महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर नीतिशास्त्रके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला बुद्धिमान् पलित अपने बौद्धिक शक्तिका परिचय दे दूसरे बिलमें चला गया ।। २०० १/२ ।। एवं प्रज्ञावता बुद्ध्या दुर्बलेन महाबलाः ।। २०१ ।। एकेन बहवोऽमित्राः पलितेनाभिसंधिताः । अरिणापि समर्थेन संधिं कुर्वीत पण्डितः ।। २०२ ।। मूषिकश्च बिडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रयात् । इस प्रकार दुर्बल और अकेला होनेपर भी बुद्धिमान् पलित चूहेने अपने बुद्धि-बलसे बहुतेरे प्रबल शत्रुओंको परास्त कर दिया; अतः आपत्तिके समय विद्वान् पुरुष बलवान् शत्रुके साथ भी संधि कर ले। देखो, चूहे और बिलाव दोनों एक दूसरेका आश्रय लेकर विपत्तिसे छुटकारा पा गये थे ।। २०१-२०२ १/२ ।। इत्येवं क्षत्रधर्मस्य मया मार्गो निदर्शितः ।। २०३ ।। विस्तरेण महाराज संक्षेपमपि मे शृणु । महाराज! इस दृष्टान्तसे मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक क्षात्र-धर्मका मार्ग दिखाया है। अब संक्षेपमें कुछ मेरी बात सुनो ।। २०३ १/२ ।। अन्योन्यकृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् ।। २०४ ।। अन्योन्यमभिसंधातुं सम्बभूव तयोर्मतिः । चूहे और बिलाव एक दूसरेसे वैर रखनेवाले प्राणी हैं तो भी उन्होंने संकटके समय एक दूसरेसे उत्तम प्रीति कर ली। उनमें परस्पर संधि कर लेनेका विचार पैदा हो गया ।। २०४ १/२ ।। तत्र प्राज्ञोऽभिसंधत्ते सम्यग् बुद्धिसमाश्रयात् ।। २०५ ।। अभिसंधीयते प्राज्ञः प्रमादादपि वा बुधैः । ऐसे अवसरोंपर बुद्धिमान् पुरुष उत्तम बुद्धिका आश्रय ले संधि करके शत्रुको परास्त कर देता है। इसी तरह विद्वान् पुरुष भी यदि असावधान रहे तो उसे दूसरे बुद्धिमान् पुरुष परास्त कर देते हैं ।। २०५ १/२ ।। तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् ।। २०६ ।। न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा विनश्यति । इसलिये मनुष्य भयभीत होकर भी निडरके समान और किसीपर विश्वास न करते हुए भी विश्वास करनेवालेके समान बर्ताव करे, उसे कभी असावधान होकर नहीं चलना चाहिये। यदि चलता है तो नष्ट हो जाता है ।। २०६ १/२ ।। कालेन रिपुणा संधिः काले मित्रेण विग्रहः ।। २०७ ।। कार्य इत्येव संधिज्ञाः प्राहुर्नित्यं नराधिप ।