भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 909

उपलभ्य मतिं चाग्रामरिमित्रान्तरं तथा ।। २१४ ।। संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायस्तथैव च । श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर शत्रु और मित्रके भेद, संधि और विग्रह के अवसरका तथा विपत्तिसे छूटनेके उपायका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। २१४ १/२ ।। शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। २१५ ।। समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् । अपने और शत्रुके प्रयोजन यदि समान हों तो बलवान् शत्रुके साथ संधि करके उससे मिलकर युक्तिपूर्वक अपना काम बनावे और कार्य पूरा हो जानेपर फिर कभी उसका विश्वास न करे ।। २१५ ।। अविरुद्धं त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते ।। २१६ ।। अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद् भूयः संरक्षयन् प्रजाः । पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल है। तुम इसका आश्रय लो। मुझसे सुने हुए इस उपदेशके अनुसार कर्तव्यपालनमें तत्पर हो सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हुए अपनी उन्नतिके लिये उठकर खड़े हो जाओ ।। ब्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव ।। २१७ ।। ब्राह्मणा वै परं श्रेयो दिवि चेह च भारत । पाण्डुनन्दन! तुम्हारी जीवनयात्रा ब्राह्मणोंके साथ होनी चाहिये। भरतनन्दन! ब्राह्मणलोग इहलोक और परलोकमें भी परम कल्याणकारी होते हैं ।। २१७ १/२ ।। एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो ।। २१८ ।। पूजिताः शुभकर्तारः पूजयेत् तान् नराधिप । प्रभो! नरेश्वर! ये ब्राह्मण धर्मज्ञ होनेके साथ ही सदा कृतज्ञ होते हैं। सम्मानित होनेपर शुभकारक एवं शुभचिन्तक होते हैं; अतः इनका सदा आदर-सम्मान करना चाहिये ।। २१८ १/२ ।। राज्यं श्रेयः परं राजन् यशः कीर्तिं च लप्स्यसे ।। २१९ ।। कुलस्य संततिं चैव यथान्यायं यथाक्रमम् ।। २२० ।। राजन्! तुम ब्राह्मणोंके यथोचित सत्कारसे क्रमशः राज्य, परम कल्याण, यश, कीर्ति तथा वंशपरम्पराको बनाये रखनेवाली संतति सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।। द्वयोरिमं भारत संधिविग्रहं सुभाषितं बुद्धिविशेषकारकम् । यथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले ।। २२१ ।। भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिलावका जो यह सुन्दर उपाख्यान कहा गया है, यह संधि और विग्रहका ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करनेवाला है। भूपालको सदा इसीके