है तो माँ-बाप उसे त्याग देते हैं और सब लोग सदा अपनी ही रक्षा करना चाहते हैं। अतः देख लो, इस जगत्‌में स्वार्थ ही सार है’ ।। १४६ १/२ ।।

सामान्या निष्कृतिः प्राज्ञ यो मोक्षात् प्रत्यनन्तरम् ।। १४७ ।। कृतं मृगयसे शत्रुं सुखोपायमसंशयम् । ‘बुद्धिमान् लोमश! जो तुम आज जालके बन्धनसे छूटनेके बाद ही कृतज्ञतावश मुझ अपने शत्रुको सुख पहुँचानेका असंदिग्ध उपाय ढूँढ़ने लगे हो, इसका क्या कारण है? जहाँतक उपकारका बदला चुकानेका प्रश्न है, वहाँतक तो हमारी-तुम्हारी समान स्थिति है। यदि मैंने तुम्हें संकटसे छुड़ाया है, तो तुमने भी तो मुझे वैसी ही विपत्तिसे बचाया है; फिर मैं तो कुछ करता नहीं, तुम्हीं क्यों उपकारका बदला देनेके लिये उतावले हो उठे हो? ।। १४७ १/२ ।।

अस्मिन् निलय एव त्वं न्यग्रोधादवतारितः ।। १४८ ।। पूर्वं निविष्टमुन्माथं चपलत्वान्न बुद्धवान् । ‘तुम इसी स्थानपर बरगदसे उतरे थे और पहलेसे ही यहाँ जाल बिछा हुआ था; परंतु तुमने चपलताके कारण उधर ध्यान नहीं दिया और फँस गये ।। १४८ १/२ ।।

आत्मनश्चपलो नास्ति कुतोऽन्येषां भविष्यति ।। १४९ ।। तस्मात् सर्वाणि कार्याणि चपलो हन्त्यसंशयम् । ‘चपल प्राणी जब अपने ही लिये कल्याणकारी नहीं होता तो वह दूसरेकी भलाई क्या करेगा? अतः यह निश्चित है कि चपल पुरुष सब काम चौपट कर देता है ।। १४९ १/२ ।।

ब्रवीषि मधुरं यच्च प्रियो मेऽद्य भवानिति ।। १५० ।। तन्मित्र कारणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु ।

कारणात् प्रियतामेति द्वेष्यो भवति कारणात् ।। १५१ ।। 'इसके सिवा तुम जो यह मीठी-मीठी बात कह रहे हो कि 'आज तुम मुझे बड़े प्रिय लगते हो' इसका भी कारण है, मेरे मित्र! वह सब मैं विस्तारके साथ बताता हूँ, सुनो। मनुष्य कारणसे ही प्रेमपात्र और कारणसे ही द्वेषका पात्र बनता है ।। १५०-१५१ ।।

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं न कश्चित् कस्यचित् प्रियः । सख्यं सोदर्ययोर्भ्रात्रोर्दम्पत्योर्वा परस्परम् ।। १५२ ।। कस्यचिन्नाभिजानामि प्रीतिं निष्कारणामिह । 'यह जीव-जगत् स्वार्थका ही साथी है। कोई किसीका प्रिय नहीं है। दो सगे भाइयों तथा पति और पत्नीमें भी जो परस्पर प्रेम होता है, वह भी स्वार्थवश ही है। इस जगत्में किसीके भी प्रेमको मैं निष्कारण (स्वार्थरहित) नहीं समझता ।। १५२ १/२ ।।

यद्यपि भ्रातरः क्रुद्धा भार्या वा कारणान्तरे ।। १५३ ।। स्वभावतस्ते प्रीयन्ते नेतरः प्रीयते जनः । 'कभी-कभी किसी स्वार्थको लेकर भाई भी कुपित हो जाते हैं अथवा पत्नी भी रूठ जाती है। यद्यपि वे स्वभावतः एक-दूसरेसे जैसा प्रेम करते हैं, ऐसा प्रेम दूसरे लोग नहीं करते हैं ।। १५३ १/२ ।।

प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः ।। १५४ ।। मन्त्रहोमजपैरन्यः कार्यार्थं प्रीयते जनः । 'कोई दान देनेसे प्रिय होता है, कोई प्रिय वचन बोलनेसे प्रीतिपात्र बनता है और कोई कार्यसिद्धिके लिये मन्त्र, होम एवं जप करनेसे प्रेमका भाजन बन जाता है ।। १५४ १/२ ।।

उत्पन्ना कारणे प्रीतिरासीन्नौ कारणान्तरे ।। १५५ ।। प्रध्वस्ते कारणस्थाने सा प्रीतिर्विनिवर्तते । 'किसी कारण (स्वार्थ) को लेकर उत्पन्न होनेवाली प्रीति जबतक वह कारण रहता है, तबतक बनी रहती है। उस कारणका स्थान नष्ट हो जानेपर उसको लेकर की हुई प्रीति भी स्वतः निवृत्त हो जाती है ।। १५५ १/२ ।।

किं नु तत् कारणं मन्ये येनाहं भवतः प्रियः ।। १५६ ।। अन्यत्राभ्यवहारार्थं तत्रापि च बुधा वयम् । 'अब मेरे शरीरको खा जानेके सिवा दूसरा कौन-सा ऐसा कारण रह गया है, जिससे मैं यह मान लूँ कि वास्तवमें तुम्हारा मुझपर प्रेम है। इस समय जो तुम्हारा स्वार्थ है, उसे मैं अच्छी तरह समझता हूँ ।। १५६ १/२ ।।

कालो हेतुं विकुरुते स्वार्थस्तमनुवर्तते ।। १५७ ।। स्वार्थं प्राज्ञोऽभिजानाति प्राज्ञं लोकोऽनुवर्तते । न त्वीदृशं त्वया वाच्यं विदुषि स्वार्थपण्डिते ।। १५८ ।।

‘समय कारणके स्वरूपको बदल देता है; और स्वार्थ उस समयका अनुसरण करता रहता है। विद्वान् पुरुष उस स्वार्थको समझता है और साधारण लोग विद्वान् पुरुषके ही पीछे चलते हैं। तात्पर्य यह है कि मैं विद्वान् हूँ; इसलिये तुम्हारे स्वार्थको अच्छी तरह समझता हूँ; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।। १५७-१५८ ।।

अकाले हि समर्थस्य स्नेहहेतुरयं तव ।
तस्मान्नाहं चले स्वार्थात् सुस्थिरः संधिविग्रहे ।। १५९ ।।

‘तुम शक्तिशाली हो तो भी जो बेसमय मुझपर इतना स्नेह दिखा रहे हो, इसका यह स्वार्थ ही कारण है; अतः मैं भी अपने स्वार्थसे विचलित नहीं हो सकता। संधि और विग्रहके विषयमें मेरा विचार सुनिश्चित है ।। १५९ ।।

अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति क्षणे क्षणे ।
अद्यैव हि रिपुर्भूत्वा पुनरद्यैव मे सुहृत् ।। १६० ।।
पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम् ।

‘मित्रता और शत्रुताके रूप तो बादलोंके समान क्षण-क्षणमें बदलते रहते हैं। आज ही तुम मेरे शत्रु होकर फिर आज ही मेरे मित्र हो सकते हो और उसके बाद आज ही पुनः शत्रु भी बन सकते हो। देखो, यह स्वार्थका सम्बन्ध कितना चंचल है? ।। १६० १/२ ।।

आसीन्मैत्री तु तावन्नौ यावद्धेतुरभूत् पुरा ।। १६१ ।।
सा गता सह तेनैव कालयुक्तेन हेतुना ।

‘पहले जब उपयुक्त कारण था, तब हम दोनोंमें मैत्री हो गयी थी, किंतु कालने जिसे उपस्थित कर दिया था उस कारणके निवृत्त होनेके साथ ही वह मैत्री भी चली गयी ।। १६१ १/२ ।।

त्वं हि मे जातितः शत्रुः सामर्थ्यान्मित्रतां गतः ।। १६२ ।।
तत् कृत्यमभिनिर्वर्त्य प्रकृतिः शत्रुतां गता ।

‘तुम जातिसे ही मेरे शत्रु हो, किंतु विशेष प्रयोजनसे मित्र बन गये थे। वह प्रयोजन सिद्ध कर लेनेके पश्चात् तुम्हारी प्रकृति फिर सहज शत्रुभावको प्राप्त हो गयी ।। १६२ १/२ ।।

सोऽहमेवं प्रणीतानि ज्ञात्वा शास्त्राणि तत्त्वतः ।। १६३ ।।
प्रविशेयं कथं पाशं त्वत्कृते तद् वदस्व मे ।

‘मैं इस प्रकार शुक्र आदि आचार्योंके बनाये हुए नीतिशास्त्रकी बातोंको ठीक-ठीक जानकर भी तुम्हारे लिये उस जालके भीतर कैसे प्रवेश कर सकता था? यह तुम्हीं मुझे बताओ ।। १६३ १/२ ।।

त्वद्वीर्येण प्रमुक्तोऽहं मद्वीर्येण तथा भवान् ।। १६४ ।।
अन्योन्यानुग्रहे वृत्ते नास्ति भूयः समागमः ।

'तुम्हारे पराक्रमसे मैं प्राण-संकटसे मुक्त हुआ और मेरी शक्तिसे तुम। जब एक दूसरेपर अनुग्रह करनेका काम पूरा हो गया, तब फिर हमें परस्पर मिलनेकी आवश्यकता नहीं॥ १६४ १/२॥ त्वं हि सौम्य कृतार्थोऽद्य निर्वृत्तार्थस्तथा वयम्॥ १६५॥ न तेऽस्त्यद्य मया कृत्यं किंचिदन्यत्र भक्षणात्। 'सौम्य! अब तुम्हारा काम बन गया और मेरा प्रयोजन भी सिद्ध हो गया; अतः अब मुझे खा लेनेके सिवा मेरे द्वारा तुम्हारा दूसरा कोई प्रयोजन सिद्ध होनेवाला नहीं है॥ १६५ १/२॥ अहमन्नं भवान् भोक्ता दुर्बलोऽहं भवान् बली॥ १६६॥ नावयोर्विद्यते संधिवियुक्ते विषमे बले। 'मैं अन्न हूँ और तुम मुझे खानेवाले हो। मैं दुर्बल हूँ और तुम बलवान् हो। इस प्रकार मेरे और तुम्हारे बलमें कोई समानता नहीं है। दोनोंमें बहुत अन्तर है। अतः हम दोनोंमें संधि नहीं हो सकती॥ १६६ १/२॥ स मन्येऽहं तव प्रज्ञां यन्मोक्षात् प्रत्यनन्तरम्॥ १६७॥ भक्ष्यं मृगयसे नूनं सुखोपायेन कर्मणा। 'मैं तुम्हारा विचार जान गया हूँ, निश्चय ही तुम जालसे छूटनेके बादसे ही सहज उपाय तथा प्रयत्नद्वारा आहार ढूँढ़ रहे हो॥ १६७ १/२॥ भक्ष्यार्थं ह्यवबद्धस्त्वं स मुक्तः पीडितः क्षुधा॥ १६८॥ शास्त्रजां मतिमास्थाय नूनं भक्षयिताद्य माम्। जानामि क्षुधितं तु त्वामाहारसमयश्च ते॥ १६९॥ स त्वं मामभिसंधाय भक्ष्यं मृगयसे पुनः। 'आहारकी खोजके लिये ही निकलनेपर तुम इस जालमें फँसे थे और अब इससे छूटकर भूखसे पीड़ित हो रहे हो। निश्चय ही शास्त्रीय बुद्धिका सहारा लेकर अब तुम मुझे खा जाओगे। मैं जानता हूँ कि तुम भूखे हो और यह तुम्हारे भोजनका समय है; अतः तुम पुनः मुझसे संधि करके अपने लिये भोजनकी तलाश करते हो॥ १६८-१६९ १/२॥ त्वं चापि पुत्रदारस्थो यत् संधिं सृजसे मयि॥ १७०॥ शुश्रूषां यतसे कर्तुं सखे मम न तत् क्षमम्। 'सखे! तुम जो बाल-बच्चोंके बीचमें बैठकर मुझपर संधिका भाव दिखा रहे हो तथा मेरी सेवा करनेका यत्न करते हो, वह सब मेरे योग्य नहीं है॥ १७० १/२॥ त्वया मां सहितं दृष्ट्वा प्रिया भार्या सुताश्च ते॥ १७१॥ कस्मात् ते मां न खादेयुर्हृष्टाः प्रणयिनस्त्वयि।

‘तुम्हारे साथ मुझे देखकर तुम्हारी प्यारी पत्नी और पुत्र जो तुमसे बड़ा प्रेम रखते हैं, हर्षसे उल्लसित हो मुझे कैसे नहीं खा जायँगे? ।। १७१ १/२ ।।
नाहं त्वया समेष्यामि वृत्तो हेतुः समागमे ।। १७२ ।।
शिवं ध्यायस्व मे स्वस्थः सुकृतं स्मरसे यदि ।
‘अब मैं तुमसे नहीं मिलूँगा। हम दोनोंके मिलनका जो उद्देश्य था, वह पूरा हो गया। यदि तुम्हें मेरे शुभ कर्म (उपकार) का स्मरण है तो स्वयं स्वस्थ रहकर मेरे भी कल्याणका चिन्तन करो ।। १७२ १/२ ।।
शत्रोरनार्यभूतस्य क्लिष्टस्य क्षुधितस्य च ।। १७३ ।।
भक्ष्यं मृगयमाणस्य कः प्राज्ञो विषयं व्रजेत् ।
‘जो अपना शत्रु हो, दुष्ट हो, कष्टमें पड़ा हुआ हो, भूखा हो और अपने लिये भोजनकी तलाश कर रहा हो, उसके सामने कोई भी बुद्धिमान् (जो उसका भोज्य है)’ कैसे जा सकता है ।। १७३ १/२ ।।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि दूरादपि तवोद्विजे ।। १७४ ।।
विश्वस्तं वा प्रमत्तं वा एतदेव कृतं भवेत् ।
बलवत्संनिकर्षो हि न कदाचित् प्रशस्यते ।। १७५ ।।
‘तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं चला जाऊँगा। मुझे दूरसे भी तुमसे डर लगता है। मेरा यह पलायन विश्वासपूर्वक हो रहा हो या प्रमादके कारण; इस समय यही मेरा कर्तव्य है। बलवानोंके निकट रहना दुर्बल प्राणीके लिये कभी अच्छा नहीं माना जाता ।।
नाहं त्वया समेष्यामि निवृत्तो भव लोमश ।
यदि त्वं सुकृतं वेत्सि तत् सख्यमनुसारय ।। १७६ ।।
‘लोमश! अब मैं तुमसे कभी नहीं मिलूँगा। तुम लौट जाओ। यदि तुम समझते हो कि मैंने तुम्हारा कोई उपकार किया है तो तुम मेरे प्रति सदा मैत्रीभाव बनाये रखना ।। १७६ ।।
प्रशान्तादपि मे पापाद् भेतव्यं बलिनः सदा ।
यदि स्वार्थं न ते कार्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ।। १७७ ।।
‘जो बलवान् और पापी हो, वह शान्तभावसे रहता हो तो भी मुझे सदा उससे डरना चाहिये। यदि तुम्हें मुझसे कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं करना है तो बताओ मैं तुम्हारा (इसके अतिरिक्त) कौन-सा कार्य करूँ? ।।
कामं सर्वं प्रदास्यामि न त्वाऽऽत्मानं कदाचन ।
आत्मार्थे संततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनानि च ।। १७८ ।।
अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मना ।
‘मैं तुम्हें इच्छानुसार सब कुछ दे सकता हूँ; परंतु अपने आपको कभी नहीं दूँगा। अपनी रक्षा करनेके लिये तो संतति, राज्य, रत्न और धन—सबका त्याग किया जा सकता है। अपना सर्वस्व त्यागकर भी स्वयं ही अपनी रक्षा करनी चाहिये ।। १७८ १/२ ।।

ऐश्वर्यधनरत्नानां प्रत्यमित्रे निवर्तताम् ॥ १७९ ॥
दृष्ट्वा हि पुनरावृत्तिर्जीवतामिति नः श्रुतम् ।
‘हमने सुना है कि यदि प्राणी जीवित रहे तो वह शत्रुओं द्वारा अपने अधिकारमें किये हुए ऐश्वर्य, धन और रत्नोंको पुनः वापस ला सकता है। यह बात प्रत्यक्ष देखी भी गयी है॥ १७९ १/२ ॥

न त्वात्मनः सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते ॥ १८० ॥
आत्मा हि सर्वदा रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि ।
‘धन और रत्नोंकी भाँति अपने आपको शत्रुके हाथमें दे देना अभीष्ट नहीं है। धन और स्त्रीके द्वारा अर्थात् उनका त्याग करके भी सर्वदा अपनी रक्षा करनी चाहिये ॥ १८० १/२ ॥

आत्मरक्षणतन्त्राणां सुपरीक्षितकारिणाम् ॥ १८१ ॥
आपदो नोपपद्यन्ते पुरुषाणां स्वदोषजाः ।
‘जो आत्मरक्षामें तत्पर हैं और भलीभाँति परीक्षापूर्वक निर्णय करके काम करते हैं, ऐसे पुरुषोंको अपने ही दोषसे उत्पन्न होनेवाली आपत्तियाँ नहीं प्राप्त होतीं ॥

शत्रून् सम्यग् विजानन्ति दुर्बला ये बलीयसः ॥ १८२ ॥
न तेषां चाल्यते बुद्धिः शास्त्रार्थकृतनिश्चया ।
‘जो दुर्बल प्राणी अपने बलवान् शत्रुओंको अच्छी तरह जानते हैं, उनकी शास्त्रके अर्थज्ञानद्वारा स्थिर हुई बुद्धि कभी विचलित नहीं होती’ ॥ १८२ १/२ ॥

इत्यभिव्यक्तमेवं स पलितेनाभिभर्त्सितः ॥ १८३ ॥
मार्जारो व्रीडितो भूत्वा मूषिकं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८४ ॥
पलितने जब इस प्रकार स्पष्टरूपसे कड़ी फटकार सुनायी, तब बिलावने लज्जित होकर पुनः उस चूहेसे इस प्रकार कहा ॥ १८३-१८४ ॥

लोमश उवाच

सत्यं शपे त्वयाहं वै मित्रद्रोहो विगर्हितः ।
तन्मन्येऽहं तव प्रज्ञां यस्त्वं मम हिते रतः ॥ १८५ ॥
**लोमश बोला—**भाई! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, मित्रसे द्रोह करना तो बड़ी घृणित बात है। तुम जो सदा मेरे हितमें तत्पर रहते हो, इसे मैं तुम्हारी उत्तम बुद्धिका ही परिणाम समझता हूँ ॥ १८५ ॥

उक्तवानर्थतत्त्वेन मया सम्भिन्नदर्शनः ।
न तु मामन्यथा साधो त्वं ग्रहीतुमिहार्हसि ॥ १८६ ॥
श्रेष्ठ पुरुष! तुमने तो यथार्थरूपसे नीति-शास्त्रका सार ही बता दिया। मुझसे तुम्हारा विचार पूरा-पूरा मिलता है। मित्रवर! किंतु तुम मुझे गलत न समझो। मेरा भाव तुमसे विपरीत नहीं है ॥ १८६ ॥

प्राणप्रदानजं त्वत्तो मयि सौहृदमागतम् ।

धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः ।। १८७ ।।

मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः ।

तस्मादेवं पुनः साधो मय्याचरितुमर्हसि ।। १८८ ।।

तुमने मुझे प्राणदान दिया है। इसीसे मुझपर तुम्हारे सौहार्दका प्रभाव पड़ा। मैं धर्मको

जानता हूँ, गुणोंका मूल्य समझता हूँ, विशेषतः तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हूँ, मित्रवत्सल हूँ और

सबसे बड़ी बात यह है कि मैं तुम्हारा भक्त हो गया हूँ; अतः मेरे अच्छे मित्र! तुम फिर मेरे

साथ ऐसा ही बर्ताव करो—मेलजोल बढ़ाकर मेरे साथ घूमो-फिरो ।। १८७-१८८ ।।

त्वया हि वाच्यमानोऽहं जह्यां प्राणान् सबान्धवः ।

विश्रम्भो हि बुधैर्दृष्टो मद्धिधेषु मनस्विषु ।। १८९ ।।

यदि तुम कह दो तो मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारे लिये अपने प्राण भी त्याग दे सकता

हूँ। विद्वानोंने मुझ-जैसे मनस्वी पुरुषोंपर सदा विश्वास ही किया और देखा है ।। १८९ ।।

तदेतद् धर्मतत्त्वज्ञ न त्वं शंकितुमर्हसि ।

अतः धर्मके तत्त्वको जाननेवाले पलित! तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये ।। १८९

१/२ ।।

इति संस्तूयमानोऽपि मार्जारिण स मूषिकः ।। १९० ।।

मनसा भावगम्भीरो मार्जारं वाक्यमब्रवीत् ।

बिलावके द्वारा इस प्रकारकी स्तुति की जानेपर भी चूहा अपने मनसे गम्भीर भाव ही

धारण किये रहा। उसने मार्जारसे पुनः इस प्रकार कहा— ।। १९० १/२ ।।

साधुर्भगवान् श्रुतार्थोऽस्मि प्रीये च न च विश्वसे ।। १९१ ।।

संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्यः पुनस्त्वया ।

न ह्यमित्रे वशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे ।। १९२ ।।

‘भैया! तुम वास्तवमें बड़े साधु हो। यह बात मैंने तुम्हारे विषयमें सुन रखी है। उससे

मुझे प्रसन्नता भी है; परंतु मैं तुमपर विश्वास नहीं कर सकता। तुम मेरी कितनी ही स्तुति

क्यों न करो। मेरे लिये कितनी ही धनराशि क्यों न लुटा दो; परंतु अब मैं तुम्हारे साथ मिल

नहीं सकता। सखे! बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष बिना किसी विशेष कारणके अपने शत्रुके

वशमें नहीं जाते ।। १९१-१९२ ।।

अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निबोधोशनसा कृते ।

शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। १९३ ।।

समाहितश्चरेद् युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ।

‘इस विषय में शुक्राचार्यने दो गाथाएँ कही हैं। उन्हें ध्यान देकर सुनो। जब अपने और शत्रुपर एक-सी विपत्ति आयी हो, तब निर्बलको सबल शत्रुके साथ मेल करके बड़ी सावधानी और युक्तिसे अपना काम निकालना चाहिये और जब काम हो जाय, तो फिर उसे शत्रुपर विश्वास नहीं करना चाहिये (यह पहली गाथा है)’ ।। १९३ १/२ ।।
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।। १९४ ।।
नित्यं विश्वासयेदन्यान् परेषां तु न विश्वसेत् ।
‘(दूसरी गाथा यों हैं) जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे तथा जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे। अपने प्रति सदा दूसरोंका विश्वास उत्पन्न करे; किंतु स्वयं दूसरोका विश्वास न करे ।। १९४ १/२ ।।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः ।। १९५ ।।
द्रव्याणि संततिश्चैव सर्वं भवति जीवितः ।
‘इसलिये सभी अवस्थाओंमें अपने जीवनकी रक्षा करे; क्योंकि जीवित रहनेपर पुरुषको धन और संतान—सभी मिल जाते हैं ।। १९५ १/२ ।।
संक्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः ।। १९६ ।।
नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः ।
‘संक्षेपमें नीतिशास्त्रका सार यह है कि किसीका भी विश्वास न करना ही उत्तम माना गया है; इसलिये दूसरे लोगोंपर विश्वास न करनेमें ही अपना विशेष हित है ।।
वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ताः शत्रुभिर्दुर्बला अपि ।। १९७ ।।
विश्वस्तास्तेषु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ।
‘जो विश्वास न करके सावधान रहते हैं, वे दुर्बल होनेपर भी शत्रुओंद्वारा मारे नहीं जाते। परंतु जो उनपर विश्वास करते हैं, वे बलवान् होनेपर भी दुर्बल शत्रुओंद्वारा मार डाले जाते हैं ।। १९७ १/२ ।।
त्वद्विधेभ्यो मया ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा ।। १९८ ।।
रक्ष त्वमपि चात्मानं चाण्डालाज्जातिकिल्बिषात् ।
‘बिलाव! तुम जैसे लोगोंसे मुझे सदा अपनी रक्षा करनी चाहिये और तुम भी अपने जन्मजात शत्रु चाण्डालसे अपनेको बचाये रखो’ ।। १९८ १/२ ।।
स तस्य ब्रुवतस्त्वेवं संत्रासाज्जातसाध्वसः ।। १९९ ।।
शाखां हित्वा जवेनाशु मार्जारः प्रययौ ततः ।
चूहेके इस प्रकार कहते समय चाण्डालका नाम सुनते ही बिलाव बहुत डर गया और वह डाली छोड़कर बड़े वेगसे तुरंत दूसरी ओर चला गया ।। १९९ १/२ ।।
ततः शास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बुद्धिसामर्थ्यमात्मनः ।। २०० ।।
विश्राव्य पलितः प्राज्ञो बिलमन्यज्जगाम ह ।

तदनन्तर नीतिशास्त्रके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला बुद्धिमान् पलित अपने बौद्धिक शक्तिका परिचय दे दूसरे बिलमें चला गया ।। २०० १/२ ।। एवं प्रज्ञावता बुद्ध्या दुर्बलेन महाबलाः ।। २०१ ।। एकेन बहवोऽमित्राः पलितेनाभिसंधिताः । अरिणापि समर्थेन संधिं कुर्वीत पण्डितः ।। २०२ ।। मूषिकश्च बिडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रयात् । इस प्रकार दुर्बल और अकेला होनेपर भी बुद्धिमान् पलित चूहेने अपने बुद्धि-बलसे बहुतेरे प्रबल शत्रुओंको परास्त कर दिया; अतः आपत्तिके समय विद्वान् पुरुष बलवान् शत्रुके साथ भी संधि कर ले। देखो, चूहे और बिलाव दोनों एक दूसरेका आश्रय लेकर विपत्तिसे छुटकारा पा गये थे ।। २०१-२०२ १/२ ।। इत्येवं क्षत्रधर्मस्य मया मार्गो निदर्शितः ।। २०३ ।। विस्तरेण महाराज संक्षेपमपि मे शृणु । महाराज! इस दृष्टान्तसे मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक क्षात्र-धर्मका मार्ग दिखाया है। अब संक्षेपमें कुछ मेरी बात सुनो ।। २०३ १/२ ।। अन्योन्यकृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् ।। २०४ ।। अन्योन्यमभिसंधातुं सम्बभूव तयोर्मतिः । चूहे और बिलाव एक दूसरेसे वैर रखनेवाले प्राणी हैं तो भी उन्होंने संकटके समय एक दूसरेसे उत्तम प्रीति कर ली। उनमें परस्पर संधि कर लेनेका विचार पैदा हो गया ।। २०४ १/२ ।। तत्र प्राज्ञोऽभिसंधत्ते सम्यग् बुद्धिसमाश्रयात् ।। २०५ ।। अभिसंधीयते प्राज्ञः प्रमादादपि वा बुधैः । ऐसे अवसरोंपर बुद्धिमान् पुरुष उत्तम बुद्धिका आश्रय ले संधि करके शत्रुको परास्त कर देता है। इसी तरह विद्वान् पुरुष भी यदि असावधान रहे तो उसे दूसरे बुद्धिमान् पुरुष परास्त कर देते हैं ।। २०५ १/२ ।। तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् ।। २०६ ।। न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा विनश्यति । इसलिये मनुष्य भयभीत होकर भी निडरके समान और किसीपर विश्वास न करते हुए भी विश्वास करनेवालेके समान बर्ताव करे, उसे कभी असावधान होकर नहीं चलना चाहिये। यदि चलता है तो नष्ट हो जाता है ।। २०६ १/२ ।। कालेन रिपुणा संधिः काले मित्रेण विग्रहः ।। २०७ ।। कार्य इत्येव संधिज्ञाः प्राहुर्नित्यं नराधिप ।

नरेश्वर! समयानुसार शत्रुके साथ भी संधि और मित्रके साथ भी युद्ध करना उचित है। संधिके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् पुरुष इसी बातको सदा कहते हैं॥ २०७ १/२॥

एतज्ज्ञात्वा महाराज शास्त्रार्थमभिगम्य च॥ २०८॥
अभियुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भयाद् भीतवच्चरेत्।
महाराज! ऐसा जानकर नीतिशास्त्रके तात्पर्यको हृदयंगम करके उद्योगशील एवं सावधान रहकर भय आनेसे पहले भयभीतके समान आचरण करना चाहिये॥

भीतवत् संनिधिः कार्यः प्रतिसंधिस्तथैव च॥ २०९॥
भयादुत्पद्यते बुद्धिरप्रमत्ताभियोगजा।
बलवान् शत्रुके समीप डरे हुएके समान उपस्थित होना चाहिये। उसी तरह उसके साथ संधि भी कर लेनी चाहिये। सावधान पुरुषके उद्योगशील बने रहनेसे स्वयं ही संकटसे बचानेवाली बुद्धि उत्पन्न होती है॥ २०९ १/२॥

न भयं विद्यते राजन् भीतस्यानागते भये॥ २१०॥
अभीतस्य च विश्रम्भात् सुमहज्जायते भयम्।
राजन्! जो पुरुष भय आनेके पहलेसे ही उसकी ओरसे सशंक रहता है, उसके सामने प्रायः भयका अवसर ही नहीं आता है; परंतु जो निःशंक होकर दूसरोंपर विश्वास कर लेता है, उसे सहसा बड़े भारी भयका सामना करना पड़ता है॥ २१० १/२॥

अभीश्चरति यो नित्यं मन्त्रोऽदेयः कथंचन॥ २११॥
अविज्ञानाद्धि विज्ञातो गच्छेदास्पददर्शिषु।
जो मनुष्य अपनेको बुद्धिमान् मानकर निर्भय विचरता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिये; क्योंकि वह दूसरेकी सलाह सुनता ही नहीं है। भयको न जाननेकी अपेक्षा उसे जाननेवाला ठीक है; क्योंकि वह उससे बचनेके लिये उपाय जाननेकी इच्छा से परिणामदर्शी पुरुषोंके पास जाता है॥ २११ १/२॥

तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन्॥ २१२॥
कार्याणां गुरुतां प्राप्य नानृतं किंचिदाचरेत्।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको डरते हुए भी निर्भयके समान रहना चाहिये तथा भीतरसे विश्वास न करते हुए भी ऊपरसे विश्वासी पुरुषकी भाँति बर्ताव करना चाहिये। कार्योंकी कठिनता देखकर कभी कोई मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये॥ २१२ १/२॥

एवमेतन्मया प्रोक्तमितिहासं युधिष्ठिर॥ २१३॥
श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत् समुपाचर।
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हारे सामने नीतिकी बात बतानेके लिये चूहे तथा बिलावके इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया है। इसे सुनकर तुम अपने सुहृदोंके बीचमें यथायोग्य बर्ताव करो॥ २१३ १/२॥

उपलभ्य मतिं चाग्रामरिमित्रान्तरं तथा ।। २१४ ।। संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायस्तथैव च । श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर शत्रु और मित्रके भेद, संधि और विग्रह के अवसरका तथा विपत्तिसे छूटनेके उपायका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। २१४ १/२ ।। शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। २१५ ।। समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् । अपने और शत्रुके प्रयोजन यदि समान हों तो बलवान् शत्रुके साथ संधि करके उससे मिलकर युक्तिपूर्वक अपना काम बनावे और कार्य पूरा हो जानेपर फिर कभी उसका विश्वास न करे ।। २१५ ।। अविरुद्धं त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते ।। २१६ ।। अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद् भूयः संरक्षयन् प्रजाः । पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल है। तुम इसका आश्रय लो। मुझसे सुने हुए इस उपदेशके अनुसार कर्तव्यपालनमें तत्पर हो सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हुए अपनी उन्नतिके लिये उठकर खड़े हो जाओ ।। ब्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव ।। २१७ ।। ब्राह्मणा वै परं श्रेयो दिवि चेह च भारत । पाण्डुनन्दन! तुम्हारी जीवनयात्रा ब्राह्मणोंके साथ होनी चाहिये। भरतनन्दन! ब्राह्मणलोग इहलोक और परलोकमें भी परम कल्याणकारी होते हैं ।। २१७ १/२ ।। एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो ।। २१८ ।। पूजिताः शुभकर्तारः पूजयेत् तान् नराधिप । प्रभो! नरेश्वर! ये ब्राह्मण धर्मज्ञ होनेके साथ ही सदा कृतज्ञ होते हैं। सम्मानित होनेपर शुभकारक एवं शुभचिन्तक होते हैं; अतः इनका सदा आदर-सम्मान करना चाहिये ।। २१८ १/२ ।। राज्यं श्रेयः परं राजन् यशः कीर्तिं च लप्स्यसे ।। २१९ ।। कुलस्य संततिं चैव यथान्यायं यथाक्रमम् ।। २२० ।। राजन्! तुम ब्राह्मणोंके यथोचित सत्कारसे क्रमशः राज्य, परम कल्याण, यश, कीर्ति तथा वंशपरम्पराको बनाये रखनेवाली संतति सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।। द्वयोरिमं भारत संधिविग्रहं सुभाषितं बुद्धिविशेषकारकम् । यथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले ।। २२१ ।। भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिलावका जो यह सुन्दर उपाख्यान कहा गया है, यह संधि और विग्रहका ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करनेवाला है। भूपालको सदा इसीके

अनुसार दृष्टि रखकर शत्रुमण्डलके साथ यथोचित व्यवहार करना चाहिये ।। २२१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि मार्जारमूषिकसंवादे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें चूहे और बिलावका संवादविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३८ ।।

शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

उक्तो मन्त्रो महाबाहो विश्वासो नास्ति शत्रुषु ।
कथं हि राजा वर्तेत यदि सर्वत्र नाश्वसेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाबाहो! आपने यह सलाह दी है कि शत्रुओंपर विश्वास नहीं करना चाहिये। साथ ही यह कहा है कि कहीं भी विश्वास करना उचित नहीं है, परंतु यदि राजा सर्वत्र अविश्वास ही करे तो किस प्रकार वह राज्यसम्बन्धी व्यवहार चला सकता है? ॥

विश्वासाद्धि परं राजन् राज्ञामुत्पद्यते भयम् ।
कथं हि नाश्वसन् राजा शत्रून् जयति पार्थिवः ॥ २ ॥
राजन्! यदि विश्वाससे राजाओंपर महान् भय आता है तो सर्वत्र अविश्वास करनेवाला भूपाल अपने शत्रुओंपर विजय कैसे पा सकता है? ॥ २ ॥

एतन्मे संशयं छिन्धि मतिर्मे सम्प्रमुह्यति ।
अविश्वासकथामेतामुपश्रुत्य पितामह ॥ ३ ॥
पितामह! आपकी यह अविश्वास-कथा सुनकर तो मेरी बुद्धिपर मोह छा गया। कृपया आप मेरे इस संशयका निवारण कीजिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्व राजन् यद् वृत्तं ब्रह्मदत्तनिवेशने ।
पूजन्या सह संवादं ब्रह्मदत्तस्य भूपतेः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! राजा ब्रह्मदत्तके घरमें पूजनी चिड़ियाके साथ जो उनका संवाद हुआ था, उसे ही तुम्हारे समाधानके लिये उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥

काम्पिल्ये ब्रह्मदत्तस्य त्वन्तःपुरनिवासिनी ।
पूजनी नाम शकुनिर्दीर्घकालं सहोषिता ॥ ५ ॥
काम्पिल्य नगरमें ब्रह्मदत्त नामके एक राजा राज्य करते थे। उनके अन्तःपुरमें पूजनी नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया निवास करती थी। वह दीर्घकालतक उनके साथ रही थी ॥ ५ ॥

रुतज्ञा सर्वभूतानां यथा वै जीवजीवकः ।
सर्वज्ञा सर्वतत्त्वज्ञा तिर्यग्योनिं गतापि सा ॥ ६ ॥

वह चिड़िया 'जीवजीवक' नामक विशेष पक्षीके समान समस्त प्राणियोंकी बोली समझती थी तथा तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होनेपर भी सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण तत्त्वोंको जाननेवाली थी ॥ ६ ॥

अभिप्रजाता सा तत्र पुत्रमेकं सुवर्चसम् ।
समकालं च राज्ञोऽपि देव्यां पुत्रो व्यजायत ॥ ७ ॥
एक दिन उसने रनिवासमें ही एक बच्चा दिया, जो बड़ा तेजस्वी था; उसी दिन उसके साथ ही राजाकी रानीके गर्भसे भी एक बालक उत्पन्न हुआ ॥ ७ ॥

तयोरर्थे कृतज्ञा सा खेचरी पूजनी सदा ।
समुद्रतीरं सा गत्वा आजहार फलद्वयम् ॥ ८ ॥
आकाशमें विचरनेवाली वह कृतज्ञ पूजनी चिड़िया प्रतिदिन समुद्रतटपर जाकर वहाँसे उन दोनों बच्चोंके लिये दो फल ले आया करती थी ॥ ८ ॥

पुष्ट्यर्थं च स्वपुत्रस्य राजपुत्रस्य चैव ह ।
फलमेकं सुतायादाद् राजपुत्राय चापरम् ॥ ९ ॥
वह अपने बच्चेकी पुष्टिके लिये एक फल उसे देती तथा राजाके बेटेकी पुष्टिके लिये दूसरा फल उस राजकुमारको अर्पित कर देती थी ॥ ९ ॥

अमृतास्वादसदृशं बलतेजोऽभिवर्धनम् ।
आदायादाय सैवाशु तयोः प्रादात् पुनः पुनः ॥ १० ॥
पूजनीका लाया हुआ वह फल अमृतके समान स्वादिष्ट और बल तथा तेजकी वृद्धि करनेवाला होता था। वह बारंबार उस फलको ला-लाकर शीघ्रतापूर्वक उन दोनोंको दिया करती थी ॥ १० ॥

ततोऽगच्छत् परां वृद्धिं राजपुत्रः फलाशनात् ।
ततः स धात्र्या कक्षेण उह्यमानो नृपात्मजः ॥ ११ ॥
ददर्श तं पक्षिसुतं बाल्यादागत्य बालकः ।
ततो बाल्याच्च यत्नेन तेनाक्रीडत पक्षिणा ॥ १२ ॥
राजकुमार उस फलको खा-खाकर बड़ा हृष्ट-पुष्ट हो गया। एक दिन धाय उस राजपुत्रको गोदमें लिये घूम रही थी। वह बालक ही तो ठहरा, बाल-स्वभाववश आकर उसने उस चिड़ियाके बच्चेको देखा और उसके साथ यत्नपूर्वक वह खेलने लगा ॥ ११-१२ ॥

शून्ये च तमुपादाय पक्षिणं समजातकम् ।
हत्वा ततः स राजेन्द्र धात्र्या हस्तमुपागतः ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! अपने साथ ही पैदा हुए उस पक्षीको सूने स्थानमें ले जाकर राजकुमारने मार डाला और मारकर वह धायकी गोदमें जा बैठा ॥ १३ ॥

अथ सा पूजनी राजन्नागमत् फलहारिणी ।