भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 908, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 908

नरेश्वर! समयानुसार शत्रुके साथ भी संधि और मित्रके साथ भी युद्ध करना उचित है। संधिके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् पुरुष इसी बातको सदा कहते हैं॥ २०७ १/२॥

एतज्ज्ञात्वा महाराज शास्त्रार्थमभिगम्य च॥ २०८॥
अभियुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भयाद् भीतवच्चरेत्।
महाराज! ऐसा जानकर नीतिशास्त्रके तात्पर्यको हृदयंगम करके उद्योगशील एवं सावधान रहकर भय आनेसे पहले भयभीतके समान आचरण करना चाहिये॥

भीतवत् संनिधिः कार्यः प्रतिसंधिस्तथैव च॥ २०९॥
भयादुत्पद्यते बुद्धिरप्रमत्ताभियोगजा।
बलवान् शत्रुके समीप डरे हुएके समान उपस्थित होना चाहिये। उसी तरह उसके साथ संधि भी कर लेनी चाहिये। सावधान पुरुषके उद्योगशील बने रहनेसे स्वयं ही संकटसे बचानेवाली बुद्धि उत्पन्न होती है॥ २०९ १/२॥

न भयं विद्यते राजन् भीतस्यानागते भये॥ २१०॥
अभीतस्य च विश्रम्भात् सुमहज्जायते भयम्।
राजन्! जो पुरुष भय आनेके पहलेसे ही उसकी ओरसे सशंक रहता है, उसके सामने प्रायः भयका अवसर ही नहीं आता है; परंतु जो निःशंक होकर दूसरोंपर विश्वास कर लेता है, उसे सहसा बड़े भारी भयका सामना करना पड़ता है॥ २१० १/२॥

अभीश्चरति यो नित्यं मन्त्रोऽदेयः कथंचन॥ २११॥
अविज्ञानाद्धि विज्ञातो गच्छेदास्पददर्शिषु।
जो मनुष्य अपनेको बुद्धिमान् मानकर निर्भय विचरता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिये; क्योंकि वह दूसरेकी सलाह सुनता ही नहीं है। भयको न जाननेकी अपेक्षा उसे जाननेवाला ठीक है; क्योंकि वह उससे बचनेके लिये उपाय जाननेकी इच्छा से परिणामदर्शी पुरुषोंके पास जाता है॥ २११ १/२॥

तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन्॥ २१२॥
कार्याणां गुरुतां प्राप्य नानृतं किंचिदाचरेत्।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको डरते हुए भी निर्भयके समान रहना चाहिये तथा भीतरसे विश्वास न करते हुए भी ऊपरसे विश्वासी पुरुषकी भाँति बर्ताव करना चाहिये। कार्योंकी कठिनता देखकर कभी कोई मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये॥ २१२ १/२॥

एवमेतन्मया प्रोक्तमितिहासं युधिष्ठिर॥ २१३॥
श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत् समुपाचर।
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हारे सामने नीतिकी बात बतानेके लिये चूहे तथा बिलावके इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया है। इसे सुनकर तुम अपने सुहृदोंके बीचमें यथायोग्य बर्ताव करो॥ २१३ १/२॥

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